अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में डॉ. आठिया की 25 पुस्तकों का विमोचन, हुआ सम्मान – Dainik Bhaskar

भास्कर संवाददाता | देवरीकलां
विश्व हिंदी परिषद, नई दिल्ली के तत्वावधान में 30 और 31 अक्टूबर को विज्ञान भवन में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी : हिंदी, राष्ट्रवाद और सुशासन विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया। आयोजन का मुख्य उद्देश्य पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हिंदी भाषा के प्रति योगदान, उनकी राष्ट्रवादी विचारधारा, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण, सांस्कृतिक चेतना और सुशासन की अवधारणा को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रेखांकित करना था।
सम्मेलन के दौरान हिंदी की वैश्विक स्थिति, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रबोध के निर्माण में हिंदी की भूमिका, प्रवासी भारतीयों के बीच हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा समकालीन वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में हिंदी साहित्य की प्रासंगिकता पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। अकादमिक सत्रों में प्रोफेसर्स, हिन्दी विद्वान, पत्रकार, शोधार्थियों के साथ नगर के साहित्यकार डॉ. सीताराम आठिया ने अटलजी के काव्य में राष्ट्रवाद और मानवीय संवेदनाएं विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया। सम्मेलन में पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू तथा पवित्रा मारग्रेट केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री ने विश्व हिंदी परिषद की त्रैमासिक शोध पत्रिका का लोकार्पण किया।
सम्मेलन के दूसरे दिन फिजी के राजदूत जगन्नाथ सामी, भारत सरकार के पूर्व गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी, विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. विपिन कुमार, वरिष्ठ राजनेता केसी त्यागी और रविशंकर अय्यर समेत अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने डॉ. सीताराम आठिया को हिंदी भाषा, साहित्य, हिन्दी सेवा और शोध में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अंगवस्त्र पहनाकर हिंदी गौरव सम्मान से सम्मानित किया एवं स्मृति चिह्न भेंट किया। गौरतलब है कि इससे पूर्व परिषद द्वारा उन्हें विश्व हिंदी सेवा सम्मान 2025 से भी सम्मानित किया जा चुका है।
डॉ. आठिया ने चौथी बार इस सम्मेलन में सहभागिता करके शोध पत्र प्रस्तुत किए है। इस दौरान डॉ. सीताराम आठिया की 25 पुस्तकों का विमोचन किया। सम्मेलन में डॉ. विनोद कुमार, महेंद्र कुमार लोधी, अमरेंद्र नारायण अमर, डॉ. विजय पाटिल समेत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्रिटेन, कतर, मॉरीशस, बहरीन, इंडोनेशिया, थाईलैंड, नीदरलैंड्स, श्रीलंका, अर्मेनिया समेत 20 से अधिक देशों के प्रवासी हिंदी साहित्यकारों, विद्वानों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, हिंदी सेवियों ने भाग लिया।
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