विदेश मंत्रालय (MEA) के एक हालिया बयान ने भारत में नागरिकता से जुड़ी एक पुरानी बहस को फिर से गरमा दिया है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट भारत की नागरिकता का अंतिम या पक्का सबूत नहीं है। बुधवार को पासपोर्ट सेवा दिवस के मौके पर ई-पासपोर्ट के फायदों के बारे में बताते हुए यह तकनीकी स्पष्टीकरण दिया गया। इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है कि अगर विदेश यात्रा कराने वाला और कड़ी पुलिस वेरिफिकेशन के बाद जारी होने वाला पासपोर्ट भी नागरिकता का पुख्ता प्रमाण नहीं है, तो फिर वह कौन सा दस्तावेज है जो इसे साबित करता है?
विदेश मंत्रालय का यह बयान इसलिए थोड़ा अटपटा लग सकता है क्योंकि पासपोर्ट बनाने का पूरा कानून ही इसी आधार पर टिका है कि इसका धारक एक भारतीय नागरिक है।
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 5 और 6(2)(a) के तहत पासपोर्ट अथॉरिटी पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही पासपोर्ट जारी करती है। अगर आवेदक भारत का नागरिक नहीं है, तो उसे पासपोर्ट देने से साफ इनकार कर दिया जाता है।
मंत्रालय के रुख के मुताबिक, पासपोर्ट नागरिकता का ‘सबूत’ तो हो सकता है, लेकिन यह ‘निर्णायक या अंतिम सबूत’ नहीं है। कानूनी तौर पर सरकार के पास यह अधिकार सुरक्षित है कि अगर उसे पता चले कि नागरिकता गलत तरीके से या तथ्य छिपाकर हासिल की गई है, तो वह पासपोर्ट जब्त या रद्द कर सकती है।
यह मुद्दा सिर्फ पासपोर्ट तक सीमित नहीं है। हाल ही में मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने भी यह कानूनी सवाल आया था कि क्या मौजूदा मतदाताओं से अपनी योग्यता साबित करने के लिए नए दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। वोटर आईडी कार्ड यह साबित करता है कि कोई व्यक्ति मतदाता के रूप में दर्ज है, लेकिन यह स्वतंत्र रूप से नागरिकता साबित नहीं करता।
जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 के तहत केवल नागरिक ही वोटर बन सकते हैं। हालांकि, चुनाव अधिकारियों को यह जांचने का अधिकार है कि किसी का नाम मतदाता सूची में वैधानिक रूप से सही शामिल है या नहीं।
भारत में ऐसा कोई एक सर्टिफिकेट नहीं है जो जन्म के साथ हर नागरिक को अपने आप मिल जाए और जिसे नागरिकता का सर्वमान्य प्रमाण माना जाए। फरवरी 2020 में गृह मंत्रालय (MHA) ने संसद में साफ किया था कि आधार, पासपोर्ट, वोटर आईडी, पैन कार्ड या जन्म प्रमाण पत्र को नागरिकता का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।
भारत में नागरिकता, संविधान और नागरिकता अधिनियम, 1955 से तय होती है। यह जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिककरण या किसी क्षेत्र के भारत में शामिल होने के आधार पर मिल सकती है। कानूनी मामलों में अदालतें भी किसी एक दस्तावेज को अंतिम मानने के बजाय कई दस्तावेजों और परिस्थितियों को मिलाकर देखती हैं।
इसका सीधा जवाब है- नहीं। भारत ने कभी भी कोई नेशनल सिटिजनशिप कार्ड (राष्ट्रीय नागरिकता कार्ड) नहीं अपनाया है। आधार कार्ड कानूनन सिर्फ भारत के निवासियों के लिए है, केवल नागरिकों के लिए नहीं। आधार एक्ट में स्पष्ट है कि यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है। पैन और राशन कार्ड की बात करें तो पैन कार्ड टैक्स चुकाने वालों की पहचान के लिए है और राशन कार्ड कल्याणकारी योजनाओं में शामिल होने का सबूत है।
नागरिकता प्रमाण पत्र – नागरिकता अधिनियम के तहत जारी यह सर्टिफिकेट ही एकमात्र ऐसा दस्तावेज है जो सिटिजनशिप को सीधे तौर पर प्रमाणित करता है। लेकिन यह केवल उन लोगों को मिलता है जिन्होंने रजिस्ट्रेशन या प्राकृतिककरण के जरिए नागरिकता ली है, न कि जन्म से नागरिकता पाने वाले बहुसंख्यक भारतीयों को।
भारत की कानूनी व्यवस्था लंबे समय से इस धारणा पर काम कर रही है कि जब तक कोई विशेष विवाद न हो, अधिकांश लोग नागरिक हैं। लेकिन जब भी नागरिकता के सत्यापन या मतदाता सूची की जांच की बात आती है, तो एक सर्वमान्य दस्तावेज की कमी साफ नजर आती है। विदेश मंत्रालय के इस बयान ने फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जिस देश में वोट देने, सरकारी पद पाने और संवैधानिक अधिकारों के लिए नागरिकता जरूरी है, वहां एक आम नागरिक अपनी नागरिकता साबित करने के लिए आखिर किस दस्तावेज पर पूरी तरह भरोसा करे।
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