अगली चुनावी बिसात का अर्थ – Live Hindustan

भारतीय लोकतंत्र की एक दिलफरेब खूबी यह है कि यह हर पल चुनाव ओढ़ता और बिछाता है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जबरदस्त जीत का खुमार अभी उतरा न था कि अगले मतपर्व के लिए बिसातें बिछने लगी हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा के ये चुनाव महत्वपूर्ण साबित होने जा रहे हैं। वे इन प्रदेशों के साथ क्षेत्रीय पार्टियों, क्षत्रपों और सियासी खानदानों के अस्तित्व का फैसला सुनाएंगे।
मसलन, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के बीच दिलचस्प मुकाबला होने जा रहा है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव इस चुनाव को जीतने के लिए जी-जान से जुटे हुए हैं। वह जानते हैं कि कोई भी क्षेत्रीय दल लगातार तीन बार हारकर अपने अस्तित्व को जस का तस नहीं रख सकता। सन् 2024 के लोकसभा चुनावों में 37 सीट जीतने के कारण उनके हौसले बुलंद हैं। हालांकि, उनकी डगर आसान नहीं है। उनका सामना दमदार छवि वाले योगी आदित्यनाथ से होना है। कानून-व्यवस्था के सफल संचालन के अलावा बहुसंख्यक मतदाताओं में उनका खास रसूख है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट में दूसरे नंबर का दर्जा रखने वाले राजनाथ सिंह इसी प्रदेश से चुनकर आते हैं। भारतीय जनता पार्टी इनकी राजनीतिक कद-काठी का अवश्य लाभ उठाना चाहेगी।
उस दौरान मायावती का भी निर्णायक इम्तिहान होगा। साल 2007 में विशाल बहुमत से सत्ता-सदन में पहुंची बहुजन समाज पार्टी के दुर्दिन चल रहे हैं। इस वक्त लोकसभा में उसकी शून्य और विधानसभा में महज एक सदस्य की नुमाइंदगी रह बची है। नई पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए उन्होंने भतीजे आकाश आनंद को अपना ‘डिप्टी’ बनाया है। यह प्रयोग सफल न हुआ, तो उन्हें दोहरा नुकसान उठाना पड़ेगा। हार के साथ वंशवाद की तोहमत उनके ऊपर होगी।
पंजाब का बादल परिवार भी समान सियासी संक्रमण का शिकार है। सन् 2017 में दस वर्षीय हुकूमत से हटने के बाद से उनके वोट शेयर में चुनाव-दर-चुनाव गिरावट आई है। कभी चंडीगढ़ से दिल्ली तक पार्टी के शीर्ष पुरुष प्रकाश सिंह बादल का दबदबा होता था। उनके बुढ़ाने के साथ शिरोमणि अकाली दल की कमान उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल के हाथ में चली गई। उन दिनों समय के बदलाव के साथ पार्टियों का कॉरपोरेटीकरण हो रहा था। वे आंदोलन और क्षेत्रीय अस्मिता को ताक पर रख निजी लाभ-हानि का उद्यम बन चली थीं। सुखबीर सिंह बादल पर आरोप लगे कि वह व्यावसायिक वाहनों के बेड़े, क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ अकूत चल-अचल संपत्ति के मालिक बन गए हैं। इसी बीच 2015 में गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी के आरोप उछले। यहीं से शिरोमणि अकाली दल की पतनगाथा की शुरुआत हुई। यह उनके राजनीतिक जीवन पर एक और आघात था।
सुखबीर के प्रभुत्व काल में पंजाब में नशे का कारोबार शीर्ष पर पहुंच गया था। सरकार के एक ताकतवर मंत्री पर इसकी तिजारत के आरोप थे। नतीजतन, उड़ता पंजाब जैसी फिल्में बनने लगीं। आम आदमी पार्टी ने इसे मुख्य मुद्दा बनाया और 2017 में 20 सीटें जीतकर शिरोमणि अकाली दल को तीसरे नंबर पर धकेल दिया। 2022 के विधानसभा चुनाव में 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई। यह पहला मौका था, जब अकाली दल को सिर्फ तीन सीटों पर मन-मसोसकर रह जाना पड़ा। प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर तक अपनी सीट गंवा बैठे थे। सन् 2024 का लोकसभा चुनाव तो और प्रलयंकारी साबित हुआ। इस बार वह सिर्फ एक सीट जीत सके।
किसान आंदोलन के दौरान भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल का जो तलाक हुआ, वह आज तक कायम है। इस बार भगवा दल ने पंजाब में अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ने का एलान किया है। यही वजह है कि बहुत सी सीटों पर चतुष्कोणीय मुकाबले की स्थिति बन रही है। कांग्रेस को यहां भी कड़ा इम्तिहान देना है, क्योंकि वह 2022 तक इस सूबे पर राज करती थी। आम आदमी पार्टी के लिए भी यह अस्तित्व की लड़ाई है। दिल्ली गंवाने के बाद अब उसके कब्जे में यह अकेला प्रदेश है। ‘एंटी इनकम्बेंसी’ के साथ मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान इन दिनों ‘बेअदबी’ के घातक आरोपों में फंसे हुए हैं।
अब उत्तराखंड पर आते हैं। यहां भारतीय जनता पार्टी साल 2017 से हुकूमत में है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर इस समय नौजवान पुष्कर सिंह धामी विराजमान हैं। धामी अपनी तेजी और तत्काल निर्णय लेने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। भाजपा में अंदरूनी कलह है, लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सार्वजनिक घोषणा की है कि यह चुनाव पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। इसका अनुकूल संदेश कार्यकर्ताओं पर पड़ा है। धामी की अगुवाई में भाजपा जीत के प्रति आश्वस्त प्रतीत होती है।
उत्तराखंड में भी कांग्रेस की कड़ी परीक्षा होनी है। पार्टी ने तेज-तर्रार गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर हताश कार्यकर्ताओं में नई चेतना फूंकने की कोशिश की है, लेकिन हरीश रावत जैसे बुजुर्ग नेता उनकी राह में कांटे बिछाते रहते हैं। क्या राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे भाजपा जैसा फैसलाकुन कदम उठा सकेंगे?
मणिपुर और गोवा का मामला तो और दिलचस्प है। यहां भले ही किसी भी पार्टी की सरकार बने, लेकिन कुछ खानदानों का दखल जस का तस रहता है। इसे बनाए रखने के लिए वे कोई जतन नहीं छोड़ते। कई बार ऐसा हुआ है कि एक छत के नीचे रहने के बावजूद मियां-बीवी ने अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ा और जीता। यहां के निर्वाचन क्षेत्रों में वोटरों की संख्या अति सीमित होती है, इसलिए राजनीतिक परिवार उसे आसानी से अपनी मुट्ठी में रखते हैं।
अगले चुनाव में भी इस सिलसिले से निजात की कोई किरण नहीं दिखती।
इसके बावजूद तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, एम के स्टालिन, उद्धव ठाकरे, सुखबीर बादल और पवार परिवार के हश्र से यह सवाल उठना मौजूं है कि क्या खानदान आधारित ऐसे दलों के दिन अब लद चले हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर मोल-भाव करते आए हैं? इस सवाल का जवाब हमें लखनऊ से मिलेगा। अगर अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव जीत जाते हैं, तो वह ऐसी पार्टियों के लिए लाइट हाऊस साबित होंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन के सामने कांग्रेस की अगुवाई में अगले साल एक मजबूत गठजोड़ की संभावनाएं प्रबल हो उठेंगी।
यही वजह है कि सभी दल जीत के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहेंगे। हमें भी इन चुनावों के दौरान कुछ नए, लेकिन अप्रिय प्रसंगों के लिए खुद को तैयार कर लेना चाहिए। पिछले तमाम चुनाव यही ताकीद करते हैं।
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