इंदिरा गाथा:रोशनी और परछाइयां – Hindustan

वह सितंबर, 1982 की एक खुशनुमा सुबह थी। मैं कहीं से इलाहाबाद स्थित घर लौट रहा था कि बगल के मोहल्ले जॉर्ज टाउन में पीएसी और स्थानीय पुलिस के कुछ जवान खड़े दिखाई पड़े। वर्दीधारियों के उस समूह का नेतृत्व कर रहे अधिकारी से मेरी जान-पहचान थी। उनकी वहां तैनाती का कारण पूछने पर प्रति-प्रश्न मिला- आप नहीं जानते, प्रधानमंत्री आ रही हैं?

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, अचानक? क्यों?

इन सवालों पर विचार करता हुआ मैं वहीं खड़ा हो गया। सामने श्रीमती एस एस नेहरू का बंगला था। वह ब्रिटेन में भारत के पहले उच्चायुक्त स्वर्गीय एस एस नेहरू की पत्नी थीं। एस एस नेहरू और जवाहरलाल नेहरू करीबी रिश्तेदार हुआ करते थे और उनके यहां प्रधानमंत्री का आना कोई अनोखा नहीं था, लेकिन दो-तीन दिनों बाद ही उन्हें तत्कालीन सोवियत संघ के महत्वपूर्ण दौरे पर जाना था। एक शाम पहले तक प्रशासनिक हलकों में उनके आने की कोई हलचल नहीं थी। आधिकारिक कार्यक्रम भी जारी नहीं हुआ था। सड़कों के गड्ढों पर पड़ी ताजा मिट्टी गवाह थी कि इनको आनन-फानन रातोंरात भरा गया है। उस समय तक सफाईकर्मी सड़कों के दोनों ओर चूना डालने और रह-बचे सफाई कार्य को पूरा करने में जुटे थे।

यह हड़बड़ी क्यों?

मेरे लिए यह सवाल अब और महत्वपूर्ण हो चला था। इसी बीच वहां पहुंचे एक प्रशासनिक अधिकारी से पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया, श्रीमती नेहरू बीमार हैं, इसलिए इंदिरा जी उनसे मिलने आ रही हैं, क्योंकि इस बार उनकी सोवियत संघ की यात्रा पांच दिन लंबी है। जवाब मेरे गले नहीं उतरा, लेकिन वह समय ज्यादा पूछताछ का नहीं था। मैं मौके से हटना भी नहीं चाहता था। कुछ ही देर में नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका के संवाददाता मजहर हैदर आते दिखे। हैदर साहब मेरे दोस्त हुआ करते थे। जब उन्हें मालूम पड़ा कि प्रधानमंत्री अचानक आ रही हैं, तो उनके भी वहां से हिलने का सवाल पैदा नहीं होता था। इसी बीच खबर आई कि श्रीमती गांधी बमरौली हवाई अड्डे पर उतरकर जॉर्ज टाउन की ओर बढ़ चली हैं। तब आज की तरह बहुत पहले से सड़कें जाम नहीं की जाती थीं। इसी दौरान एक और पत्रकार राधेश्याम पटेल वहां आ पहुंचे। हम तीनों संयोगवश वहां आ मिले थे। किसी को प्रधानमंत्री के आने की पूर्व सूचना नहीं थी।

थोड़ी देर में प्रधानमंत्री आईं और उनकी गाड़ी सीधे अंदर चली गई। उनके साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र और विश्वनाथ प्रताप सिंह मौजूद थे। प्रधानमंत्री काफी देर अंदर रहीं, लेकिन श्रीपति मिश्र रह-रहकर बरामदे में चक्कर लगाते रहे। मैंने और पटेल ने कई बार उन्हें आवाज देकर अपनी ओर बुलाने का प्रयास किया। हमसे तंग आकर वह अंदर चले जाते, लेकिन पता नहीं क्यों, फिर बाहर आ जाते। हमारे हल्ले-गुल्ले से मजबूर होकर उन्हें हमारे समीप आना पड़ा। रुष्ट भाव से उन्होंने पूछा कि आप लोग क्यों शोर मचा रहे हैं? मैंने कहा, हम तीनों पत्रकार हैं और प्रधानमंत्री से मिलना चाहते हैं। उन्होंने मुंह बिचकाया और लौट चले। थोड़ी देर में इंदिरा गांधी बाहर निकलीं और अपनी गाड़ी में बैठने लगीं, तभी उनके एक सहयोगी ने उनसे कुछ कहा। वह उम्मीद से टकटकी लगाए हम लोगों की ओर मुड़ीं और अंदर आने का इशारा किया। हम तीनों उनके समीप चले गए।

इंदिरा गांधी ने अपने आने का कारण उत्तर प्रदेश में आई बाढ़ को बताया था और तीन-चार मिनट की मुख्तसर-सी बात के बाद अचानक उन्होंने सीधी नजरों से मेरी ओर देखा। उनकी भृकुटियों में हल्का सा बल आया और पूछा- तुम वाकई पत्रकार हो? देखने में तो कॉलेजिएट लगते हो। मैंने उन्हें आश्वस्त किया। वह मुस्कराईं और हल्के हाथ से कंधा थपथपाकर बोलीं- पत्रकार हो, तो कुछ पढ़ा करो। इसी शहर में पंडितजी और पीडी (टंडन) पत्रकार हुआ करते थे। इतना कहकर वह गाड़ी में सवार हो गईं।

इंदिरा गांधी के बारे में ऐसे तमाम किस्से प्रचलित हैं, लेकिन उनकी पुण्यतिथि से ऐन पहले मैं उनके व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं पर भी बात करना चाहूंगा।

जिस दिन मेरी उनसे यह मुलाकात हुई, उस दिन तक वह कुलजमा 13 साल, 10 महीने हुकूमत कर चुकी थीं। इसी बीच उन्होंने आपातकाल लगाया था और वह सत्ता बदर हो गई थीं। जनता पार्टी के वार्धक्य बोध से बोझिल सरकार ने उन्हें तिहाड़ की हवा खिला दी थी। यह फैसला दिल्ली दरबार को महंगा पड़ा था। मोरारजी देसाई और उनके सहयोगी नहीं जानते थे कि इंदिरा गांधी को सम्मान देने वाले लोग उनसे खफा थे, विरक्त नहीं। तिहाड़ जेल के दरवाजे जब उनकी वापसी के लिए खुले, उसी दिन तय हो गया था कि सत्ता का द्वार पुन: उनके लिए खुल चुका है। 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस (इ.) को 353 सीटें हासिल हुई थीं। इस तरह वह तीसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार के साथ सत्तानशीं हुई थीं। उनके चाहने वाले उन्हें दुर्गा तक मानते थे, जबकि विरोधी तानाशाह।

कुछ की नजरों में वह ऐसी लौह महिला थीं, जिनके लिए कुछ भी असंभव नहीं था। ऐसे लोग सगर्व बताते कि यह इंदिरा गांधी का ही माद्दा है, जिन्होंने सिक्किम का भारत में विलय किया और पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांटा। भारत में हरित क्रांति को परवान चढ़ाया और अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को धता बताकर सोवियत संघ की सहायता से जो चाहा, वह किया। वह भारत की अकेली प्रधानमंत्री हैं, जिनके शासनकाल में दो बार इस महाद्वीप का नक्शा परिवर्तित हुआ। हालांकि, यह तस्वीर का एक पहलू मात्र है। वह इंदिरा गांधी ही थीं, जिन्होंने तत्कालीन 22 में से नौ राज्यों की सरकारें भंग कर दी थीं। जनता पार्टी द्वारा नियुक्त राज्यपालों को एक-एक करके रुखसती के लिए मजबूर किया था। उनके वक्त में कांग्रेस पार्टी में जितनी बार टूट-फूट हुई, वह अभूतपूर्व थी।

यही नहीं, इंदिरा गांधी के समय में ही पंजाब की समस्या जन्मी और इतनी विकराल हो गई कि उन्हें हरमंदिर साहिब में टैंकों का इस्तेमाल करना पड़ा। नतीजतन, सिख अंगरक्षकों ने 31 अक्तूबर, 1984 को प्रधानमंत्री के सरकारी आवास में उनकी हत्या कर दी। इससे कुछ दिनों पहले तक असम और उत्तर-पूर्व में शोले भड़क रहे थे। तब तक कश्मीर में आतंकवाद शुरू नहीं हुआ था, लेकिन वहां अलगाववाद की भावना को रोकने के लिए कश्मीरी होने के बावजूद वह सार्थक पहल नहीं कर पाई थीं। यहां इतिहास के विनम्र विद्यार्थी के तौर पर इतिवृत्तों का ही एक अनसुलझा सवाल आपके सामने रखना चाहूंगा। बहुत सी घटनाएं अथवा निर्णय देश, काल और परिस्थितियां पैदा करती हैं। यही वजह है कि हर समीक्षक इस उधेड़बुन में रहता है कि बरसों बाद उनकी समीक्षा कैसे की जाए? हम सब अपने-अपने चश्मे से उन फैसलों की रंग-ओ-बू आंकते हैं।

इंदिरा गांधी को कोई कैसे भी परखे, लेकिन इतना सच है कि भारतीय राजनय पर वह ऐसी लकीर खींच गईं, जिसकी अलग पहचान आज तक कायम है।

शश‍ि शेखर
एडिटर-इन-चीफ, ह‍िन्‍दुस्‍तान

दुन‍िया के ल‍िए सच जरूरी है और सच के ल‍िए जरूरी हैं प्रोफेशनल ट्रूथ टेलर। शश‍ि शेखर प्रोफेशनल ट्रूथ टेलर हैं। चार दशकों से अधिक उनके पत्रकारिता जीवन का यही सार है। ह‍िन्‍दुस्तान के एडिटर-इन-चीफ के रूप में वह भारत के सबसे प्रभावशाली संपादकों में गिने जाते हैं। प्लेटो की आइडियोलॉजी से मुतमइन शशि शेखर की कलम सत्ता से सवाल करती है, समाज को आईना दिखाती है और पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है। उन्‍होंने समाचार देने तक सीम‍ित रखने के पारंपर‍िक प्रैक्टिस को बदला और संदेशों के ऐसे नए मॉडल प्रस्‍तुत किए ज‍िसने मीडिया की ड्यूटी का व‍ितान जन-कल्‍याण तक फैलाया। डिज‍िटल मीडिया आने से पहले ही उन्‍होंने र‍ियल टाइम र‍िपोर्टिंग, व‍िजुअल प्रेजेंटेशन और पर्सनलाइजेशन का ऐसा प्रयोग किया क‍ि पाठकों को लगता वह खबरें पढ़ नहीं रहे, देख रहे हैं, घटनाएं अभी-अभी घटी हैं, और यह खबर तो उनके ल‍िए ही खासकर ल‍िखी गई है।

काशी ह‍िन्‍दू विश्वविद्यालय (BHU) में पढ़ते हुए शशि शेखर ने 1980 में प्रतिष्ठित हिंदी दैन‍िक ‘आज’ के साथ पत्रका‍र‍िता शुरू की। महज चार सालों में, 1984 में वह भारत के सबसे युवा रेस‍िडेंट एडिटर बने। उन्‍होंने ह‍िन्‍दुस्‍तान के 21 संस्करणों के साथ-साथ कादम्बिनी, नंदन और LiveHindustan.com का कुशल नेतृत्व किया है। इससे पहले अमर उजाला में ग्रुप एडिटर और आज तक में एक्‍ज‍िक्‍यूटिव प्रॉड्यूसर रहते हुए उसे शीर्ष पर पहुंचाया। हर पड़ाव पर उन्होंने संस्थाएं नहीं बनाईं, पत्रकारिता की नई परंपराएं गढ़ीं।

शशि शेखर की कलम भारत के उन तमाम कालखंडों के साथ-साथ चली है, ज‍िसने इस देश की तस्वीर को हमेशा के लिए बदल दिया। आपातकाल के बाद की उथल-पुथल और ऑपरेशन ब्लू स्टार की पीड़ा से लेकर, 1984 के सिख विरोधी दंगों की विभीषिका, 1991 में राजीव गांधी की हत्या से आए राजनीतिक भूकंप और 1999 के करगिल युद्ध की रणनीतिक अग्निपरीक्षा; इन घटनाओं को सूक्ष्म दृष्टि और संवेदनशीलता के साथ परखा और प्रस्तुत किया। नोटबंदी के अप्रत्याशित झटके पर उनका लेखन इस बात का प्रमाण रहा कि वह केवल घटनाएं नहीं देखते, भारत की नब्ज पहचानते हैं।

शश‍ि शेखर लिखते नहीं, संवाद करते हैं। अपने पाठकों से, अपने समाज से, अपने देश से। उनका हर शब्द एक सेतु है जो सूचनाओं को समझ में, समझ को चेतना में और चेतना को सकारात्मक बदलाव में रूपांतरित करता है।

वह केवल पाठक नहीं बनाते, सोचने वाले नागरिक बनाते हैं। उनकी कलम ने इतिहास को केवल दर्ज नहीं किया, उसे महसूस किया, परखा और आने वाली पीढ़ियों के लिए संजो दिया है।
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