बेंजामिन नेतन्याहू को रोकने और बहुमत के संकट से पार पाने के लिए इजरायली विपक्ष सीधे पीएम चुनाव का कानून …और पढ़ें
नेतन्याहू के खिलाफ विपक्ष ने बनाया प्लान।
इजरायल में आम चुनाव के बाद राजनीतिक गतिरोध जारी है।
विपक्ष सीधे पीएम चुनाव कानून लाने पर विचार कर रहा है।
यह कदम नेतन्याहू को रोकने और सरकार बनाने के लिए है।
डिजिटल डेस्क, तेल अवीव। इजरायल आम चुनाव 2026 अभी तक किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा है। चाहे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी हो या फिर उनके विपक्षी गादी आइजनकोट की, मतगणना के बाद परिणाम यह है कि किसी भी पार्टी के पास अपना बहुमत नहीं है।
ऐसी स्थिति में यह कहना गलत नहीं होगा कि इजरायल में चुनावों के बाद राजनीतिक गतिरोध गहराता जा रहा है। देश में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, जिससे सरकार गठन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
इस बीच, ‘द टाइम्स ऑफ इजरायल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू विरोधी विपक्षी गुट इस असमंजस की स्थिति को खत्म करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने पर विचार कर रहा है। रिपोर्ट की माने तो यह विचार इजरायल में प्रधानमंत्री के लिए सीधे चुनाव कराने का कानून लाने पर किया जा रहा है।
ऐसे में अब सवाल है कि अगर विपक्षी गठबंधन की यह योजना सच है तो फिर इजरायल में क्या होगा? इससे नेतन्याहू का क्या होगा? और सबसे बड़ा सवाल इसके बाद इजरायल की राजनीति किस ओर जाएगी?
रिपोर्ट के अनुसार विपक्ष डायरेक्ट पीएम चुनाव कराने की प्रस्वात लाने पर विचार कर रहा है। इस प्रस्ताव के तहत मतदाता सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का चुनाव अलग से कर सकेंगे।
इजरायल में जारी राजनीतिक संकट के बीच अगर यह नियम लागू हो जाता है, तो जो उम्मीदवार सीधे प्रधानमंत्री पद का चुनाव जीतेगा, वह 120 सीटों वाली संसद नेसेट में बहुमत हासिल किए बिना भी अल्पसंख्यक सरकार बना सकेगा।-1793441759573.webp)
दूसरी ओर विपक्षी दल इस रास्ते का इस्तेमाल इसलिए भी करना चाहते हैं ताकि उन्हें अरब राजनीतिक दलों के समर्थन पर निर्भर न रहना पड़े, जिन्हें लेकर वे असहज रहते हैं। खास बात यह है कि मार्च 2021 के चुनावों में बहुमत को लेकर ऐसी स्थिति बनने के बाद जब बेंजामिन नेतन्याहू खुद गठबंधन नहीं बना पा रहे थे, तब उन्होंने भी ऐसा ही प्रस्ताव आगे बढ़ाया था।
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि इस नई व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं है। इसके लिए इजरायल के ‘बेसिक लॉ- द गवर्नमेंट’ में संशोधन करना होगा। वर्तमान कानून के मुताबिक, सरकार बनाने से पहले नेसेट में विश्वास मत जीतना अनिवार्य है। इस नियम को बदलने के लिए संसद में कम से कम 61 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।
अब बात अगर वर्तमान चुनाव और परिस्थिति की करें तो इस चुनावों में न तो प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गुट और न ही विपक्ष बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर पाया। विपक्ष को कुल 67 सीटें मिलीं जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलीं।-1793441780970.webp)
हालांकि, विपक्षी 67 सीटों में 48 सीटें यहूदी जायनिस्ट पार्टियों की हैं और 19 सीटें अरब गैर-जायनिस्ट पार्टियों की हैं। यहूदी विपक्षी नेता शुरुआत में अरब पार्टियों के साथ खुलकर सरकार बनाने से हिचकिचा रहे थे।
इजरायल में शनिवार शाम को एक तरफ जहां राजनीतिक जोड़-तोड़ चल रही है, वहीं दूसरी तरफ सड़कों पर प्रदर्शनों की तैयारी है। ‘स्टैंडिंग टूगेदर’ नामक संगठन के आह्वान पर तेल अवीव के हाबिमा स्क्वायर, यरुशलम के पेरिस स्क्वायर के साथ-साथ बीर्शेबा, हाइफा और तयिबे में प्रदर्शन हो रहे हैं।
लोगों का कहना है कि बदलाव चाहने वाले यहूदी-अरब मतदाताओं ने बहुमत दिया है, इसलिए अगली सरकार में भी यह साझेदारी दिखनी चाहिए। आयोजकों का तर्क है कि अरब नागरिकों के वोटों की कीमत भी यहूदी वोटों के बराबर ही है और देश के भविष्य को तय करने में उन्हें पूरा साझीदार होना चाहिए।
गौरतलब है कि 4 नवंबर को वोटों की जांच और अन्य औपचारिकताओं के बाद अंतिम आधिकारिक चुनाव परिणाम इजरायल के राष्ट्रपति इस्रायल ह्जोर्ग को सौंपे जाएंगे। फिर 10 नवंबर को नव-निर्वाचित संसद का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जाएगा।
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