इस 10 अक्तूबर का संदेश – Hindustan

नई दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अक्तूबर के 10वें दिन अजीब सनसनी थी। कुल 245 रेलगाड़ियां निरस्त थीं। महानगर की जीवन-रेखा मेट्रो के 40 से अधिक स्टेशन बंद थे। नगरीय बस सेवा के मार्गों में तब्दीली थी। कई स्कूल ऑनलाइन कक्षाएं चला रहे थे, तो कुछ परीक्षाएं रद्द कर दी गई थीं। सड़कों पर अभूतपूर्व नाकाबंदी और सुरक्षा बलों की तैनाती थी।
पुरानी शब्दावली में कहें, तो परिंदा तक पर नहीं मार सकता था।
ऐसा हुआ भी। कॉकरोच जनता पार्टी के कॉकरोचों का जंतर मंतर तक पहुंचने का मनसूबा धरा रह गया। उनके कार्यकर्ता बड़ी संख्या में दिल्ली नहीं पहुंच सके। शीर्ष नेता अभिजीत दीपके सहित जो पहुंच गए, वह जहां-तहां हिरासत में ले लिए गए। सुरक्षा दस्तों ने दिन भर में सात हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिया। इससे कुपित सीजेपी ने प्रतिरोध जारी रखने की घोषणा की है। ऐसा लगता है, लंबे अंतराल के बाद देश में आंदोलन, आंदोलनकर्ता और आंदोलनजीवी लौट आए हैं।
यहां कुछ यक्ष प्रश्न सिर उठाते हैं।
क्या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से परीक्षाओं की पवित्रता सदा-सर्वदा के लिए बहाल हो गई? क्या ज्ञानेश कुमार के त्यागपत्र से सारी शिकायतें हमेशा के लिए दूर हो जाएंगी? अगर ज्ञानेश पद त्याग देते हैं, तो क्या आंदोलनकारी यह वायदा करेंगे कि वे इसके बाद कोई आंदोलन नहीं करेंगे? कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन तो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ही खत्म हो गया था। अब वे मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मैदान में हैं। क्या ये नौजवान कोई राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ना चाहते हैं? आखिर एक के बाद दूसरा मुद्दा उठा लेने का सबब क्या है?
इन सवालों के जवाब के लिए मंगलवार की ओर लौटते हैं।
उस दिन राहुल गांधी की अगुवाई में ‘इंडिया’ ब्लॉक के दो सौ से अधिक सांसद संसद के मकर द्वार से चुनाव आयोग की ओर कूच करते हैं। पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों ने उन्हें आकाशवाणी भवन के पास हिरासत में ले लिया, लेकिन राहुल गांधी और प्रियंका की अगुवाई में प्रमुख कांग्रेसजन नौ घंटे तक वहीं जमे रहे। उनका कहना था कि वे और उनके सहयोगी चुनाव आयुक्तों से मिलने जा रहे हैं। उधर, चुनाव आयोग का कहना था कि उन्हें मुलाकात के लिए कोई अनुरोध नहीं मिला। मामला लंबा खिंचता देख पुलिस ने शाम 8 बजे उन्हें उठाया और दूर ले जाकर छोड़ दिया। अगले दिन उन्हें और प्रियंका गांधी समेत अन्य कांग्रेस नेताओं को जंतर मंतर की ओर जाते वक्त हिरासत में लिया गया। गुरुवार को यह टोली राजघाट जा पहुंची और शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन।
यह जानना रोचक होगा कि राष्ट्रपति से मुलाकात के ऐन बाद राहुल गांधी ने पत्रकारों को जो बताया, उसे राष्ट्रपति कार्यालय के ‘सूत्रों’ ने 90 मिनट से कम वक्त में ही नकार दिया।
यह संयोग नहीं कि राहुल गांधी गुजरे चार महीनों में कई बार लोगों को चौंका चुके हैं। पहली बार वह प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास के समक्ष जा बैठे थे और तब भी उन्हें जबरन हटाने के फोटो एवं वीडियो वायरल हुए थे। अगला नंबर संसद मार्ग थाने का था और इस बार उन्होंने नई दिल्ली की मुख्तलिफ जगहों को चुना। इनमें से कोई सत्ता और शक्ति का केंद्र है, तो कोई भीड़ का। राजनीति के लिए दोनों जरूरी हैं।
‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद से वह लगातार इस आरोपित तोहमत को पोंछने की कोशिश कर रहे हैं कि वह सड़क पर संघर्ष का माद्दा नहीं रखते। समय ने उन्हें समझा दिया है कि जो दिखता है, वह बिकता है। सड़कों पर पुलिस बलों से जद्दोजहद के उनके वीडियो करोड़ों लोगों ने देखे हैं।
आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में चुनाव होने हैं। अखिलेश यादव के साथ राहुल गांधी की सार्वजनिक जुगलबंदी को इस परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है। हालांकि, उत्तर प्रदेश में पार्टी का खास वजूद नहीं है, जबकि मेघालय और गोवा में शिथिलता के कारण सरकार बनाने का मौका उसके हाथ से खिसकता चला गया है। पंजाब में आम आदमी पार्टी ने न केवल सरकार की चाबी छीनी, बल्कि खुद को खासा स्थापित कर लिया। कांग्रेस इसीलिए अब और मौके गंवाने के मूड में नहीं है। पिछले 12 वर्षों में पार्टी ने यह समझ लिया है कि चाहे विरोध हो या सुधार, जन-कल्याण हो या जनमत संजोने की जुगत, मौका नहीं गंवाना चाहिए।
कॉकरोच जनता पार्टी के जुलाई आंदोलन के दौरान इसीलिए राहुल गांधी प्रधानमंत्री आवास के सामने जा डटे थे, क्योंकि वह एक और शक्ति को पनपने का मौका नहीं देना चाहते। सीजेपी के 10 अक्तूबर के प्रस्तावित जमावड़े से पहले ही उन्होंने खुद को प्रतिरोध के मुख्य चेहरे के तौर पर स्थापित करने की पुनः पुरजोर कोशिश की है।
आम आदमी पार्टी ने उस हाई वोल्टेज ड्रामे से दूरी बनाकर रखी। आने वाले दिनों में पंजाब में चुनाव के दौरान उसका सीधा संघर्ष कांग्रेस से होना है। उसके बाद गुजरात में भी उसकी चाहत विधानसभा चुनाव में मिले 12.92 प्रतिशत वोट को बढ़ाने की है। यही वजह है कि आप कांग्रेस का बगलगीर बनने से बच रही है। विडंबना देखिए, केजरीवाल यहां भी कांग्रेस की भूलों से ही सबक ले रहे हैं। कांग्रेस ने अतीत में वामपंथियों, समाजवादियों, लालू यादव या कभी मायावती से ‘समान मूल्यों पर सहमति’ के तहत जो समझौते वक्ती तौर पर किए थे, उन्होंने उसकी काल-जर्जरता को बढ़ा दिया।
यहां इंडिया ब्लॉक के अन्य सदस्यों की मजबूरी पर भी गौर फरमा देखिए।
वे अपने-अपने प्रदेशों में कांग्रेस को एक सीमा से अधिक बढ़ने नहीं देना चाहते, लेकिन अस्तित्व बचाने के लिए उन्हें ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ का साथ भी चाहिए। ममता बनर्जी इसका जीवंत उदाहरण हैं। उनके 20 लोकसभा और 4 राज्यसभा सदस्यों ने गैरों का दामन थाम लिया है। रह बचे जहां जाते हैं, उन्हें जलालत का सामना करना पड़ रहा है। उनकी पार्टी का नाम तक छिन चुका है। शुक्रवार को जगजाहिर हुए उप-चुनाव परिणाम भी उनके खिलाफ गए। यही हाल तेजस्वी यादव का है। 2020 के विधानसभा चुनाव में उनके 75 विधायक जीते थे। अब वह 25 पर सिमट चुके हैं।
इसी मुकाम पर कांग्रेस को उम्मीद दिखाई पड़ती है। बदलती परिस्थितियों में वह क्षत्रपों के साथ सम्मानजनक समझौते कर सकती है। राहुल गांधी की यह तमाम मशक्कत इसीलिए है। उनकी नजर साल 2029 के लोकसभा चुनावों पर है, लेकिन नरेंद्र मोदी जैसी लोकप्रिय शख्सियत से टकराने के पूर्व उन्हें आगामी विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करना होगा। क्या वह इसके लिए तैयार हैं? वहां उनके पास न संगठन है, न नेतृत्व।
न जाने क्यों, मुझे यहां हजरत निजामुद्दीन औलिया का प्रसिद्ध कथन याद आ रहा है, हनोज दिल्ली दूर अस्त, यानी दिल्ली अभी दूर है।
शश‍ि शेखर
एडिटर-इन-चीफ, ह‍िन्‍दुस्‍तान

दुन‍िया के ल‍िए सच जरूरी है और सच के ल‍िए जरूरी हैं प्रोफेशनल ट्रूथ टेलर। शश‍ि शेखर प्रोफेशनल ट्रूथ टेलर हैं। चार दशकों से अधिक उनके पत्रकारिता जीवन का यही सार है। ह‍िन्‍दुस्तान के एडिटर-इन-चीफ के रूप में वह भारत के सबसे प्रभावशाली संपादकों में गिने जाते हैं। प्लेटो की आइडियोलॉजी से मुतमइन शशि शेखर की कलम सत्ता से सवाल करती है, समाज को आईना दिखाती है और पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है। उन्‍होंने समाचार देने तक सीम‍ित रखने के पारंपर‍िक प्रैक्टिस को बदला और संदेशों के ऐसे नए मॉडल प्रस्‍तुत किए ज‍िसने मीडिया की ड्यूटी का व‍ितान जन-कल्‍याण तक फैलाया। डिज‍िटल मीडिया आने से पहले ही उन्‍होंने र‍ियल टाइम र‍िपोर्टिंग, व‍िजुअल प्रेजेंटेशन और पर्सनलाइजेशन का ऐसा प्रयोग किया क‍ि पाठकों को लगता वह खबरें पढ़ नहीं रहे, देख रहे हैं, घटनाएं अभी-अभी घटी हैं, और यह खबर तो उनके ल‍िए ही खासकर ल‍िखी गई है।

काशी ह‍िन्‍दू विश्वविद्यालय (BHU) में पढ़ते हुए शशि शेखर ने 1980 में प्रतिष्ठित हिंदी दैन‍िक ‘आज’ के साथ पत्रका‍र‍िता शुरू की। महज चार सालों में, 1984 में वह भारत के सबसे युवा रेस‍िडेंट एडिटर बने। उन्‍होंने ह‍िन्‍दुस्‍तान के 21 संस्करणों के साथ-साथ कादम्बिनी, नंदन और LiveHindustan.com का कुशल नेतृत्व किया है। इससे पहले अमर उजाला में ग्रुप एडिटर और आज तक में एक्‍ज‍िक्‍यूटिव प्रॉड्यूसर रहते हुए उसे शीर्ष पर पहुंचाया। हर पड़ाव पर उन्होंने संस्थाएं नहीं बनाईं, पत्रकारिता की नई परंपराएं गढ़ीं।

शशि शेखर की कलम भारत के उन तमाम कालखंडों के साथ-साथ चली है, ज‍िसने इस देश की तस्वीर को हमेशा के लिए बदल दिया। आपातकाल के बाद की उथल-पुथल और ऑपरेशन ब्लू स्टार की पीड़ा से लेकर, 1984 के सिख विरोधी दंगों की विभीषिका, 1991 में राजीव गांधी की हत्या से आए राजनीतिक भूकंप और 1999 के करगिल युद्ध की रणनीतिक अग्निपरीक्षा; इन घटनाओं को सूक्ष्म दृष्टि और संवेदनशीलता के साथ परखा और प्रस्तुत किया। नोटबंदी के अप्रत्याशित झटके पर उनका लेखन इस बात का प्रमाण रहा कि वह केवल घटनाएं नहीं देखते, भारत की नब्ज पहचानते हैं।

शश‍ि शेखर लिखते नहीं, संवाद करते हैं। अपने पाठकों से, अपने समाज से, अपने देश से। उनका हर शब्द एक सेतु है जो सूचनाओं को समझ में, समझ को चेतना में और चेतना को सकारात्मक बदलाव में रूपांतरित करता है।

वह केवल पाठक नहीं बनाते, सोचने वाले नागरिक बनाते हैं। उनकी कलम ने इतिहास को केवल दर्ज नहीं किया, उसे महसूस किया, परखा और आने वाली पीढ़ियों के लिए संजो दिया है।
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