सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अहम सवाल किया है. उन्होंने कहा है कि उत्तर भारत का कोई नास्तिक व्यक्ति सबरीमाला मंदिर में एंट्री करने के अधिकार दावा कैसे कर सकता है. इसके अलावा कोर्ट की तरफ से कहा गया है कि मंदिरों में एंट्री के अधिकार के मुद्दे पर फैसला लेते समय यह भी देखना होगा कि यह अधिकार कोई श्रद्धालु मांग रहा है, या गैर श्रद्धालु.
9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल समेत सबरीमाला समेत कई धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से होने वाले भेदवाव और अन्य धर्मों की तरफ से अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमाओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की है.
इस पीछ में भारत के सीजेआई सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल थे.
याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील इंदिरा जयसिंह ने क्या कहा है?
इस मामले में 2018 के फैसले का समर्थन कर रहीं दो महिलाओं बिंदु अम्मिनी और कनकदुरगा की ओर से पेश वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक अनुसूचित जाति की महिला है. उसे मंदिर जाने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन होगा.
इससे पहले 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के सबरीमाला अयप्पा मंदिर में एंट्री पर रोक हटा दी थी. साथ ही कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक है.
जयसिंह ने कहा कि आज हमें बताया जा रहा है कि जातिगत व्यवस्था से परे हिंदू सबरीमाला में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन महिलाएं नहीं. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 17 के कारण सभी पुरुषों को, जाति की परवाह किए बिना, प्रवेश का अधिकार है.
पीठ ने इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि महिला को अनुसूचित जाति से होने के कारण नहीं रोका गया था, बल्कि इसलिए रोका गया क्योंकि वह 10 से 50 साल आयु वर्ग की थी. सुनवाई के दौरान जयसिंह ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का बहिष्कार उनके जीवन के सबसे उत्पादक और सृजनशील काल, यानी 10 से 50 वर्ष की आयु के बीच लागू होता है.
‘मंदिर में प्रवेश और पूजा का अधिकार मौलिक अधिकार है’
उन्होंने कहा कि इस अवधि में महिला की स्थिति क्या है? क्या यह सबसे सृजनशील और सर्वाधिक प्रजनन क्षमता वाला समय नहीं है? आप मुझे आधा जीवन जीने को नहीं कह सकते. 10 से 50 वर्ष के बीच मत जियो, फिर 10 से पहले और 50 के बाद जियो. इससे गंभीर पृथक्करण होगा. जयसिंह ने कहा कि मंदिर में प्रवेश और पूजा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत मौलिक अधिकार है.
उन्होंने तर्क दिया कि 2018 का फैसला आने के बाद दोनों महिलाएं मंदिर गई थीं. उन्होंने कहा कि जब वे बाहर आईं, तब कुछ संघ नेताओं ने ‘शुद्धिकरण’ की बात की. मैंने इस अदालत में याचिका दायर की. उस समय फैसला पूरी तरह लागू था. यही दो महिलाएं थीं जो ऊपर चढ़ने और दर्शन करने में सफल हुईं.
जयसिंह ने कहा कि तब से कोई और सफल नहीं हुआ. क्यों? क्योंकि राज्य ने सहयोग नहीं किया. ऊपर जाने के लिए सुरक्षा देने से इनकार कर दिया गया. मैंने इस अदालत में याचिका दायर की, जिसमें मैंने सभी तथ्य दर्ज किए, जिनमें वे कौन हैं, क्या वे श्रद्धालु हैं, और किस राज्य से हैं, यह भी शामिल है.
इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह अधिकार कौन मांग रहा है? क्या कोई श्रद्धालु यह अधिकार मांग रहा है या कोई गैर-श्रद्धालु और किसके कहने पर? एक व्यक्ति जिसका इस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, वह कहीं उत्तर भारत में है. यह मंदिर दक्षिण भारत में है. प्रवेश का अधिकार मांगने का यह प्रश्न भी विचारणीय है. मामले की सुनवाई जारी है.
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Source: IOCL
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