एक ही जैसा दिखने वाला भारत का Su-30MKI और चीन का J-16 लड़ाकू विमान एक दूसरे की तुलना में कितना अलग है? अगर युद्ध में दोनों एक दूसरे के सामने आते हैं त …और पढ़ें
भारत का Su-30MKI और चीन का J-16।
भारत के Su-30MKI और चीन के J-16 की तुलना।
फुर्ती और कलाबाजी के आधार पर भारत का Su-30MKI आगे।
रडार के मामले में चीन का J-16 भी थोड़ा आगे।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत का सुखोई Su-30MKI और चीन का J-16 आज भले ही दो अलग-अलग देशों के झंडे तले उड़ान भर रहे हों, लेकिन इन दोनों की जड़ें एक ही सोवियत संघ रूस के ‘फ्लैंकर’ परिवार से जुड़ी हैं।
घातक Su-27 विमान की तकनीक से निकले ये दोनों भारी-भरकम लड़ाकू विमान आज भारतीय वायुसेना (IAF) और चीनी वायुसेना (PLAAF) की रीढ़ की हड्डी हैं। हालांकि इस बात में भी कोई दोहराई नहीं है कि दिखने में एक जैसे लगने के बावजूद, बीते कुछ दशकों के अपग्रेड्स ने इन दोनों लड़ाकू विमानों को अंदर से पूरी तरह बदल दिया है।
इस बात को ऐसे समझिए कि 1990 के दशक के आखिर में चीन ने रूस से Su-30MKK विमान खरीदा था। चीन ने इसके बाहरी ढांचे को तो वैसे ही रखा, लेकिन इसके अंदर की पूरी तकनीक को बदल दिया। चीन ने इसमें अपनी खुद की स्वदेशी रडार, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और मिसाइलें लगा दीं। आज चीन के पास ऐसे 300 से ज्यादा विमान सेवा में हैं।
अब बात भारत के Su-30MKI की
भारत ने चीन की तरह नया विमान बनाने के बजाय रूसी ढांचे के साथ दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीकों का कॉम्बिनेशन तैयार किया। भारत के सुखोई में रूस के ढांचे के साथ फ्रांस का नेविगेशन सिस्टम, इजरायल के इलेक्ट्रॉनिक्स और भारत के अपने स्वदेशी हथियार लगाए गए हैं। भारत के पास ऐसे 260 से ज्यादा विमान हैं।
भारत के सुखोई के पास सबसे बड़ा फायदा है। इसमें आगे की तरफ छोटे पंख और ‘थ्रस्ट-वेक्टरिंग’ इंजन लगे हैं, जो इसके धुएं के रुख को मोड़ सकते हैं। इसकी वजह से यह विमान हवा में ऐसी कलाबाजियां खा सकता है जो चीन का विमान सोच भी नहीं सकता। आसान भाषा में समझिए तो सुखोई नजदीकी लड़ाई में यह बहुत घातक है।
दूसरी ओर अब बात अगर चीन के J-16 की करें तो चीन के इस विमान में न तो आगे छोटे पंख हैं और न ही इसका इंजन हवा में मुड़ सकता है। हालांकि, इसे भारी वजन और ज्यादा हथियार उठाने के लिए बेहतर बनाया गया है।
बता दें कि सुखोई में में फिलहाल ‘PESA’ रडार लगा है। यह एक साथ कई ठिकानों पर नजर तो रख सकता है, लेकिन यह तकनीक थोड़ी पुरानी हो चुकी है। हालांकि, भारत जल्द ही ‘सुपर सुखोई’ प्रोजेक्ट के तहत इसमें बेहद आधुनिक स्वदेशी ‘AESA’ रडार लगाने जा रहा है।
दूसरी ओर चीन का J-16 विमान इस मामले में अभी आगे है। इसमें पहले से ही ‘AESA’ रडार लगा हुआ है, जिसे आसानी से जाम नहीं किया जा सकता और यह बहुत लंबी दूरी तक दुश्मन को देख सकता है।
भारत के Su-30MKI में रूस और इजरायल के मिले-जुले सिस्टम का इस्तेमाल करता है, जो काफी भरोसेमंद हैं। वहीं चीन के J-16 को शुरुआत से ही आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के हिसाब से ढाला है। चीन ने इसका एक खास वर्जन (J-16D) भी बनाया है, जिसका काम सिर्फ दुश्मन के रडार और संचार को ठप करना है।
भारत का सुखोई बेहद खतरनाक ‘ब्रह्मोस’ सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ले जा सकता है, जो दुनिया के किसी भी कोने में तबाही मचा सकती है। इसके अलावा इसमें भारत की स्वदेशी ‘अस्त्रा’मिसाइल भी लगी है। वहीं चीन का यह विमान पीएल-15 जैसी लंबी दूरी की मिसाइल से लैस है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मिसाइल बिना दिखे बहुत दूर से ही निशाना लगाने में माहिर है।
मुख्य रूप से यह यह इस बात पर निर्भर करता है कि लड़ाई किस तरह की हो रही है। उदाहरण के तौर पर अगर लड़ाई नजदीकी हुई और अगर दोनों विमान आसमान में एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं, तो भारत का Su-30MKI अपनी अद्भुत फुर्ती और कलाबाजियों के दम पर चीन के J-16 को आसानी से मार गिराएगा।
आज के दौर में विमान बिना सामने आए मीलों दूर से मिसाइल दागते हैं। इस मामले में फिलहाल चीन का J-16 आगे नजर आता है, क्योंकि उसके पास पहले से आधुनिक AESA रडार और लंबी दूरी की PL-15 मिसाइल का तालमेल है।
हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि चीन की यह बढ़त ज्यादा दिनों की नहीं है। भारत ने अपने सुखोई विमानों के लिए ‘सुपर सुखोई’ अपग्रेड प्रोग्राम तैयार किया है। इसके तहत जब भारत के सुखोई में नया स्वदेशी AESA रडार और नए जमाने के इलेक्ट्रॉनिक्स लग जाएंगे, तो दूरी की लड़ाई में भी चीन की बढ़त पूरी तरह खत्म हो जाएगी।