कनाडा में कट्टरता के खिलाफ उठी आवाज, भारतवंशियों ने कहा – ‘अब खामोशी नहीं चलेगी’ – News18 Hindi

ओटावा: कनाडा में बसे भारतवंशियों ने सालों से बढ़ती कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाई है. रविवार को वुडब्रिज, ओंटारियो स्थित ‘पैरामाउंट इवेंटस्पेस’ में आयोजित ‘नेशनल सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस’ कट्टरता के खिलाफ एकजुट होने का स्वर गूंजा. इस सम्मेलन का आयोजन कनाडा इंडिया फाउंडेशन (CIF) और TAFSIK की ओर से किया गया था, जिसका मकसद था कनाडा की घरेलू सुरक्षा को प्रभावित कर रहे विदेशी एजेंटों और अतिवादी विचारों पर खुलकर चर्चा करना. TAFSIK खालिस्तानी आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर काम कर रहा है.

CIF के संस्थापक और कार्यक्रम आयोजक रितेश मलिक ने कहा, ‘ये किसी खास समुदाय या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि कनाडा की आत्मा को बचाने के लिए है. हमने इस देश को उसकी शांति, मूल्य और लोकतंत्र के लिए चुना. लेकिन आज वही आधार खतरे में हैं. अब वक्त आ गया है कि देश के नियम बनाने वाले हमारी आवाज सुनें.’ इस सम्मेलन में एयर इंडिया फ्लाइट 182 के उस भयानक हादसे की भी चर्चा हुई, जिसे कनाडा का अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जाता है. 329 लोगों की जान लेने वाले इस बम धमाके के 40 साल पूरे होने पर संजय लाज़र, जिन्होंने इस हादसे में अपने पूरे परिवार को खोया, बेहद भावुक हो उठे. उन्होंने कहा, “ये सिर्फ एक विमान पर हमला नहीं था, ये कनाडा के मूल्यों पर सीधा वार था. हम चाहते हैं कि इस दर्दनाक अध्याय को कनाडा की शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जाए.”
सम्मेलन में एक सेशन ‘मानवता पर आतंक की कीमत’ पर आधारित था, जिसमें खासतौर पर यह बताया गया कि कैसे भारतीय-कनाडाई और यहूदी-कनाडाई समुदाय आज भी नफरत, धमकियों और हिंसा के साये में जी रहे हैं. पत्रकार डैनियल बोर्डमैन ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘हम इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों, पाकिस्तानी ISI समर्थित तत्वों, खालिस्तानी अलगाववादियों और वामपंथी चरमपंथियों से जूझ रहे हैं. ये लोग अब स्कूलों तक में घुसपैठ कर चुके हैं.’

पत्रकार वायट क्लेपूल ने कनाडा की विदेश नीति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, ‘हम भारत और इजरायल जैसे सहयोगियों को पीठ दिखाते हैं. हमें लगता है कि हर बार ‘डेस्केलेशन’ ही सही नीति है, जबकि कई बार सही और गलत को पहचानना ज़रूरी होता है.’ सम्मेलन में एक अहम मुद्दा था ‘बिल 63’ जिसे कई वक्ताओं ने मध्यमवर्गीय आवाजों को दबाने वाला कानून बताया. उन्होंने कहा, ‘ये कानून न केवल खुले संवाद को रोकता है, बल्कि अतिवादी विचारों को कानूनी सुरक्षा भी देता है.’

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