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इस साल दिवाली के मौक़े पर रणबीर कपूर स्टारर फ़िल्म 'रामायण' रिलीज़ हो रही है. नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म के बजट से लेकर कास्ट तक की काफ़ी चर्चा है.
फ़िल्म में राम का किरदार बॉलीवुड अभिनेता रणबीर कपूर निभा रहे हैं और सीता के रूप में साई पल्लवी हैं.
इस कड़ी में एक और नाम काफ़ी चर्चा में है और वो हैं कन्नड़ फ़िल्म अभिनेता यश.
यश इस फ़िल्म में रावण का किरदार निभा रहे हैं वह इसके को-प्रोड्यूसर भी हैं.
फ़िल्म का पहला हिस्सा पाँच नवंबर को रिलीज़ होने वाला है.
8 जनवरी 1986 को कर्नाटक के हासन ज़िले में जन्मे यश का असली नाम नवीन कुमार गौड़ा है.
आज उन्हें उनके असली नाम से कम और 'रॉकिंग स्टार यश' के नाम से ज़्यादा जाना जाता है.
बॉलीवुड हंगामा के साथ एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि नवीन कुमार गौड़ा कहकर बुलाए जाने पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी, तो उन्होंने मज़ाक़िया अंदाज़ में कहा था- कौन है ये?
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क्योंकि ज़्यादातर लोग उन्हें इस नाम से नहीं जानते हैं.
तो आख़िर एक छोटे शहर से निकलकर कन्नड़ सिनेमा के बड़े सितारों में शामिल होने और अब रावण की भूमिका निभाने तक यश का सफ़र कैसा रहा?
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यश का परिवार फ़िल्मों की दुनिया से नहीं था. उनके पिता बस ड्राइवर थे और यश ने अभिनय में करियर बनाने के लिए पढ़ाई के बाद थिएटर और टेलीविज़न से शुरुआत की.
2014 में ज़ी कन्नड़ के कार्यक्रम 'वीकेंड विद रमेश' में बात करते हुए यश बताते हैं कि वो बचपन से ही नाटकों और डांस प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया करते थे. बहुत छोटी उम्र से ही उन्हें लोगों की तालियाँ और सीटीयाँ इतनी अच्छी लगने लगीं कि उन्हें इसकी आदत लग गई.
वे कहते हैं, "मेरे शिक्षक जब मुझे 'हीरो' कहकर बुलाते थे तो मुझे बहुत अच्छा लगता था. धीरे-धीरे मेरे मन में हीरो बनने का विचार बैठ गया. तभी मैंने सोच लिया था कि जो भी हो अब मुझे फ़िल्मों में एक्टर ही बनना है."
लेकिन उनकी शुरुआती ज़िंदगी मुश्किल भरी थी. इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनके पिता बीएमटीसी (बेंगलुरु महानगर परिवहन निगम) में ड्राइवर थे और हर रोज़ सिर्फ़ 14 रुपए कमाते थे. परिवार में उनके अलावा उनकी माँ और एक छोटी बहन हैं.
घर की ज़रूरतों की वजह से उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. उन्होंने घर की एक किराना दुकान चलाने में हाथ बँटाने लगे.
जब उन्होंने फ़िल्म में जाने के अपने फ़ैसले के बारे में घरवालों को बताया, तो वो ख़ुश नहीं थे. उनके पिता चाहते थे कि वो एक सरकारी अधिकारी बनें.
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2019 में 'द न्यूज़ मिनट' के साथ इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि फ़िल्मों में अपनी क़िस्मत आज़माने वो अपना घर छोड़ बेंगलुरु भाग आए थे. उस समय उनकी जेब में सिर्फ़ 300 रुपए थे.
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था, "जब मैं बेंगलुरु पहुँचा, तो वहाँ पहुँचते ही मैं डर गया था. इतना बड़ा शहर! लेकिन मैं हमेशा से ही काफ़ी आत्मविश्वासी रहा हूँ. मुझे संघर्ष करने से डर नहीं लगता था. मुझे पता था कि अगर मैं वापस गया, तो मेरे माता-पिता मुझे दोबारा यहाँ कभी नहीं आने देंगे."
उनके अनुसार, उनके माता-पिता ने उन्हें अल्टीमेटम दिया था कि हीरो के तौर पर अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए वो आज़ाद हैं, लेकिन अगर बात नहीं बनी, तो उन्हें वही करना होगा जो वे कहेंगे.
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'वीकेंड विद रमेश' में अपने दोस्त नंजुंड के बारे में उन्होंने कहा था, "नंजुंड ने ही मुझे थिएटर से परिचित कराया. पहले मुझे सिर्फ़ पौराणिक नाटकों के बारे में पता था, जिनमें गदा लेकर लड़ने वाले पात्र होते थे. सामाजिक नाटकों के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी. थिएटर की दुनिया को मैंने नंजुंड के ज़रिए जाना."
यश ने आगे बताया था, "जब मैं पहली बार 'बेनका' थिएटर समूह से जुड़ा, तो मेरी पूरी दुनिया बदल गई. मुझे लगता है कि थिएटर ने मुझे एक अलग इंसान बनाया और मेरे व्यक्तित्व को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई."
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2007 में आई फ़िल्म 'जंबाडा हुडुगी' से सहायक अभिनेता के रूप में यश ने अपना फ़िल्मी डेब्यू किया. इससे पहले वो 'उत्तरायण' और 'नंदा गोकुला' सहित कुछ टीवी शोज़ में काम कर चुके थे.
'नंदा गोकुला' काफ़ी लोकप्रिय टीवी शो रहा और इसी से यश ने काफ़ी पहचान बनाई. इसमें यश और राधिका पंडित की जोड़ी को काफ़ी पसंद किया गया. यह शो वर्ष 2004-2007 के दौरान प्रसारित हुआ.
यश को पहचान दिलाने वाली फिल्म 'मोगिन्ना मनसू' 2008 में आई. 'वीकेंड विद रमेश' में यश ने इस फ़िल्म में उन्हें लिए जाने की एक दिलचस्प कहानी बताई, "फ़िल्म में उस रोल के लिए किसी दूसरे एक्टर को चुना गया था, लेकिन मुहूर्त के समय बाइक से गिरने के कारण उसे चोट लग गई और वह शूटिंग नहीं कर सका. टीम को किसी दूसरे कलाकार की ज़रूरत पड़ी. आख़िरकार मुझे चुना गया."
इस घटना को याद करते हुए इस फ़िल्म के डायरेक्टर शशांक कहते हैं, "मैंने यश को एक धारावाहिक में देखा था. उनका अभिनय मुझे बहुत पसंद आया. जब मैं नए कलाकारों के साथ 'मोगिना मनसु' बनाने लगा, तो इस किरदार के लिए यश का नाम मेरे मन में आया."
वो आगे कहते हैं, "उन्होंने भूमिका को समझने के लिए बहुत मेहनत की थी. हर शॉट से पहले वे पूछते थे कि क्या इसे इस तरह करें या किसी दूसरे तरीक़े से? वे मुझे एक ही दृश्य के कई विकल्प देते थे. उनमें अभिनय के साथ डांस, समर्पण और काम के प्रति सम्मान भी था."
बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म ने अच्छी कमाई की. 'मोगिन्ना मनसू' के लिए यश को बेस्ट सपोर्टिंग ऐक्टर का 'फ़िल्मफ़ेयर' अवॉर्ड भी मिला.
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फ़िल्म समीक्षक से फ़िल्म निर्माता बनीं सुनयना सुरेश के मुताबिक़, यश की दो-तीन फ़िल्में उनके करियर में अहम मोड़ साबित हुईं.
उनकी पहली फ़िल्म 'मोगिना मनसु' थी, जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई थी. इस फ़िल्म ने उन्हें पहचान दिलाई और उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला.
इसके बाद गूगली आई. इस फ़िल्म ने उन्हें युवाओं, ख़ासकर कॉलेज के स्टूडेंट्स के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया. इस फ़िल्म ने उन्हें एक स्टार बना दिया.
इसके बाद 'मिस्टर एंड मिसेज़ रामाचारी' ने उन्हें सुपरस्टार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. इस फ़िल्म में भी उनकी पत्नी राधिका पंडित थीं. यह फ़िल्म कन्नड़ फ़िल्म इंडस्ट्री की बड़ी हिट साबित हुई.
यश के करियर में इन दो बड़ी फ़िल्मों ने निर्णायक भूमिका निभाई. इसके बाद केजीएफ़ ने उन्हें एक ऐसी पहचान दिलाई, जिसने उन्हें बाक़ी सितारों से अलग कर दिया.
सुनयना सुरेश कहती हैं, "केजीएफ़ के ज़रिए उन्होंने हिन्दी फ़िल्म बाज़ार, ख़ासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिन्दी भाषी क्षेत्रों के दर्शकों को वह नायक दिया, जिसकी उन्हें कमी महसूस हो रही थी."
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कॉमिक कॉन्स 2026 में रावण का किरदार निभाए जाने को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में यश ने कहा था, "यह बहुत जटिल किरदार है. ज़रा सोचिए, एक ऐसा किरदार जिससे लोग नफ़रत करते हैं और हर साल उसका पुतला जलाते हैं. यह दिखाता है कि उसने अपने लिए किस स्तर की पहचान बनाई है."
उन्होंने बताया कि जब किरदारों के बारे में सभी जानते हैं और लोगों के मन में उनकी पहले से एक छवि बनी हुई है, तो उस भूमिका को निभाना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
यश ने कहा था, "अगर कोई नई फ़िल्म है और आप नई कहानी सुना रहे हैं, तो आप जो भी करेंगे, वही उस किरदार की पहचान बन जाएगी. लेकिन जब लोगों के मन में पहले से उस किरदार की कल्पना मौजूद हो और कई लोग उसे अलग-अलग तरीक़ों से निभा चुके हों, तो एक अभिनेता पर अतिरिक्त दबाव होता है."
उन्होंने कहा कि एक अभिनेता के तौर पर वे यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि उन्होंने जो कुछ किया, वह क्यों किया. वे उसके पीछे की सोच को समझना चाहते थे.
यश ने कहा, "मुझे लगा कि रावण को पर्दे पर उतारने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि मैं उनकी सोच और उनके कामों के पीछे की वजह को समझूँ."
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