कांग्रेस की अग्निपरीक्षा? पंजाब में 'अपनों को संभालने' की तो UP में 'खुद को जिंदा रखने' की चुनौती – AajTak

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केरलम की जंग फतह करने और कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने के साथ ही कांग्रेस एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है. कांग्रेस बड़े पैमाने पर संगठनात्मक बदलाव करने की तैयारी कर रही है और पार्टी का पूरा फोकस उत्तर प्रदेश और पंजाब पर है. इन दोनों ही राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां कांग्रेस के सामने सियासी चुनौती जस की तस बनी हुई है. 
पंजाब में जहां कांग्रेस के सामने खोए हुए सियासी आधार को वापस पाने की चुनौती है, तो उत्तर प्रदेश में शून्य से उठकर अपने वजूद को साबित करने के साथ ही 2024 में मिली जीत के राजनीतिक माहौल को बनाए रखने की है. पंजाब में चुनौती ‘अपनों को संभालने’ की है, तो उत्तर प्रदेश में चुनौती ‘खुद को जिंदा रखने’ की है. 
उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों ही कांग्रेस के लिए सियासी रूप से काफी अहम हैं. पंजाब- जहां हाल ही में नगर निकाय चुनाव के नतीजे आए हैं और 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं.  वहीं, उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बिसात अभी से बिछने लगी है. ये दोनों राज्य कांग्रेस के लिए दो अलग-अलग तरह की कठिन राजनीतिक कुरुक्षेत्र बने हुए हैं.
यूपी से पंजाब तक कांग्रेस में होगा बदलाव?
कांग्रेस 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए अभी से कमर कस रही है. इसी कड़ी में कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों की कुर्सी बदली जा सकती है. इस लिस्ट में पंजाब से कर्नाटक तक बदलाव की तैयारी है. इसके अलावा यूपी और राजस्थान को लेकर भी चर्चा तेज है. 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस का पूरा फोकस पंजाब और उत्तर प्रदेश पर रहने वाला है. 
पंजाब के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को पद से हटाए जाने की चर्चा है. हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी खराब रहा. इसके चलते राज्य इकाई में गुटबाजी काफी बढ़ गई है. कांग्रेस हाईकमान नहीं चाहता कि चुनाव से पहले यह विवाद और ज्यादा बढ़े. ऐसे में जल्द एक्शन लिया जा सकता है. इसके अलावा यूपी में भी अगले साल चुनाव है, जिसे लेकर सियासी सरगर्मी तेज है.
पंजाब में बिखरता किला व अंतर्कलह की मार
पंजाब कभी कांग्रेस का अभेद्य गढ़ माना जाता था, लेकिन 2022 में आम आदमी पार्टी (AAP) की प्रचंड लहर ने उसे सत्ता से बेदखल कर दिया था. दिल्ली की सत्ता से आम आदमी पार्टी के बाहर होने के बाद कांग्रेस को अपनी वापसी की उम्मीदें जागी थीं. पंजाब में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों की बगावत ने कांग्रेस के हौसले बुलंद कर दिए थे, लेकिन नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस के सियासी घावों को एक बार फिर हरा कर दिया है.
पंजाब में कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं. सबसे बड़ी चुनौती- पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी दुश्मन कोई दूसरी पार्टी नहीं, बल्कि उसकी अपनी अंदरूनी गुटबाजी है.  पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद चरणजीत सिंह चन्नी के बीच वर्चस्व की जंग जगजाहिर है. निकाय चुनावों में जहां राजा वडिंग के अपने गढ़ गिद्दरबाहा में कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी, जहां AAP ने 19 में से 17 वार्ड जीत लिए हैं. 
वहीं, चरणजीत सिंह चन्नी ने चमकौर साहिब और मोरिंडा में कांग्रेस को जीत दिलाकर आलाकमान के सामने प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए अपना दावा मजबूत कर दिया है. 2022 में कांग्रेस की हार की एक बड़ी वजह आपसी गुटबाजी रही थी, जिसकी बीमारी से कांग्रेस अभी तक निजात नहीं पा सकी. चरणजीत सिंह चन्नी, सुखपाल खैरा, प्रताप सिंह बाजवा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग जैसे बड़े नेताओं के मनमुटाव के चलते कांग्रेस का माहौल खराब हो गया. कांग्रेस इसी गुटबाजी के चलते हरियाणा में जीती चुनावी बाजी हार गई थी.
पंजाब में सियासी मौका कांग्रेस गंवा न दे?
पंजाब में कांग्रेस की सियासी जड़ें काफी गहरी हैं और जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत है. पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के लगातार कमजोर होने और AAP विरोधी वोटों का सबसे स्वाभाविक झुकाव कांग्रेस की तरफ हो सकता है. 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पंजाब की 13 सीटों में से 7 संसदीय सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही थी, जबकि सत्ता में होने के बावजूद आम आदमी पार्टी को केवल 3 सीटें मिली थीं. इससे माना जा रहा था कि कांग्रेस ने राज्य में अपनी पकड़ दोबारा मजबूत की है. 
किसी भी राज्य में 5 साल बाद सत्ताधारी दल के खिलाफ कुछ नाराजगी स्वाभाविक होती है. कानून-व्यवस्था, ड्रग्स का मुद्दा और वादों को पूरा करने की गति को लेकर जो भी असंतोष पैदा होगा, उसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिल सकता है, लेकिन कांग्रेस अपनी गुटबाजी के चलते इसे नहीं भुना सकी. निकाय चुनावों में ‘AAP’ को मिली एकतरफा जीत ने साबित कर दिया कि सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने में कांग्रेस पूरी तरह नाकाम रही है.
पंजाब की राजनीति अब केवल दो पार्टियों तक सीमित नहीं है. अकाली दल (जो अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश में है) और बीजेपी (जो शहरी इलाकों और हिंदू बहुल सीटों पर पैठ बढ़ा रही है) के कारण वोट शेयर का बिखराव कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकता है. पंजाब में कांग्रेस भले ही आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े और मजबूत विकल्प के रूप में खड़ी है, लेकिन कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी से सारे किए धरे पर पानी फिर रहा है. अगर कांग्रेस इन बुनियादी कमियों को दूर नहीं कर पाती, तो पंजाब का किला हमेशा के लिए हाथ से निकल सकता है.
UP में बना बनाया माहौल बिगड़ न जाए
अब बात उत्तर प्रदेश की करें तो, यूपी में कांग्रेस को दोबारा से सियासी संजीवनी 2024 के चुनाव में मिली थी. सपा के साथ मिलकर कांग्रेस मोदी को भले ही सत्ता की हैट्रिक लगाने से रोक न सके हो, लेकिन यूपी में मात देने में सफल रही. सपा-कांग्रेस ने यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 43 सीटें जीतीं. जिसमें सपा 37 सीटें तो कांग्रेस 6 सीटें जीती थी. ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सपा के साथ गठबंधन बनाए रखने के साथ-साथ सीट शेयरिंग तय करने की है. इसके अलावा दोनों दलों ने 2024 में जो माहौल बनाया था, उसे बरकरार रखना होगा.
उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों और बूथों पर कांग्रेस का संगठन कागजों पर तो है, लेकिन जमीन पर पूरी तरह निष्क्रिय है. 2022 में प्रियंका गांधी के ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे के जरिए जो जमीन तैयार करने की कोशिश की गई थी, वह सफल नहीं हो सकी. जब तक बूथ स्तर पर मजबूत कैडर तैयार नहीं होता, तब तक बीजेपी के पन्ना प्रमुखों से मुकाबला करना नामुमकिन है. ऐसे में कांग्रेस का दरोमदार सपा के बूथ कार्यकर्ताओं के सहारे टिका हुआ है, लेकिन कांग्रेस और सपा के बीच सीट शेयरिंग का मामला सुलझने के बजाय उलझता जा रहा है.
कांग्रेस और सपा में कैसी बनेगी सीट की बात
सपा प्रमुख अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बहुत ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं दिख रहे, जिसके चलते कांग्रेस के नेता बेचैन भी हैं. अखिलेश यादव साफ-साफ कह चुके हैं कि सीट शेयरिंग जीत की संभावनाओं पर तय होगी. कांग्रेस जिस सीट से जीत सकती है, उस सीट पर ही उसे चुनाव लड़ाया जाएगा. वहीं, कांग्रेस के नेता और सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद के बयान से गठबंधन में दरार पड़ती दिख रही है. 
इमरान मसूद कह चुके हैं कि कांग्रेस सपा से भीख नहीं मांगेगी, और पार्टी सभी 403 सीटों पर अपनी तैयारी कर रही है. इमरान मसूद ने दावा किया कि 2024 में गठबंधन की 43 सीटों की जीत का श्रेय कांग्रेस नेता राहुल गांधी को जाता है. इसके बाद अखिलेश के सीट वाले स्लोगन पर इमरान मसूद ने कहा था कि मैं तो कहूंगा कि सीट नहीं तो जीत नहीं. जब सीट ही नहीं होगी तो जीत कहां से होगी? ये सबको सोचना चाहिए. खासकर बंगाल के रिजल्ट से ऐसे लोगों को सबक लेना चाहिए.
इमरान मसूद का कहना है कि अगर सही रणनीति के साथ बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ा गया होता, तो बीजेपी नहीं जीत पाती. इमरान मसूद ने अखिलेश यादव का नाम तो नहीं लिया, लेकिन सलाह यही दी कि बंगाल वाली गलती यूपी में दोहराए जाने से बचना होगा. यूपी और बंगाल के समीकरण अलग-अलग हैं, लेकिन कई बातें कॉमन भी हैं.
बीजेपी से कैसे करेंगे सपा-कांग्रेस मुकाबला
बंगाल में मिली जीत के बाद बीजेपी के हौसले बुलंद हैं और पार्टी का पूरा फोकस उत्तर प्रदेश पर है. बीजेपी ने यूपी में सत्ता की हैट्रिक लगाने की दिशा में अपनी सियासी एक्सरसाइज शुरू कर दी है. बीजेपी ने जिस आक्रामक तेवर के साथ बंगाल का चुनाव जीता है, उसी तर्ज पर यूपी चुनाव लड़ने की तैयारी है. सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर बीजेपी के तमाम नेताओं ने खुलकर हिंदुत्व का एजेंडा सेट करना शुरू कर दिया है.
बीजेपी ने कुर्मी समुदाय के पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर और योगी कैबिनेट विस्तार के जरिए गैर-यादव ओबीसी और दलितों को साधने के मद्देनजर बिसात बिछाई है. अब बीजेपी यूपी में संगठन के जरिए अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने की कवायद में है, जिसके लिए एक-दो दिन में पंकज चौधरी की नई टीम का ऐलान कर दिया जाएगा. इसके बाद सीएम योगी और पीएम मोदी की सियासी जोड़ी के सामने अखिलेश यादव और राहुल गांधी की राजनीतिक केमिस्ट्री कितनी टिक पाएगी. ये देखना दिलचस्प होगा.
मोदी-योगी बनाम राहुल-अखिलेश की जोड़ी
यूपी में देखा गया है कि 2017 के बाद से पीएम मोदी और सीएम योगी की जोड़ी सियासी तौर पर काफी हिट रही है. दोनों ही बीजेपी नेताओं ने यूपी के सियासी माहौल को भाजपामय बनाने और 2019 के लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत में अहम रोल अदा किया है. 2024 में भले ही बीजेपी यूपी में सपा-कांग्रेस से पिछड़ गई थी, लेकिन जिस तरह से महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा, बिहार और बंगाल में कैमबैक किया है, उससे यूपी में सपा-कांग्रेस के लिए सियासी चुनौतियां बढ़ गई हैं. 
कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में सपा के साथ गठबंधन के भरोसे को बनाए रखने के साथ-साथ अपने सामाजिक आधार (विशेषकर ब्राह्मण और अति-पिछड़े वर्गों) को वापस पाने के लिए जमीन पर पसीना बहाना होगा. ऐसे में यूपी का चुनाव कांग्रेस के लिए अपने सियासी वजूद को बचाए रखने के साथ-साथ 2024 में जो माहौल बना था, उसे भी बरकरार रखने की चुनौती है.
 
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