कालीघाट के दरवाजों से लेकर पसीने से तर Y-चैनल तक… ममता के अकेले संघर्ष का सफर – AajTak

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तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी के कोलकाता में हुए ताजा प्रदर्शन में पार्टी एकजुटता के पिछले प्रदर्शनों से बिल्कुल अलग, मंगलवार को पार्टी के सांसदों और विधायकों की मौजूदगी बेहद कम रही. विरोध प्रदर्शन के मंच पर लोगों की कम मौजूदगी पश्चिम बंगाल के बदलते सियासी परिदृश्य को दर्शाती है. यह सब तब हो रहा है, जब पार्टी को राज्य में सत्ता गंवाए अभी सिर्फ एक महीना ही गुजरा है और सत्ता अब भारतीय जनता पार्टी के हाथों में है.
ममता बनर्जी का सियासी सफर विपक्ष की नेता और मुख्यमंत्री, दोनों ही भूमिकाओं में, बड़े दांव वाले सड़क प्रदर्शनों और धरनों से ही परिभाषित रहा है. उन्होंने अपना यह ताजा प्रदर्शन Y-चैनल पर दोपहर करीब 2:00 बजे शुरू किया. हालांकि, इस मौके पर पार्टी के बड़े नेताओं की जो भारी भीड़ आमतौर पर देखने को मिलती है, वह इस बार पूरी तरह नदारद थी.
साल 2006 से ममता बनर्जी को करीब से कवर करने के नाते, मुझे पता था कि माहौल का अंदाजा लगाने के लिए सबसे अच्छी जगह वही है, जहां से सब कुछ शुरू होता है: कालीघाट स्थित उनका मशहूर घर. दोपहर करीब 1:00 बजे पहुंचने पर, मेरे वीडियो जर्नलिस्ट सुभोजित गेन और मैंने सुरक्षा प्रोटोकॉल में तुरंत एक बदलाव देखा. इस बार हमें असल में उनके घर के गेट तक पहुंचने की इजाजत मिल गई थी. अंदर, दरवाजे बंद करके एक मीटिंग पहले से ही चल रही थी. मीटिंग में शामिल लोगों की लिस्ट बहुत कुछ कह रही थी: मदन मित्रा, डोला सेन, कुणाल घोष, सुभाशीष चक्रवर्ती, कल्याण बनर्जी और असीमा पात्रा. ये पार्टी के पुराने सिपाही हैं, वे जमीनी स्तर के लड़ाके जिन्होंने पार्टी को बिल्कुल शुरू से खड़ा किया है.
ठीक 1:55 PM पर, पूर्व मुख्यमंत्री अपने घर से बाहर निकलीं, कल्याण बनर्जी और कुणाल घोष के साथ अपनी कार में बैठ गईं. सुभोजित और मैं अपनी गाड़ी की तरफ भागे और उनके काफिले के पीछे-पीछे चलने लगे. हमें पता था कि वह धरने में शामिल होने के लिए Y-चैनल की ओर जा रही हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री होने की वजह से, उनका काफिला एक सख्त ‘ग्रीन चैनल’ ट्रैफिक व्यवस्था से गुजरा और हम ठीक उनकी गाड़ी के पीछे-पीछे चलते रहे.
फिर पहला मोड़ आया. दोपहर करीब 2:12 बजे, जब काफिला रेड रोड के पास पहुंचा, तो ममता की गाड़ी अचानक रुक गई. वह नीचे उतरीं और बी.आर. अंबेडकर की प्रतिमा पर जाकर, भारत के संविधान की एक प्रति के साथ उन्हें फूलों से श्रद्धांजलि दी. जैसे ही वे वहां से निकलने लगीं, काफिले ने अचानक यू-टर्न ले लिया और डफरिन रोड की ओर मुड़ गया. 2:21 बजे तक, वह फिर रुकीं, इस बार गांधी मूर्ति के पास, और अपने साथ आए नेताओं के साथ मिलकर महात्मा गांधी को फूल चढ़ाए.
मैंने ममता से एक छोटा सा इंटरव्यू लेने की कोशिश की, लेकिन उनकी नाराजगी साफ झलक रही थी. वह काफी गुस्से में लग रही थीं. उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और सीधे अपनी गाड़ी की ओर लौट गईं, जिसके बाद वह सीधे Y-चैनल की ओर रवाना हो गईं. दिलचस्प बात यह है कि कोलकाता पुलिस ने इस धरने के लिए आधिकारिक तौर पर अनुमति देने से मना कर दिया था. फिर भी, बंगाल की पुरानी रीत के मुताबिक, किसी ने भी उन्हें यह धरना देने से नहीं रोका. इसके उलट, उस पूरे इलाके में कोलकाता पुलिस और केंद्रीय बलों की भारी तैनाती करके सुरक्षा व्यवस्था को बेहद मजबूत कर दिया गया था.
जब दोपहर करीब 2:30 बजे उनकी गाड़ी आखिरकार विरोध स्थल पर पहुंची, तो वहां जमा हुए कुछ सौ टीएमसी समर्थकों की भीड़ में जबरदस्त उत्साह की एक लहर दौड़ गई. चुनावों में मिली करारी हार के बाद, किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में ममता की यह पहली सार्वजनिक उपस्थिति थी.
मौसम का मिजाज अच्छा नहीं था. गर्मी और उमस से दम घुट रहा था और Y-चैनल पर लोगों की सभा के लिए जगह बहुत ही तंग थी. करीब आधे घंटे की अफरा-तफरी के बाद कहीं जाकर ममता अपना मुख्य भाषण शुरू कर पाईं.
वहां खड़े होकर, नेताओं को मंच पर अपनी-अपनी जगह लेते हुए देखते हुए, मुझे अचानक ‘देजा वू’ (अतीत की पुनरावृत्ति का एहसास) का अनुभव हुआ, जिसने मुझे मेरे करियर की शुरुआत में हुए सिंगूर विरोध प्रदर्शनों की याद दिला दी. मुकुल रॉय और सोवन चटर्जी को छोड़कर, भीड़ की तरफ देख रहे चेहरे करीब वैसे ही थे जैसे डेढ़ दशक पहले थे: मदन मित्रा, कल्याण बनर्जी, फिरहाद हकीम, चंद्रिमा भट्टाचार्य, डोला सेन, असीमा पात्रा, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, डेरेक ओ’ब्रायन और अशोक देब.
यह पूरी तरह से पुरानी पीढ़ी के नेताओं का जमावड़ा था. फिल्म जगत के चेहरे, खेल जगत के सितारे और बुद्धिजीवियों का वह तबका, जो कभी उनके मंचों पर भीड़ लगाए रहता था, आज पूरी तरह से नदारद था. इससे मुझे यह एहसास हुआ कि बुरे से बुरे वक्त में भी, पुराने साथी ही असल सोना साबित होते हैं. सालों से, मदन मित्रा जैसे दिग्गज नेताओं को पीछे की कतारों में धकेल दिया गया था, खासकर तब से, जब से रणनीति बनाने वाली कंपनी ‘I-PAC’ ने पार्टी के कामकाज की कमान संभाली थी. फिर भी आज, ममता बनर्जी जैसी कद्दावर नेता, जिन्होंने अनगिनत लोगों को सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने का मौका दिया, उन्हीं नए चेहरों द्वारा काफी हद तक अकेली छोड़ दी गई थीं. जैसा कि उम्मीद थी, उन्होंने एक जोशीला राजनीतिक भाषण दिया और बीजेपी पर सीधा हमला बोला. लेकिन असली कहानी तो भीड़ में छिपी थी. जब मैंने वहां जमा हुए कुछ समर्थकों से बात की, तो उनमें से कई ने I-PAC के उदय और उसके बढ़ते प्रभाव को लेकर अपनी गहरी नाराजगी खुलकर जाहिर की. हालिया हार की कड़वाहट के बावजूद, शीर्ष नेतृत्व के प्रति उनकी वफादारी में कोई कमी नहीं आई थी. उन्हें पूरा यकीन था कि ममता बनर्जी के अकेले नेतृत्व में टीएमसी एक बार फिर से अपनी खोई हुई ताकत हासिल कर लेगी.
आखिरकार, इस भीषण मौसम का असर दिखने लगा. शाम करीब 5:45 बजे, तेज़ उमस की वजह से कुणाल घोष की तबीयत बिगड़ गई. ममता ने एक मां की तरह उनका ख्याल रखते हुए खुद उन्हें पंखा झलना शुरू कर दिया और उनके लिए मंच से सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता बनाया.
ठीक शाम 6:00 बजे, ममता बनर्जी कार्यक्रम स्थल से रवाना हो गईं और इसी के साथ उस दिन का धरना खत्म हो गया, लेकिन जब उनकी गाड़ी आगे बढ़ी, तो वहां मौजूद समर्थकों के लिए उनका विदाई संदेश बिल्कुल साफ था. वह केंद्र और नई राज्य सरकार, दोनों की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर अपनी लड़ाई जारी रखेंगी.
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