कुलदीप सिंह सेंगर के मामले में Epstein Files का जिक्र, जानें सुप्रीम कोर्ट में 'इंसाफ' की जंग की पूरी कहानी – AajTak

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एक मरे हुए शख्स ने पूरी दुनिया के ना जाने कितने ही ताकतवर लोगों की जिंदगी में भूचाल ला दिया है. उस मुर्दे की एक फाइल के किसी पन्ने में ना जाने कब किसका नाम और किसके साथ उसकी तस्वीर आ जाए. बस यही सोचकर हर ताकतवर और नामचीन शख्स डरा हुआ है. बात डरने की है भी. क्योंकि दुनिया भर में बदनाम जिस एप्सटीन फाइल्स ने इस वक्त सुर्खियों में अपनी जगह बना रखी है, उस फाइल्स की कहानी ये है कि उसमें दुनिया के ना जाने कितने ही ताकतवर, अमीर, मशहूर, दानवीर लोगों को उस शख्स के करीब दिखाया गया है, जिस पर नाबालिग बच्चियों का यौन शोषण करने का इल्जाम था. सोमवार को उसी एप्सटीन फाइल्स का जिक्र अचानक देश की सबसे बड़ी अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट के परिसर में भी हुआ.
असल जानकारी के मुताबिक, सजायाफ्ता मुजरिम कुलदीप सिंह सेंगर शायद कभी अमेरिका नहीं गया. अब जाहिर है जब अमेरिका नहीं गया तो एप्सटीन से भी नहीं मिला होगा. अब जब उससे मिला ही नहीं तो इतना तो तय है कि नाबालिग बच्चियों के साथ एप्स्टीन वाली फाइल में कम से कम इसकी तस्वीर नहीं होगी. लेकिन अमेरिका और एप्सटीन से दूर 8 साल पहले 2017 में यूपी की सत्ता वाली सरकार का विधायक रहते हुए इसने एक नाबालिग बच्ची के साथ जो कुछ किया बस उसी की वजह से शायद सुप्रीम कोर्ट में सोमवार की दोपहर इसी कुलदीप सिंह सेंगर को इंडियन एप्सटीन गैंग का मेंबर या सरगना बताया गया.
पिछले पांच दिनों से दिल्ली हाईकोर्ट के जिस एक फैसले ने हर खास-ओ-आम को बेचैन करके रख दिया था, जिस एक सवाल ने हरेक को हैरान परेशान कर दिया था कि आखिर एक रेपिस्ट जिसे उम्रकैद की सजा मिली हुई है, उसे जमानत पर कोई कैसे रिहा करने का हुक्म सुना सकता है. शायद इस फैसले से खुद देश की सबसे बड़ी अदालत भी हैरान थी. इसलिए सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने मातहत कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए आखिरकार कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. यानि सेंगर फिलहाल जेल से आजाद नहीं होगा. कायदे से देखा जाए तो दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला ही अपने आप में इतना अजीब था कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को रेप की शिकार पीडिता या उसका परिवार अपनी जीत भी नहीं बता सकता.
दरअसल, 23 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने ये कहते हुए कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत दे दी थी कि वो 7 साल 6 महीने जेल में काट चुका है और जिस पॉक्सो एक्ट के तहत उसे पब्लिक सर्वेंट मानते हुए निचली अदालत ने उम्र कैद की सजा दी थी, वो उस सजा की श्रेणी में आता ही नहीं है. क्योंकि सेंगर को जमानत देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के जज के मुताबिक सेंगर पब्लिक सर्वेंट कभी था ही नहीं.
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सीबीआई ने पॉक्सो एक्ट के तहत पब्लिक सर्वेंट वाले इसी क्लॉज को पकड़कर सुप्रीम कोर्ट में सेंगर को जमानत देने के फैसले की मुखालफत की थी. सीबीआई की दलील थी कि 2017 में जब सेंगर ने पीड़िता के साथ बलात्कार किया था, तब वो सत्ताधारी पार्टी बीजेपी का विधायक था. और एक विधायक या फिर सांसद पब्लिक सर्वेंट ही होता है. ये बात दिल्ली हाईकोर्ट ने समझने में गलती कर दी.
पॉक्सो एक्ट में ये प्रावधान है कि कोई पुलिस अफसर, पैरामिलिट्री फोर्स, पब्लिक सर्वेंट, एजुकेशनल इंस्टिट्यूट, अस्पताल के स्टाफ जैसे खास लोग अगर किसी नाबालिग के साथ इस तरह की हरकत करते हैं तो ये एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है. ठीक ऐसा ही एमएलए या एमपी के लिए भी है. सीबीआई की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि पॉक्सो एक्ट का मतलब सिर्फ सजा नहीं बल्कि बच्चों की सुरक्षा भी है. उन्होंने कहा कि इसके तहत कानून की धाराएं साफ तौर पर सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों यानि पब्लिक सर्वेंट को दंडित करने के लिए हैं जो अपनी सत्ता, मौका या अपने प्रभाव का दुरपयोग कर बच्चों का शोषण करते हैं.
सीबीआई की इस दलील को सुप्रीम कोर्ट ने सही मानते हुए ये टिप्पणी की कि पॉक्सो एक्ट के तहत सेंगर के मामले को समझने में दिल्ली हाईकोर्ट के जजों ने शायद गलती की. असल में पॉक्सो एक्ट के तहत किसी नाबालिग के साथ बलात्कार के मामले में कम से कम सात साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा है। लेकिन इसी पॉक्सो एक्ट के तहत अगर कोई पब्लिक सर्वेंट किसी नाबालिग किसी नाबालिग के साथ रेप करता है तो ऐसे में उसे कम से कम 20 साल और अधिकत उम्रकैद की सजा देने का प्रावधान है.
रेपिस्ट सेंगर की जमानत अर्जी पर दिल्ली हाईकोर्ट में सेंगर के वकील ने ये दलील रखी थी कि उनका मुवक्किल पब्लिक सर्वेंट नहीं है इसलिए उसे न्यूनतम सात साल की सजा मिलनी चाहिए ना कि 20 साल या उम्र कैद की. दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर को जमानत देते हुए अपने फैसले में कहा था कि सेंगर पहले ही सात साल और 6 महीने जेल में काट चुका है, इसलिए उसे जमानत दी जाती है. यानि हाईकोर्ट ने सेंगर को जमानत देते वक्त उसे पब्लिक सर्वेंट माना ही नहीं था जबकि 2019 में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर को पब्लिक सर्वेंट मानते हुए ही नाबालिग के साथ रेप के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी.
दिल्ली हाई कोर्ट के इसी फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब सेंगर की जमानत पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की वेकेशन बेंच ने इस मामले की सुनवाई की थी. इसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे के महेश्वरी और जस्टिस अगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे. चीफ जस्टिस ने फैसले सुनाते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति जमानत पर पहले ही बाहर आ चुका हो तो अदालत उसकी आजादी वापस नहीं छीनती. लेकिन यहां स्थिति अलग है क्योंकि सेंगर हत्या के एक मामले में 10 साल की सजा काटने के लिए पहले से जेल में बंद था. इसलिए जमानत पर रोक लगने से सेंगर की रिहाई नहीं होगी. वो अभी भी जेल में ही रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने जमानत मांगने के लिए कुलदीप सिंह सेंगर से चार हफ्तों में जवाब देने को कहा है.
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उधर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद पीड़िता की मां और बहन ने कोर्ट का धन्यवाद तो किया लेकिन परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता भी जताई. फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद नए साल की शुरुआत में इंडियन एप्सटीन मेंबर कुलदीप सिंह सेंगर की रिहाई की उम्मीद खत्म हो चुकी है. वरना जिस तरह से उम्रकैद की सजा मिलने के बावजूद रेप के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी तो फिर पीड़िता के जिस बाप के कत्ल के लिए उसे 10 साल की सजा मिली है, शायद उस केस में भी उसे आसानी से जमानत मिल जाती. 
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