कैमरे में कैद मर्डर, FIR दर्ज और फिर भी कातिल आजाद… भरत तिवारी 'एनकाउंटर' के उलझे सवाल! – AajTak

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बिहार के भोजपुर में भरत तिवारी एनकाउंटर केस अब सिर्फ एक कथित फर्जी मुठभेड़ का मामला नहीं, बल्कि सिस्टम पर उठते गंभीर सवालों की कहानी बन चुका है. जिस हत्या को पूरा देश अपनी आंखों से देख चुका है, उसमें 15 दिन बाद भी कोई गिरफ्तारी नहीं हुई. पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है, जबकि आरोपित पुलिसकर्मी अब भी कहीं भागे नहीं, फिर भी वे कानून की पकड़ से बाहर हैं. आखिर भरत तिवारी की मौत के पीछे सच क्या है? और इंसाफ की राह इतनी मुश्किल क्यों है? 
25 जून 2026, शाहपुर गांव, भोजपुर
पटना हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज विनोद कुमार सिन्हा एक हफ़्ते पहले यानी 25 जून को शाहपुर गांव पहुंचे थे. वो भी एक एनकाउंटर की जांच करने. एक ऐसा एनकाउंटर जिसे मर्डर साबित करने के लिए ज़्यादा मेहनत की भी ज़रुरत नहीं है. क्योंकि सब कुछ कैमरे में क़ैद हो गया था. एनकाउंटर के नाम पर मर्डर करने वाले आरोपी पुलिसवालों के ख़िलाफ एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है. 
इस मामले में कत्ल की धारा लगी है. लेकिन कमाल देखिए एनकाउंटर के नाम पर कत्ल की जिस तस्वीर को पूरे देश ने देखा, उसे देखने के लिए हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज साहब को बिहार सरकार ने 6 महीने का वक़्त दिया है. जबकि 22 जून को मर्डर को लेकर जिन पुलिसवालों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई, उनकी गिरफ्तारी तो छोड़िए उनमें से एक को तो तबादले के नाम पर और भी अच्छी पोस्टिंग दे दी गई. 
ज़रा सोचिए अगर किसी आम इंसान के ख़िलाफ क़त्ल जैसे संगीन जुर्म में एफआईआर दर्ज होती तो वो कब का अंदर होता. पर ये तो पुलिसवाले हैं. ये दूसरों को अंदर करते हैं. इन्हें कौन अंदर करेगा? 
बिहार पुलिस के हाथों भरत तिवारी के क़त्ल को 15 दिन हो चुके हैं. पर इस केस का आलम क्या है दो पन्नों के ज़रिए इस बात का पता चलता है. वो भरत तिवारी की मां के नाम पर आरा भोजपुर के एसपी को लिखी गई शिकायत की कॉपी है. वो शिकायती पत्र 18 जून को पुलिस ने रिसीव किया था. बाकायदा इसपर पुलिस की मुहर और तारीख़ भी है. 
आशा देवी ने इस शिकायत पत्र में जगदीशपुर के SDPO यानि सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर और उनके साथ एनकाउंटर में शामिल अन्य पुलिसवालों के ख़िलाफ़ क़त्ल का मुक़दमा दर्ज करने की मांग की थी. चौतरफ़ा दबाव के बाद आखिरकार 22 जून को शाहपुर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया. भरत तिवारी की मां आशा देवी की उसी शिकायत पत्र को एफआईआर में तब्दील कर दिया गया.
बाकायदा उसमें केस नंबर 178/26 और तारीख़ भी लिखी है. 22 जून. साथ ही आरोपी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ जो तीन धाराएं दर्ज की गईं हैं वो भी लिखी हैं. भारतीय न्यायिक संहिता यानि बीएनएस के तहत आरोपी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ जो तीन धाराएं लगाई गईं हैं, उनमें पहला है 103 (1) यानि मर्डर. धारा 3(5) यानि एक साथ कई लोगों के मिलकर क़त्ल का इरादा. साथ ही बीएनएस की धारा 27.. यानि आर्म्स एक्ट. 
अब ज़ाहिर है मर्डर के मामले में जिसकी सज़ा उम्रक़ैद से लेकर सजा-ए-मौत तक है. आमतौर पर पुलिस एफआईआर दर्ज होते ही आरोपी को गिरफ्तार कर लेती है. जांच बाद में शुरु होती है. लेकिन यहां चूंकि मामला घर का है तो पुलिस शायद भूल गई कि किसी को गिरफ्तार भी करना है. वैसे आशा देवी की शिकायत के बाद पुलिस ने कुल 5 पुलिसवालों के ख़िलाफ हत्या का मुक़दमा दर्ज किया है. 
जिनमें पहले हैं 17 जून को हुए एनकाउंटर के नाम पर भरत तिवारी का क़त्ल करने वाली टीम की अगुवाई करने वाले SDPO यानि सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर राजेश कुमार शर्मा और दूसरे हैं शाहपुर थाने के एसएचओ राजेश मालाकार. इन दोनों के अलावा एफआईआर में तीन और पुलिसवालों के नाम हैं. लेकिन उनके नाम ज़ाहिर नहीं हो पाए हैं. जानते हैं क्यों? क्योंकि पुलिस ने ना तो एफआईआर की कॉपी आम की है. ना ही उसे ऑनलाइन अपने पोर्टल पर अब तक अपलोड किया है. 
लेकिन माना जा रहा है कि एनकाउंटर के बाद SDPO और एसएचओ के साथ जिन तीन पुलिसवालों को सस्पेंड किया गया था, उन्हीं तीनों के नाम एफआईआर में शामिल हैं. एनकाउंटर के बाद SDPO और एसएचओ के साथ सस्पेंड होने वाले जो बाकी तीन पुलिस अफ़सर हैं, वो हैं सब इंस्पेक्टर हरीश चंद्र कुमार और अंकित आर्यन और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर रमाशंकर यादव. इनमें से सस्पेंडेड SDPO का तबादला कर उन्हें नारकोटिक्स डिपार्टमेंट में भेज दिया गया है. बाकी चार पुलिस अफ़सर भी फिलहाल मजे में हैं.
पुलिस के हाथों मारे गए भरत तिवारी के पिता बेबसी से पूछ रहे हैं कि जब सब कुछ सामने है. उनके बेटे को जब पुलिसवालों ने मारा सारे देश ने देखा. तो फिर और किस सबूत का इंतजार है? उनकी दलील में दम है कि जिस इलाके में उनके बेटे का पुलिसवालों के हाथों कत्ल हुआ, उस इलाके के कप्तान यानि एसपी अब भी अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं, तो फिर इंसाफ की उम्मीद क्या ही की जाए.
भरत तिवारी की मां आशा देवी की शिकायत पर 5 पुलिसवालों के ख़िलाफ हत्या का मुक़दमा दर्ज हुआ है. सिर्फ दर्ज हुआ है. एक्शन कुछ भी नहीं. पर इधर आशा देवी हैं कि कहते नहीं थकतीं कि सिर्फ समाज सेवा की वजह से पुलिसवालों ने उनके बेकसूर बेटे का मर्डर कर दिया. भरत तिवारी के परिवार की लड़ाई सीधे बिहार पुलिस से है. और उन्हें भी पता है कि पुलिस की ना दोस्ती अच्छी ना दुश्मनी. आशा देवी ने जिस दिन से पुलिसवालों के ख़िलाफ एफआईआर लिखवाई है, धमकियों का सिलसिला शुरु हो चुका है.
भरत तिवारी की मां की शिकायत सीधे बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से है. उनका कहना है कि हमेशा कमज़ोरों को ही निशाना बनाया जाता है. वहीं अपराधियों के ख़िलाफ़ पुलिस के बंदूक से गोली नहीं निकलती. आशा देवी ने कहा है कि जिस तरह से उनके बेटे भरत तिवारी की पुलिस ने हत्या की है, उसकी वैसी ही सज़ा गुनहगार पुलिसवालों को मिलनी चाहिए. उनकी मांग है कि उन पुलिसवालों को फांसी से कम सज़ा ना हो. उन्होंने ये भी कहा कि जब तक उनकी ये मांग पूरी नहीं होगी वो अपनी लड़ाई जारी रखेंगी.
भरत तिवारी के भाई ने संगीन इल्ज़ाम लगाते हुए कहा है कि उनके भाई की हत्या के पीछे 1400 करोड़ रुपये का घोटाला छुपा है. बाढ़ पीड़ितों के नाम पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो पैसे दिए थे, अफसरों ने उसकी बंदरबांट कर ली. उनका भाई भरत तिवारी इसी घोटाले को उजागर कर रहा था. जिस वजह स उसे मार डाला गया.
भरत तिवारी के भाई ने बताया कि जब बाढ़ पीड़ितों को अस्थाई रूप से उनके गांव में लाकर बसाया गया, तब उन्हें बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दी गई. बाढ़ पीड़ितों के लिए जो पैसे पटना से आए थे, वो सब अफसर खा गए. भरत तिवारी ने उसी अस्थाई आशियाने का सच सोशल मीडिया पर उजाकर करना शुरु कर दिया था. हालांकि जिन पुलिसवालों ने भरत तिवारी की हत्या की भरत के भाई उन पुलिसवालों को माफ करने को तैयार हैं. बस वो इतना चाहते हैं कि एनकाउंटर में शामिल पुलिसवाले उन लोगों का नाम बता दें, जिनके इशारे पर उनके भाई को गोली मारी गई.
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