कैसे सऊदी के 'चिल्लर' से PAK अपनी इज्जत ढक रहा है? हाई-फाई मेजबानी के पीछे कितने पैबंद – AajTak

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इस्लामाबाद में ईरान जंग को लेकर बातचीत की मेज सजाए पाकिस्तान के खाते में 1 अरब डॉलर की राशि और क्रेडिट हो गई है. सुनने में छोटी लगने वाली 1 अरब डॉलर की ये राशि पाकिस्तानी करेंसी में 2 खरब 78 अरब रुपये है. जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट इस रकम को पाकिस्तान को मिलने वाला कर्जा कम ईरान वार्ता की मेजबानी फीस ज्यादा बताते हैं. 
6 दिन पहले ही 15 अप्रैल को सऊदी अरब ने 2 अरब डॉलर पाकिस्तान को दिए हैं. अब पाकिस्तान के पास कुछ महीने के खर्चे का जुगाड़ हो गया है, लेकिन उसकी स्थिति बदलने वाली नहीं है. कुछ महीने बाद पाकिस्तान फिर किसी मुल्क के पास अपनी किल्लतों का रोना लेकर जाएगा. 
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था सालों से इन्हीं ‘फ्रेंडली कंट्रीज’ के सहारे टिकी हुई है. 2021 से सऊदी जमा राशि बार-बार रोलओवर होती रही, यानी कि पाकिस्तान को इन पैसों के इस्तेमाल की छूट मिलती रही. लेकिन विदेशी मुद्रा कमाने का जो असली जरिया निर्यात है, वो नहीं बढ़ा, रेमिटेंस पर निर्भरता बनी रही और घरेलू सुधार टलते रहे. 
ईरान वॉर ने पाकिस्तान को उसकी भू-राजनीतिक स्थिति की वजह से दुनिया के मंच पर बड़ा रोल निभाने का अवसर दे दिया, लेकिन पाकिस्तान की माली हालत एकदम वैसी ही रही. 
अब इस वार्ता के बहाने पाकिस्तान सऊदी अरब के पास अपनी मजबूरियां लेकर चला गया. ईरान जंग में फंसे सऊदी के सामने पाकिस्तान को चंद बिलियन डॉलर देना उसकी मजबूरी थी, ताकि इस क्षेत्र में शांति स्थापित हो. 
UAE के तगादे से परेशान पाकिस्तान
15 अप्रैल को सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का नया कर्ज और पहले के 5 अरब डॉलर के रोलओवर को 2028 तक बढ़ाने का ऐलान किया. इस तरह पाकिस्तान को कुल 8 अरब डॉलर का पैकेज मिल गया. फाइनेंस मिनिस्टर मुहम्मद औरंगजेब ने इसे “रिजर्व मजबूत करने” का कदम बताया. 
लेकिन असली वजह पाकिस्तान को संयुक्त अरब अमीरात का UAE को 3.5 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना था. अगर पाकिस्तान ऐसा करता तो उसका विदेशी मुद्रा भंडार भी जीरो हो जाता. अब सऊदी का यह ‘चिल्लर’ पाकिस्तान के हिसाब से बड़ी राहत बनकर आया है.
पाकिस्तान की रणनीतिक मामलों की विशेषज्ञ आयशा सिद्दीका कहती हैं कि, ‘पाकिस्तान की सरकार अपने विदेशी दौरों को घरेलू दर्शकों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों के सामने यह दिखाने के लिए इस्तेमाल कर रही है कि वह अलग-थलग नहीं है. लेकिन जब तक ठोस निवेश और निर्यात-आधारित सुधार नहीं होंगे, तब तक यह कूटनीतिक सक्रियता आर्थिक संकट का स्थायी समाधान नहीं बन सकती.’
सऊदी से लेगा, UAE को  चुकाएगा
पाकिस्तान के अखबार डॉन के अनुसार सऊदी से लोन मिलने के बाद पाकिस्तान इस महीने UAE को 3.5 बिलियन डॉलर का लोन लौटाएगा, जिससे उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ेगा. इससे पाकिस्तान के इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड प्रोग्राम के लक्ष्यों को न हासिल करने का खतरा पैदा हो जाएगा.
ईरान जंग और पश्चिम एशिया की स्थिति के कारण पाकिस्तान की माली हालत पहले ही खराब है. 
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 27 मार्च तक पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 16.4 बिलियन डॉलर था, जो लगभग तीन महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त है.  हालांकि, UAE को लोन चुकाने की जरूरत ने इस पर दबाव डाल दिया है. 
मार्च में इस्लामाबाद 3.5 बिलियन डॉलर की सुविधा को आगे बढ़ाने के लिए UAE के साथ समझौता करने में नाकाम रहा, सात सालों में यह पहली ऐसी नाकामी थी. 
बता दें कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ हाल के दिनों में कई बार सऊदी अरब के दौरे पर गए हैं. 
विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब और तुर्की दोनों ही पाकिस्तान को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक मदद अक्सर सीमित, शर्तों वाली और चरणबद्ध होती है. यही कारण है कि पाकिस्तान भले ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘हाई-फाई मेजबानी’ का दावा करते हुए राजनीतिक संदेश तो दे जाता है, पर इससे उसकी आर्थिक वास्तविकता में तनिक भी बदलाव नहीं आता.
 
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