Crude Oil: वैश्विक क्रूड ऑयल की कीमत मंगलवार (21 जुलाई) को करीब .7 फीसदी बढ़ गई और यह 83 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई. पिछले एक महीने की बात करें तो क्रूड ऑयल की कीमत 12 फीसदी बढ़ी है. पिछले दो हफ्ते से ईरान युद्ध का फिर से शुरू होना इसकी बड़ी वजह है. लेकिन समस्या बस इतनी नहीं है. यूक्रेन-युद्ध के चलते काला सागर के रास्ते तेल की सप्लाई में बाधा आनी शुरू हो गई है.
वहीं, यमन के हूतियों ने लाल सागर के रास्ते सऊदी अरब की तेल सप्लाई को बाधित करने की धमकी दी है. इस तरह दुनिया के 3 बड़े समुद्री मार्ग बाधित होने से तेल की कीमतें नई ऊंचाइयों तक पहुंचने का खतरा मंडराने लगा है. पर क्या आपको मालूम है कि क्रूड ऑयल बढ़ने का असर भारत पर क्यों ज्यादा पड़ता है.
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का 85% से ज़्यादा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ जाता है. वहीं, चूंकि तेल के ज्यादा सौदे डॉलर में होते हैं, इसलिए अगर रुपया की कीमत में गिरावट आती है तो भी भारत के तेल महंगा पड़ने लगता है.
क्रूड ऑयल की कीमत अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती है तो चालू खाता घाटा (current account deficit) बढ़ सकता है, रुपया कमज़ोर हो सकता है और महंगाई बढ़ सकती है. ट्रांसपोर्टेशन और प्रोडक्शन की कीमत बढ़ने से दूसरे उत्पाद महंगे होने लगते हैं.
भारत अपनी कुल जरूरतों का 85 फीसदी क्रूड ऑयात करता है. फोटो क्रेडिट, एआई
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 20 फीसदी एथेनॉल के टारगेट पर समय से पहले पहुंच गया है. इससे भारत में पेट्रोल की खपत कम होगी और क्रूड ऑयल का निर्यात कम होगा. इससे भारत के कृषि सेक्टर और ऊर्जा सुरक्षा को भी फायदा मिलेगा. साथ ही 1.4 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है. हालांकि, संसद ने साफ़ किया कि 20% से आगे बढ़ने (जैसे E27) के लिए और तकनीकी जांच की ज़रूरत होगी. बता दें कि पहले भारत ने 2020 तक 20 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य तय किया था.
IOC, BPCL और HPCL इंटरनेशनल कीमतों पर कच्चा तेल या पेट्रोलियम प्रोडक्ट खरीदते हैं. अगर पेट्रोल और डीजल की कीमतें उसी अनुपात में नहीं बढ़ाई जाती हैं, जिस अनुपात में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ती है तो मार्केटिंग मार्जिन कम हो जाते हैं या नेगेटिव हो जाते हैं. कम कमाई के कारण OMCs को नए निवेश में देरी करनी पड़ सकती है या उसे कम करना पड़ सकता है. अगर मार्जिन पर दबाव बना रहता है, तो रिफाइनरी विस्तार, पेट्रोकेमिकल्स, ग्रीन हाइड्रोजन, बायोफ्यूल और EV चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लागू होने की रफ़्तार धीमी हो सकती है. यानी कि अगर तेल की कीमत दुनिया में बढ़े और भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा न हो तो विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी.
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Vineet Sharan Srivastava एक भारतीय पत्रकार और डिजिटल न्यूज एक्सपर्ट हैं, जिनके पास मीडिया इंडस्ट्री में 17 वर्षों का अनुभव है. वह असिस्टेंट न्यूज एडिटर के पद पर कार्यरत हैं … और पढ़ें
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