ग्रामीण बोले- पुरखों की जमीन छोड़कर कैसे जाएं: सरकार का दावा-बड़वानी के राजघाट कुकरा में कोई नहीं रहता, हकीकत… – Dainik Bhaskar

अपने पुरखों की जमीन का मोह कैसा होता है, ये देखना है तो बड़वानी से महज पांच किलोमीटर दूर राजघाट कुकरा गांव चले आइए। गुजरात में बने सरदार सरोवर बांध के चलते 2019 में सरकारी रिकॉर्ड से इस गांव का नाम मिटा दिया गया है। दस्तावेजों के मुताबिक, यहां अब कोई
लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। चार परिवारों के करीब 24 सदस्य यहां आज भी रह रहे हैं। ये वे लोग हैं, जो अपने पुरखों की जमीन और घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
मानसून आने में एक हफ्ता है। इससे पहले, गांव में रह रहे लोगों के माथे पर चिंता है। कारण- डैम भरने पर बैक वाटर के पानी से गांव साल में पांच महीने यानी अगस्त से दिसंबर तक के लिए टापू बन जाता है। इस बार भी यही होगा।
130 मीटर जलस्तर होने पर डूब जाता है गांव
भौगोलिक स्थिति के चलते राजघाट कुकरा गांव पहली नजर में पर्यटन स्थल जैसा दिखता है। गांव में नर्मदा नदी का खतरे का निशान 123.280 मीटर है। जलस्तर 127.300 मीटर होने पर पुराना राजघाट का पुल डूब जाता है। वाटर लेवल 130 मीटर से अधिक होने पर राजघाट से सटे खेत जलमग्न होने लगते हैं। वहीं, जलस्तर 130 मीटर से ऊपर होते ही गांव टापू में तब्दील हो जाता है।
एक बार फिर मानसून सिर पर है लेकिन कुकरी गांव के ये 24 लोग इसे न छोड़ने की जिद पर अड़े हैं। स्थानीय बुजुर्ग कहते हैं- विकास के नाम पर गांव को खत्म कर दिया गया लेकिन हम आखिरी सांस तक यहीं रहेंगे। पहले साल तो बड़ी परेशानी हुई, लेकिन अब हम उन छह महीने की तैयारी पहले से ही कर लेते हैं। जुगाड़ से अपनी नाव तक बना लेते हैं। पढ़िए, रिपोर्ट…
बुजुर्ग बोले- डैम भरने पर समुद्र जैसा दिखता है
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि होने की वजह से गांव का नाम राजघाट कुकरा पड़ा, लेकिन डूब क्षेत्र में आने के बाद इस समाधि को 2019 में यहां से शिफ्ट कर दिया गया था। गांव नर्मदा से करीब 250 फीट दूर 50-60 फीट ऊंची पहाड़ी पर बसा है। जब यहां बसाहट थी, तो 265 परिवार रहा करते थे। अब सिर्फ पांच ही बचे हैं यानी 261 कच्चे-पक्के मकान खंडहर हो गए हैं।
गांव सरकारी दस्तावेजों में खाली हो चुका है। ऐसे में न तो यहां बिजली है, न स्कूल और न ही अन्य सरकारी सुविधा। उजाड़ और वीरान हो चुके गांव की गलियों से गुजरकर हम खुली जगह में पहुंचे। यहां से नर्मदा साफ दिखती है। यहीं नीम के पेड़ के नीचे बैठे बुजुर्ग बहादुर सिंह मिले।
बहादुर सिंह कहते हैं- डैम भरने पर ऐसा लगता है जैसे कि समुद्र किनारे खड़े हैं। जब तेज हवा चलती है, तो बहुत ऊंची-ऊंची लहरें डरा देती हैं। एक-डेढ़ महीने में ऐसे हालात फिर बन जाएंगे, लेकिन बांध का पानी हमारे लिए तो मुसीबत बनकर ही आया है। हमारा गांव उजड़ गया। हम लोग कहीं के नहीं रहे। पांच-छह साल से तो जिंदगी दुश्वार हो गई है।
जो जमीन दी, वो पथरीली और खारी है
बहादुर सिंह से पूछा- आप लोगों का तो पुनर्वास कर दिया गया है। लाखों रुपए, गुजरात में मकान और खेती के लिए जमीन भी दी है। फिर वहां गए क्यों नहीं?
जवाब में वे कहते हैं- हम अपने पुरखों की जमीन कैसे छोड़ दें? मैंने तो ठान लिया है, आखिरी सांस तक यहीं रहूंगा। सरकार ने हमारा कैसा पुनर्वास किया है, इसकी हकीकत हम ही जानते हैं। गुजरात के कच्छ इलाके में जो जमीन दी, वो पथरीली और खारी है। यहां हमारी उपजाऊ जमीन है।
आधार और वोटर आईडी एमपी का
बहादुर सिंह ने कहा- सरकार कहती है कि पुनर्वास हो गया, गुजरात में जमीन दे दी। फिर हमें मध्य प्रदेश सरकार की योजनाओं का लाभ क्यों दिया जा रहा है? हमें सरकार राशन दे रही है। हम यहां के मतदाता हैं। आधार भी यहीं के पते पर बने हैं।
यदि हमारा पुनर्वास हो चुका है, तो सरकारी योजनाओं का लाभ मध्य प्रदेश से क्यों दिया जा रहा है? सरकार ने सिर्फ कागजों में पुनर्वास कर दिया, हकीकत कुछ और ही है।
चार महीने तक आने-जाने के रास्ते बंद
गांव में रहने वाले देवेंद्र सोलंकी कहते हैं- साल 2017 तक हमारा गांव डूब में नहीं था। हम निश्चिंत थे, लेकिन 16 सितंबर 2019 को सरदार सरोवर को 128.50 मीटर तक भर दिया गया। हमारे लिए तो ये दिन तबाही की तरह था। बैक वाटर लेवल इतनी तेजी से बढ़ा कि गांव कुछ ही घंटों में टापू बन गया।
पहली बार समुद्र जैसा अहसास हुआ। चारों ओर पानी ही पानी हो गया। तब से लेकर आज तक हर बार टापू में रहना पड़ रहा है। चार महीने तक आने-जाने के रास्ते बंद हो जाते हैं। इस साल भी यही होगा। अगले महीने बारिश शुरू होगी। फिर जलस्तर बढ़ने लगेगा। उसी को लेकर तैयारियां कर रहे हैं।
खाने के लिए अनाज की व्यवस्था अभी से कर ली गई है। मवेशियों के लिए चारे का स्टॉक कर लिया है। जरूरी व्यवस्था के लिए प्रशासन नाव देगा, तो ठीक नहीं तो हम ही जुगाड़ की नाव बनाकर आना-जाना करते हैं। जैसे ही, डैम में पानी बढ़ता है, नाव की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन हमारी नाव भी बंद कर दी जाती है।
हम साल 2019 में पुनर्वास स्थल पर गए थे, लेकिन वहां मवेशियों के लिए चारे का इंतजाम तक नहीं था। वे मरने लगे, तो हम फिर से गांव वापस आ गए।
घर और जमीन का मुआवजा एमपी में मिले
वहीं, कनक सिंह कहते हैं- हमारी जमीन के बदले यहां से 300 किलोमीटर दूर गुजरात के भरूच में पथरीली और खारी जमीन दे दी। वहां घास तक नहीं उगती। आधी जमीन मध्य प्रदेश में है। यहां कुकरा की आठ एकड़ जमीन डूब से बाहर है। उसे कैसे छोड़ दें? हमें घर और जमीन का मुआवजा एमपी में मिले।
हमारे साथ न्याय नहीं हुआ। सिंचित की जगह सिंचित जमीन ही देनी थी, लेकिन गुजरात में पथरीली और खारी जमीन दे दी।
दो युवकों की हो चुकी है करंट से मौत
राजघाट कुकरा गांव के चिमन सोलंकी (32) और संतोष दरबार (25) की अगस्त 2019 में करंट से मौत हो गई थी। दरअसल, गांव के टापू में तब्दील होने के बाद पांच युवक नाव से अपने परिवारों से मिलने जा रहे थे। नाव से जाते समय संतोष ने पानी से तीन फीट ऊपर बिजली के तार उठाने के लिए दोनों हाथ लगाए और करंट लगने से वहीं चिपक गया।
चिमन की भी डोंगी में पानी होने से करंट फैला, उसने भी मौके पर दम तोड़ दिया। नाव में सवार तीन अन्य लोगों को भी झटका लगा, लेकिन जब तक बहाव में नाव दूर चली गई तो वे बच गए।
अधिकारी बोले- साल 2019 में ही मुआवजा दे दिया
दूसरी तरफ, पूर्व नर्मदा प्राधिकरण अधिकारी और वर्तमान अभियंता एसएस चोंगड का कहना है कि साल 2019 में ही विस्थापितों को मुआवजा दे दिया गया था। हालांकि, अभी भी कुछ लोग गांव में रहते हैं। उनकी मांग है कि मध्य प्रदेश में भी जमीन और मुआवजा मिले, ये संभव नहीं है।

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