जयपुर | जयपुर की सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा में पंडित प्रभु नारायण शर्मा ‘सहृदय’ ऐसे विरल साहित्यसेवी, शिक्षाविद, नाट्यकर्मी और हिन्दी-प्रचारक थे, जिन्होंने हिन्दी-जागरण की सशक्त धारा प्रवाहित की। सनातन धर्म, राष्ट्रभाषा और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी निष्ठा रखने वाले शर्मा का जीवन हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए निरंतर संघर्ष का पर्याय रहा। वे जयपुर के महाराज संस्कृत कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक रहे और सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अनेक शिक्षण संस्थानों में हिन्दी अध्यापन से हजारों विद्यार्थियों को जोड़ा। प्रभु नारायण शर्मा केवल अध्यापक नहीं थे, बल्कि हिन्दी को जन-जन तक पहुंचाने वाले सांस्कृतिक आंदोलन के अग्रदूत थे। अंग्रेजों के शासन में हिन्दी-सेवा को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था, तब उन्होंने अपने गुरु भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हिन्दी प्रचार का कार्य निर्भीक होकर किया। राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के दर्शन संकायाध्यक्ष शास्त्री कोसलेंद्रदास के अनुसार छोटी चौपड़ पर प्रभु नारायण शर्मा ने राष्ट्रभाषा कॉलेज स्थापित किया।
जीवनयात्रा; 4 अक्टूबर, 1903 को जन्मे पंडित प्रभु नारायण शर्मा ‘नाट्याचार्य’ का हिन्दी, साहित्य और नाट्यकला के क्षेत्र में अद्भुत योगदान रहा। 95 वर्ष की आयु में 16 मार्च, 1998 को उनका देहावसान जयपुर में हो गया।
इनके निर्देशन में ‘नाट्य संघ’ भी स्थापित हुआ, जिसके द्वारा उत्तर रामचरित और पांडव विजय का चमत्कारिक अभिनय हुआ था। जयपुर के रामप्रकाश टॉकिज में उन्होंने दो संस्कृत तथा 22 हिन्दी नाटकों का मंचन कर रंगमंच को नई दिशा दी थी। नाट्य-जगत में उनके खास योगदान पर विद्वानों ने उन्हें ‘नाट्याचार्य’ की उपाधि से सम्मानित किया। स्वतंत्रता-पूर्व से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक हिन्दी नाटकों के मंचन और रामलीला आयोजन को उन्होंने समाज-निर्माण का माध्यम बनाया। हिन्दी काव्य, नाटक, भाषाशास्त्र और साहित्य से संबंधित उनके 30 ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने जयपुर के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर को साहित्यिक स्वर देते हुए ‘अढ़ाई शती ग्रंथ’ लिखा, जो उनकी शोध दृष्टि और जयपुर-प्रेम का महत्वपूर्ण उदाहरण है। प्रयाग के हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें ‘महामहोपाध्याय’ की उपाधि प्रदान की। राजस्थान साहित्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी ने भी उन्हें सम्मानित किया। राजस्थान सरकार ने संस्कृत दिवस पर 19 अगस्त, 1986 को उनका अभिनंदन किया।
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