टर्बुलेंस कितना खतरनाक? 94 सेकंड में 300 फीट नीचे आया Air India का विमान; सीट बेल्ट कैसे बचाती है जान – Jagran

एअर इंडिया की फुकेट-दिल्ली उड़ान में टर्बुलेंस से हुए हादसे ने सीट बेल्ट के महत्व को उजागर किया है। यह यात्रियों को हवा में उछलने और गंभीर चोटों से बच …और पढ़ें
टर्बुलेंस के दौरान सीट बेल्ट बचाती है जान। फोटो: एआई जनरेटेड
एअर इंडिया उड़ान में 300 फीट का अचानक ड्रॉप
सीट बेल्ट यात्रियों को गंभीर चोटों से बचाती है
क्लियर एयर टर्ब्युलेंस सबसे खतरनाक प्रकार का विक्षोभ
गौतम कुमार मिश्रा, नई दिल्ली। एअर इंडिया की फुकेट-दिल्ली उड़ान में बीच हवा में हुए दर्दनाक हादसे ने विमान यात्रा सुरक्षा के सबसे अहम नियम पर एक बार फिर मुहर लगा दी है कि जब तक आप सीट पर बैठे हैं, सीट बेल्ट बांधकर रखें।
महज 94 सेकंड में विमान 300 फीट से अधिक नीचे आ गया गया, जिससे सीट बेल्ट नहीं बांधे यात्री अपनी सीटों से उछलकर सीधे केबिन की छत से जा टकराए। इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि हवाई सफर के दौरान सीट बेल्ट कोई विकल्प नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच का अंतर है।
जब विमान टर्बुलेंस की चपेट में आता है, तो विमान और उसके अंदर बैठे यात्रियों पर भौतिकी के नियम लागू होते हैं। इसे आप ऐसे समझें कि जब कोई विमान अचानक 300 फीट नीचे गिरता है, तो विमान के साथ-साथ यात्री का शरीर भी उसी गति से नीचे जाना चाहिए।
लेकिन जिन यात्रियों ने सीट बेल्ट नहीं बांधी होती, उनका शरीर जड़त्व के कारण पुरानी स्थिति में ही रहने की कोशिश करता है या ऊपर की ओर उछल जाता है।
इस स्थिति में विमान नीचे गिरता है और यात्री ऊपर की ओर हवा में उछलकर सीधे प्लास्टिक पैनल, ओवरहेड डिब्बों या लोहे के ढांचों से टकराते हैं। सीट बेल्ट यात्री के शरीर को कुर्सी से बांधकर रखती है।
आधुनिक व्यावसायिक विमान (जैसे एयरबस और बोइंग) अत्यधिक मजबूत बनाए जाते हैं। वे भारी से भारी झटकों को सहने में सक्षम होते हैं और उनके टूटने का खतरा न के बराबर होता है। असल खतरा विमान को नहीं, बल्कि विमान के अंदर बिना बेल्ट बंधे बैठे यात्रियों को होता है।
टर्बुलेंस वायुमंडल में हवा के असामान्य या बेकाबू प्रवाह को कहते हैं। साधारण शब्दों में, जैसे सड़क पर गड्ढे आने पर गाड़ी हिचकोले खाती है, वैसे ही हवा के दबाव या तापमान में अंतर आने पर विमान टर्बुलेंस का शिकार होता है। टर्बुलेंस कई प्रकार के होते हैं।
15,000 से 45,000 फीट की ऊंचाई पर जेट स्ट्रीम के कारण बनता है। रडार भी अक्सर इसे नहीं पकड़ पाता। कहा जा रहा है कि फुकेट-दिल्ली उड़ान में भी इसी तरह का अचानक विक्षोभ आया था।
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