तमिलनाडु सरकार ने शुक्रवार को नेशनल हाईवे साइनबोर्ड पर हिंदी लिखने के मामले में दो असिस्टेंट इंजीनियर को सस्पेंड कर दिया।
मामला तूतीकोरिन के सत्तानकुलम-नाजरेथ स्टेट हाईवे (SH-93) का है, जहां नए साइनबोर्ड पर तमिल और अंग्रेजी के साथ कस्बों के नाम हिंदी में भी लिखे गए थे।
तमिलनाडु सरकार के मुताबिक यह राज्य की दो-भाषा नीति का उल्लंघन है। हिंदी हटाने के साथ दोनों अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
2026 में हिंदी में लिखे नाम मिटाने का तीसरा मामला है। इससे पहले मार्च में तिरुचिरापल्ली डिविजनल रेलवे ऑफिस के नए भवन के एंट्री गेट पर लिखा कर्तव्य द्वार मिटाया गया था। मार्च में ही सिंगानल्लूर रेलवे स्टेशन पर हिंदी में लिखे सिंगानल्लूर को द्रविड़ियन दलों के कार्यकर्ताओं ने काला कर दिया था।
तमिलनाडु की ‘टू-लैंग्वेज फॉर्मूला’ पॉलिसी
NH-SH पर साइनबोर्ड के नियम
नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे के नियमों में अंतर हो सकता है। राज्य अपने अधिकार क्षेत्र की सड़कों के लिए अपनी भाषा नीति लागू कर सकता है।
इसके अलावा कई राज्यों में दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के साइनबोर्ड के लिए स्थानीय भाषा के नियम हैं। जैसे पंजाब में पंजाबी और कर्नाटक में कन्नड़ के इस्तेमाल को स्थानीय कानूनों के तहत जरूरी किया गया है। इसका उद्देश्य स्थानीय भाषा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।
तमिलनाडु में भाषा आंदोलन का इतिहास
तमिलनाडु में हिंदी के विरोध का इतिहास पुराना है। 1937 में स्कूलों में हिंदी अनिवार्य किए जाने के विरोध में पेरियार और जस्टिस पार्टी ने आंदोलन किया।
1965 में हिंदी को देश की एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने के विरोध में बड़े छात्र आंदोलन हुए। इसके बाद भाषा तमिलनाडु की राजनीति और पहचान का अहम मुद्दा बन गई।
इसी दौर में द्रविड़ राजनीति मजबूत हुई और राज्य में तमिल-अंग्रेजी की दो-भाषा नीति को महत्व मिला।
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