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दिल्ली में होने वाला विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के लिए बहुत अहम है. इन चुनावों में जीत हासिल करना आम आदमी पार्टी के लिए जिसके तमाम नेता भ्रष्टाचार और अन्य आपराधिक मामलों में फंसे हुए हैं जीवन मरण का प्रश्न है. विधानसभा चुनावों में जीत से पार्टी को जनता की अदालत में पाक साफ बरी होने का प्रमाण मिल जाएगा. कांग्रेस अगर आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव नहीं लड़ती है तो उसके लिए यह चुनाव खुद को साबित करने का जरिया बनने वाला है. पर इस बीच जिस तरह आम आदमी पार्टी के महत्वपूर्ण नेता खुद को चुनाव से दूर कर रहे हैं उससे जनता के बीच गलत संदेश जा रहा है. हो सकता है कि आम आदमी पार्टी खुद इन नेताओं से छुटकारा पाना चाहती हो . पर दोनों ही परिस्थितियों में जनता के बीच आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर उंगली तो उठ ही रही है कि आखिर क्या कारण है कि एक के बाद एक नेता पार्टी से दूर हो रहे हैं.
1-महत्वपूर्ण लोग ही क्यों छोड़ रहे हैं मैदान
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल ने दिल्ली चुनाव न लड़ने का ऐलान करते हुए चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की बात कही है. रामनिवास गोयल दिल्ली के वरिष्ठ नेता हैं और पिछले 10 साल से अरविंद केजरीवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे. जब अरविंद केजरीवाल जेल गए थे उस समय मनीष सिसोदिया , संजय सिंह आदि की अनुपस्थिति में राम निवास गोयल जनता के बीच जाकर पार्टी के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे. इसी तरह विधानसभा में भी पार्टी के लिए रीढ़ बन कर हमेशा खड़े रहे. रामनिवास गोयल का टिकट कटना कई सवाल खड़े करता है.
इसी तरह दिलीप पांडे भी अरविंद केजरीवाल के बहुत खास लोगों में शामिल थे. अन्ना आंदोलन में के समय से केजरीवाल का साथ निभाने वाले पांडेय आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता और स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य हैं. 2020 के दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा के सुरिंदर पाल सिंह (बिट्टू) को हराकर तिमारपुर (विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र) से उन्होंने जीत हासिल की . यही नहीं दिलीप पांडे को मार्च 2020 में दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी का मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया. गोयल और पांडे जैसे लोगों को टिकट न देने का मतलब है कि पार्टी में अरविंद केजरीवाल के भरोसेमंद लोगों की कमी हो चुकी है.गोयल ने तो राजनीति से ही संन्यास लेने की बात कह दी है .मतलब साफ है कि बाहर कहीं जगह तलाश सकते हैं. पांडे ने अभी ऐसी कोई बात नहीं की है पर जाहिर है आगे अपना भविष्य वो भी देंखेंगे.
दिल्ली बीजेपी के मीडिया प्रभारी प्रवीण शंकर कपूर ने आप विधायक रामनिवास गोयल के चुनाव न लड़ने वाले पत्र पर तंज कसते हुए कहा, ‘आप तो ऐसे न थे.’ प्रवीण शंकर कपूर ने कहा कि हर राजनीतिक दल को अपना प्रत्याशी चुनने का अधिकार है, लेकिन जिस तरीके से आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल विधायकों को बदल रहे हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं, वह चौंकाने वाला है.
2-चुनाव लड़ने से मना करने का मतलब है कि जमीनी स्थिति खराब हो रही है
हो सकता है कि इन नेताओं को अपने टिकट कटने का अहसास होने के चलते निराशा में ये पार्टी से दूरी बना रहे हों. पर क्या यह कारण भी अरविंद केजरीवाल के लिए चिंता का विषय नहीं है? अगर अरविंद केजरीवाल अपनी पार्टी के कद्दावर लोगों का टिकट काट रहे हैं तो इसका सीधा मतलब क्या है? क्या इसका मतलब यह नहीं लगाया जाएगा कि पार्टी की लोकप्रियता इतनी घट गई है कि पार्टी के बड़े नेता भी अपनी सीट बचाने के काबिल नहीं हैं. अभी पिछले दिनों जिस तरह आम आदमी पार्टी ने विधानसभा चुनावों के लिए कैंडिडेट की पहली लिस्ट जारी की है उसे देखते हुए साफ लग रहा था कि पार्टी को बाहरी पार्टी से आए नेताओं पर ज्यादा भरोसा है. पर यह क्रम लगातार बढ़ता ही जा रहा है. तो क्या आम आदमी पार्टी के नेता दिल्ली की जनता से दूर हो गए हैं? सुनने में यह भी आ रहा है कि अरविंद केजरीवाल के सबसे खास लोगों जिनमें मनीष सिसोदिया तक शामिल हैं अपने लिए सुरक्षित सीट ढूंढ रहे हैं.
3- क्या अरविंद केजरीवाल के पास जमीनी भरोसेमंद लोग कम हुए
राम निवास गोयल चाहे जिस कारण से राजनीति से संन्यास ले रहे हों पर अरविंद केजरीवाल को उनकी जगह प्रत्याशी बनाने के लिए एक बीजेपी नेता को तोड़कर लाना पड़ा है. आम आदमी पार्टी ने एंबुलेंस मैन पद्मश्री जितेंद्र सिंह शंटी को आप में शामिल कराया है. कहा जा रहा है कि पार्टी शंटी को राम निवास गोयल की जगह पर शाहदरा से उम्मीदवार बना सकती है.
दिलीप पांडे ने तिमारपुर से चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया है तो ये कयास लगने लगे हैं कि कहीं अवध ओझा तिमारपुर से ही तो उम्मीदवार नहीं होंगे. तिमारपुर विधानसभा में ही दिल्ली यूनिवर्सिटी और आसपास के इलाके जैसे कि मुखर्जी नगर, इंदिरा विहार, नेहरू विहार जैसे इलाके आते हैं जहां यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्रों की भरमार है.
आम आदमी पार्टी जिस तरह अपने पुराने साथियों को बाहर का रास्ता दिखा रही है और बाहर से आए लोगों को गले लगा रही है ये इस बात का संकेत है कि पार्टी नेता जनता की अदालत में खरे नहीं उतरे हैं. इस तरह के फैसले पार्टी तभी लेती है जब किसी आंतरिक सर्वे में विधायकों से नाराजगी की खबरें होती है. ये भी हो सकता है कि सर्वे में विधायकों की नाराजगी के साथ सरकार के प्रति भी नराजगी हो. किराड़ी में दो बार के विधायक ऋतुराज की जगह बीजेपी से आए अनिल झा को टिकट दिया जाना भी यही कहता है कि दूसरे दल वालों पर पार्टी कुछ ज्यादा ही भरोसा करने लगी है. सीलमपुर में भी एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है. यहां विधायक अब्दुल रहमान की जगह कांग्रेस के पूर्व विधायक मतीन अहमद के बेटे जुबैर अहमद को टिकट दिया गया है. यह स्पष्ट है कि केजरीवाल और उनकी पार्टी आने वाले चुनावों में दूसरी पार्टी से लाए गए नेताओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.
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