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दिल्ली में कांग्रेस दफ्तर में बुधवार को अशोक गहलोत और सचिन पायलट मिलते हैं, एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं और मुस्कुराते हुए तस्वीर भी खिंचाते हैं. गहलोत मीडिया से मजकिया अंदाज में कहते हैं कि आप लोग बोलते हो कि हमारी बनती नहीं, देख लो कितनी बनती है. इसके बाद सचिन पायलट भी मुस्कुराते हुए कहते कि गहलोत साहब तो मुझसे मिलने के लिए पीछे-पीछे आए हैं.
गहलोत और पायलट की यह मुलाकात सियासी मायने में काफी अहमियत रखती है, क्योंकि 2022 में दोनों के बीच सियासी अदावत के चलते आपस में ‘तलवारें खिंच’ गई थी. इसके चलते राजस्थान में गहलोत सरकार दांव पर आ गई थी, कांग्रेस हाईकमान के दखल के बाद मामला टल गया था, लेकिन आपसी तनाव बना रहा.
राजस्थान में ‘अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट’ के चलते ही 2023 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना भी पड़ा था, लेकिन अब दोनों ही ये बताने में जुटे हैं कि उनके बीच सियासी अदावत खत्म हो गई है. पायलट और गहलोत दोनों ये संदेश दे रहे हैं कि उनके बीच सबकुछ ठीक है, लेकिन इस सुलह की असल हकीकत दो साल बाद राजस्थान में होने वाले चुनाव में पता चलेगा?
पायलट और गहलोत में क्या सब कुछ ठीक
कांग्रेस दफ्तर में बुधवार को सचिन पायलट और अशोक गहलोत की मुलाकात को को सिर्फ एक मुलाकात समझ लिया जाए, तो शायद कहानी अधूरी रह जाएगी. राजस्थान में इन दोनों ही नेताओं के बीच सियासी अदावत किसी से छिपी नहीं है, जब भी मौका आता है तो दोनों एक दूसरे पर निशाना साधने का मौका नहीं छोड़ते हैं. अभी कुछ दिन पहले ही 14 अप्रैल को नागौर में एक कार्यक्रम के दौरान गहलोत ने अंबेडकर जयंती पर भाषण देते हुए बिना नाम लिए पायलट पर निशाना साधा था.
गहलोत ने 2022 के हरियाणा मानेसर प्रकरण को याद दिलाया, जब उनकी सरकार पर संकट आया था. उस वक्त उन्होंने कहा कि कैसे विधायकों को बहकाकर मानेसर ले जाया गया और सरकार गिराने की कोशिश हुई. इस तरह उन्होंने अपने दिल का दर्द बयां किया. इत्तेफाक ये रहा कि उसी दिन सचिन पायलट भी जयपुर में थे और कांग्रेस दफ्तर में अंबेडकर जयंती के कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे थे. एक तरफ मंच से पुराने जख्मों का जिक्र, दूसरी तरफ दिल्ली में मुस्कुराती तस्वीर. पायलट और गहलोत जो यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके बीच सबकुछ ठीक है, क्या वकायी सारी अदावत खत्म हो गई है.
राजस्थन में दिखेगी गहलोत-पायलट की केमिस्ट्री
राजस्थान में कांग्रेस की सियासत में दो राजनीतिक ध्रुव है, जिसमें एक अशोक गहलोत हैं तो दूसरे सचिन पायलट. ये दोनों ही एक दूसरे को राजनीतिक रूप से निपटाने पर लगे हैं, लेकिन कांग्रेस दफ्तर में मीडिया के सामने जिस तरह मुस्कराते हुए तस्वीर खिंचाई और यह संदेश दिया है कि अब उनके बीच कई कड़ावट नहीं रह गई है. ऐसे में इस
पूरे घटनाक्रम के बीच एक और बात तेजी से घूम रही है.
सचिन पायलट का सियासी कद बढ़ा है, राजस्थान कांग्रेस की सियासत में फिर से बड़ी भूमिका में उनके लौटने की चर्चा है. पांच राज्यों के चुनाव के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर फैसला हो सकता है, और इस रेस में पायलट का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है. इसी बीच अशोक गहलोत की सक्रियता भी बढ़ी हुई नजर आ रही है.
गहलोत बीजेपी सरकार पर लगातार हमलावर हैं. सोशल मीडिया पर उनकी टीम एक्टिव है और गहलोत सरकार के कामों को फिर से सामने लाया जा रहा है. ऐसे में भले ही गहलोत और पायलट एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन राजस्थान में दो साल बाद होने वाले चुनाव तक सुलह बनी रहेगी?
कांग्रेस ने पायलट-गहलोत में सुलह की बुनियाद
कांग्रेस आलाकमान ने 2028 में राजस्थान में होने विधानसभा चुनाव के लिहाज से पायलट और गहलोत के बीच बेहतर तालमेल बैठाने की कवायद की है. कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की मौजूदगी में हुई बैठकों में यह साफ कर दिया गया कि राजस्थान में पार्टी तभी बच सकती है जब ‘अनुभव’ (गहलोत) और ‘युवा जोश’ (पायलट) एक साथ आएं. आलाकमान ने दोनों नेताओं को अलग-अलग सुना और फिर एक ‘संयुक्त प्रस्ताव’ पर सहमति बनवाई.
माना जाता है कि गहलोत और पायलट के बीच सुलह का फॉर्मूला यह है कि सचिन पायलट को राजस्थान की कमान (संभावित सीएम फेस/प्रदेश अध्यक्ष) सौंपी जा सकती है, जबकि अशोक गहलोत को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका देकर दिल्ली की सियासत में सक्रिय रखने की है. ऐसे में दोनों नेताओं को हिदायत दी गई कि वे एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक मंचों या सोशल मीडिया पर बयानबाजी नहीं करेंगे.
इसके बाद भी वो निशाना साधने से नहीं चूकते हैं, लेकिन बुधवार को दिल्ली में कांग्रेस दफ्तर पर वो जिस तरह से मिले हैं, उसके जरिए यह बताने की कोशिश है कि दोनों नेता अब ‘पुरानी बातों को भूलकर आगे बढ़ने’ (Forgive and Forget) की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
2028 में गहलोत और पायलट का टेस्ट
राजस्थान में बीजेपी के मजबूत आधार को देखते हुए कांग्रेस बिखराव बर्दाश्त नहीं कर सकती थी. गुटबाजी के कारण जमीनी कार्यकर्ता भ्रमित था, जिसे दूर करने के लिए एकता का संदेश देना जरूरी था. भारत जोड़ो यात्रा के बाद ही राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया था कि दोनों नेता पार्टी के लिए ‘एसेट’ (संपत्ति) हैं और उन्हें साथ काम करना ही होगा.
दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय के बाहर एक ऐसा सीन देखने को मिला, जिसने राजस्थान की राजनीति को फिर चर्चा में ला दिया. एक तरफ थे अशोक गहलोत, दूसरी तरफ सचिन पायलट. दोनों एक साथ, आमने-सामने, और फिर हाथ मिलाते हुए. जो लोग लंबे समय से इन दोनों के रिश्ते को लेकर सवाल करते रहे हैं, उनके लिए ये पल थोड़ा अलग था. हालांकि, इस सुलह और दोस्ती का टेस्ट राजस्थान में होने वाले 2028 के चुनाव में होगा?
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