Shreeom Singh
Date: 01-11-26 10:34
अब तक दुनिया ने युद्ध को जमीन, समुद्र और आसमान में होते देखा है, लेकिन आने वाले समय में अंतरिक्ष भी जंग का बड़ा मैदान बन सकता है. रूस और चीन अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं. इनके पास ऐसे हथियार और तकनीक हैं, जिनसे दुश्मन देश के सैटेलाइट्स को जाम, खराब या नष्ट किया जा सकता है. रूस के अंतरिक्ष में परमाणु हथियार तैनात करने की योजना और चीन के लेजर व रोबोटिक तकनीक वाले सैटेलाइट्स ने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी है.
स्पेस वॉर में कैसे कमजोर हो सकती है अमेरिकी सेना?
आज के समय में सैटेलाइट्स किसी भी देश की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा हैं. सेना के संचार, नेविगेशन, मिसाइलों की निगरानी और सैन्य अभियानों में इनका इस्तेमाल होता है. अमेरिका भी अपनी कई सैन्य गतिविधियों के लिए अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स पर निर्भर है.
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के विशेषज्ञ क्लेटन स्वोप ने फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा कि अगर कोई दुश्मन देश अमेरिकी स्पेस सिस्टम को जाम या तबाह कर देता है, तो अमेरिका के लिए सैन्य अभियान चलाना बेहद मुश्किल हो सकता है.
रूस और चीन इसी कमजोरी का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं. युद्ध की शुरुआत में ही अमेरिकी सैटेलाइट्स को निशाना बनाकर वे उसकी सैन्य क्षमता को कमजोर करना चाहते हैं. इसका असर केवल सेना पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि आम लोगों की जिंदगी भी प्रभावित हो सकती है. GPS, बैंकिंग सिस्टम, मौसम की जानकारी और बिजली ग्रिड जैसी सेवाओं पर भी इसका असर पड़ सकता है.
चीन के पास रोबोटिक आर्म और लेजर हथियार
चीन अंतरिक्ष में अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए कई तरह की तकनीक विकसित कर रहा है. उसका एक बड़ा लक्ष्य दूसरे देशों के सैटेलाइट्स को बेअसर करना है.
चीन के पास जमीन से संचालित होने वाले शक्तिशाली लेजर सिस्टम हैं. इनका इस्तेमाल लो-अर्थ ऑर्बिट में मौजूद सैटेलाइट्स के सेंसर को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है. इससे सैटेलाइट की काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
इसके अलावा चीन ने रोबोटिक आर्म यानी मशीन से चलने वाले हाथों से लैस अंतरिक्ष यान भी विकसित किए हैं. Shijian-17 ऐसा ही एक उदाहरण है. इस तरह की तकनीक से किसी दूसरे सैटेलाइट को पकड़ने, उसकी दिशा बदलने या उसे नुकसान पहुंचाने की क्षमता मिल सकती है. अमेरिकी रक्षा विभाग भी चीन की इन गतिविधियों को अंतरिक्ष में बढ़ते सैन्य खतरे के तौर पर देखता है.
अमेरिकी सैटेलाइट्स के करीब पहुंच रहे रूस के कॉसमॉस उपग्रह
रूस भी अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाने में जुटा है. उसकी कॉसमॉस सीरीज के कुछ सैटेलाइट्स अमेरिकी सुरक्षा और जासूसी उपग्रहों के करीब पहुंच चुके हैं. इससे अमेरिका को आशंका है कि रूस इनकी निगरानी करने या जरूरत पड़ने पर इन्हें निशाना बनाने की क्षमता विकसित कर रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 से रूस अपने कुछ कॉसमॉस सैटेलाइट्स को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा उपग्रहों के पास भेजता रहा है. कॉसमॉस 2543 ने एक अमेरिकी सैटेलाइट के पास रहते हुए अंतरिक्ष में प्रोजेक्टाइल भी छोड़ा था. अमेरिका ने इसे एंटी-सैटेलाइट हथियारों से जुड़ा परीक्षण माना था.
इसके बाद कॉसमॉस 2558 और 2576 को भी अमेरिकी सैटेलाइट्स की कक्षाओं के आसपास देखा गया. साल 2025 तक कॉसमॉस 2588 एक अमेरिकी सरकारी सैटेलाइट से करीब 93 किलोमीटर की दूरी पर था.
रूस एक ऐसे हथियार पर भी काम कर रहा है, जिसे मॉडिफाइड MiG-31 लड़ाकू विमान से लॉन्च किया जा सकता है. इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल कम ऊंचाई वाली कक्षाओं में मौजूद सैटेलाइट्स को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है.
अंतरिक्ष में परमाणु धमाका कर सकता है भारी तबाही
रूस की ओर से अंतरिक्ष में परमाणु हथियार ले जाने वाले सैटेलाइट को विकसित करने की आशंका अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता है. अगर ऐसा हथियार तैनात किया जाता है, तो यह 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी के नियमों का उल्लंघन होगा. इस संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार या दूसरे सामूहिक विनाश के हथियार तैनात करने पर रोक है.
पेंटागन की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अंतरिक्ष में परमाणु विस्फोट होने से लो-अर्थ ऑर्बिट में मौजूद बड़ी संख्या में सैटेलाइट्स को नुकसान पहुंच सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्षेत्र में 15 हजार से ज्यादा सरकारी और व्यावसायिक सैटेलाइट्स मौजूद हैं.
परमाणु विस्फोट के बाद पैदा होने वाला रेडिएशन भी लंबे समय तक खतरा बना रह सकता है. इससे अंतरिक्ष में रेडिएशन का ऐसा क्षेत्र बन सकता है, जो कई सालों तक सैटेलाइट्स के लिए नुकसानदायक रहेगा. इसका असर संचार, नेविगेशन और दूसरी जरूरी सेवाओं पर पड़ सकता है.
अंतरिक्ष में भी शुरू हो चुका है सैन्य मुकाबला?
अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ केवल भविष्य की आशंका नहीं है. अलग-अलग देशों के बीच सैटेलाइट और GPS सिस्टम को निशाना बनाने की घटनाएं सामने आती रही हैं. अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के दौरान अमेरिका और ईरान ने एक-दूसरे की स्पेस क्षमताओं को प्रभावित करने के लिए कदम उठाए थे.
जून में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास GPS जैमिंग की कई घटनाएं भी सामने आई थीं. इससे अमेरिकी लड़ाकू विमानों और व्यापारिक जहाजों के संचालन पर असर पड़ने की आशंका जताई गई. इन घटनाओं ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध में GPS जैमिंग और साइबर हमले कितने अहम हो गए हैं.
रूस-चीन की गतिविधियों से अमेरिका की बढ़ी चिंता
रूस और चीन की बढ़ती अंतरिक्ष सैन्य क्षमता को लेकर अमेरिका में भी चिंता जताई गई है. फरवरी 2024 में अमेरिकी कांग्रेस में रूस की ओर से अंतरिक्ष में परमाणु हथियार तैनात करने की संभावित योजना पर चर्चा हुई थी. इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया गया था.
अमेरिकी स्पेस कमांड के प्रमुख जनरल स्टीफन व्हिटिंग समेत कई वरिष्ठ अधिकारी रूस और चीन की अंतरिक्ष गतिविधियों पर चिंता जता चुके हैं. अमेरिका को डर है कि भविष्य में अगर इन देशों के बीच युद्ध हुआ, तो उसके सैटेलाइट सिस्टम को निशाना बनाया जा सकता है. इससे अमेरिकी सेना की निगरानी, संचार और नेविगेशन क्षमता प्रभावित हो सकती है.
क्या अंतरिक्ष बनेगा अगली जंग का मैदान?
रूस के परमाणु हथियारों से जुड़े कार्यक्रम और चीन के लेजर व रोबोटिक सिस्टम ने अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा को नई दिशा दे दी है. आने वाले समय में युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं रह सकता. अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स भी किसी देश की सुरक्षा और सैन्य ताकत का अहम हिस्सा बन चुके हैं.
अगर बड़ी ताकतों के बीच अंतरिक्ष में टकराव बढ़ता है, तो इसका असर केवल सेना तक सीमित नहीं रहेगा. संचार, बैंकिंग, GPS और मौसम से जुड़ी सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं. ऐसे में अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती होड़ पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है.
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