महिला आरक्षण देने के तरीके और परिसीमन पर सहमति न बनना आश्चर्यजनक नहीं, पर चिंताजनक जरूर है। संविधान में संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए, पर यह अभी केंद्र मेंं सत्तारूढ़ गठबंधन के पास नहीं है। सरकार बहुत प्रयास के बावजूद तीन विधेयकों को पारित कराने में नाकाम रही है। यह बात बहुत मुखरता से सिद्ध हुई है कि विपक्ष के नेताओं में सत्ता पक्ष के प्रति विश्वास की भारी कमी है। सत्ता पक्ष के प्रति एकजुट विपक्ष की तल्खी गौर करने लायक है। बहुत कम अवसर आए हैं, जब विपक्ष में ऐसी एकता दिखाई पड़ी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के भाषण में वर्तमान सत्ता या भाजपा विरोध का जो स्तर देखा गया है, उसमें सहमति बनाने की राह कतई आसान नहीं है। यह लोकतंत्र और संविधान का एक सशक्त पहलू है कि अगर किसी सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है, तो वह संविधान संशोधन नहीं कर सकती। भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन लोकसभा में महज 298 सीटों तक सिमट गया। वर्ष 1976 में परिसीमन को संविधान संशाेधन से रोका गया था। तब से नए परिसीमन का इंतजार है और अभी न जाने कितना इंतजार करना पड़ेगा?
अब आगे क्या होगा, उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इस विशेष सत्र में क्या हुआ है? पहली बात, इस विशेष सत्र में विपक्ष की ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती सामने आई हैं। दूसरी बात, दक्षिण के राज्यों और दलों की दलीलों को जिस तरह का समर्थन उत्तर के राज्यों के नेताओं से मिला है, वह उल्लेखनीय है। उत्तर के नेताओं ने फिर सिद्ध किया है कि उन्हें दक्षिण के लोगों की पूरी परवाह है। तीसरी बात, चूंकि राजनीतिक दल अपने स्तर पर पिछड़ी, दलित, ओबीसी, मुस्लिम महिलाओं को पर्याप्त चुनावी टिकट देने में नाकाम हो रहे हैं, तो अब उनकी कोशिश है कि 33 प्रतिशत महिला आरक्षण संबंधी कानून में ही यह प्रावधान कर दिया जाए। मतलब, सरकार आज करे या कल, उसे आरक्षण के भीतर आरक्षण की व्यवस्था करनी पड़ेगी। मान लीजिए, ओबीसी वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था नहीं हुई, तो भी यह राजनीतिक मुद्दा बना दिया जाएगा। आरक्षण से अटूट रूप से जुड़ चुकी भारतीय राजनीति की विवशता से हर सियासी दल को गुजरना पड़ेगा।
विशेष सत्र में यह साबित हुआ कि परिसीमन का काम भारत में आसान नहीं है। 1976 के बाद से 2026 तक देश को परिसीमन का इंतजार है। संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था की थी कि आबादी के हिसाब से विधायिका में सीटों की संख्या बढ़ती चली जाएगी। सीटों की संख्या नहीं बढ़ी, लेकिन आबादी 50 करोड़ से 140 करोड़ पर पहुंच गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने जवाब में बताया है कि देश में 127 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आबादी 20 लाख से ज्यादा है। एक सांसद बीस लाख लोगों का संपूर्ण प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? यह तय है कि परिसीमन आज देश की जरूरत है, पर ऐसा लगता है, परिसीमन हो भी गया, तो इस दशक में लागू नहीं हो पाएगा। बहरहाल, आगे की राह सरकार को ही निकालनी चाहिए। दक्षिण के नेताओं से भी पूछना चाहिए कि अगर वे वर्तमान संविधान के अनुरूप परिसीमन नहीं चाहते हैं, तो उनके पास परिसीमन का क्या फार्मूला है? हर सियासी दल को यह समझना होगा कि संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण और चुनाव क्षेत्रों का यथोचित परिसीमन देश की तरक्की के लिए जरूरी है, उसे ज्यादा समय तक रोका नहीं जा सकता।
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