Shreeom Singh
Date: 09-10-26 10:26
पाकिस्तान में देश का नक्शा बदलने को लेकर चर्चा तेज हो गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर देश के चार बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने के पक्ष में हैं. इसके तहत पाकिस्तान में 12 से 15 नए प्रांत बनाए जा सकते हैं. एक योजना में 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनाने का विकल्प भी शामिल है.
फिलहाल पाकिस्तान में पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान समेत चार प्रांत हैं. इनके बंटवारे से प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव हो सकता है. हालांकि, इसका असर केवल सरकारी कामकाज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की राजनीतिक ताकत का संतुलन भी बदल सकता है.
पाकिस्तान के प्रांतों में आबादी का बड़ा अंतर
पाकिस्तान के चारों प्रांत आबादी और क्षेत्रफल के मामले में एक-दूसरे से काफी अलग हैं. पंजाब देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला प्रांत है, जहां करीब 12.8 करोड़ लोग रहते हैं. यह पाकिस्तान की आधी से ज्यादा आबादी है. दूसरी ओर, बलूचिस्तान क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन यहां करीब डेढ़ करोड़ लोग ही रहते हैं.
‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब जैसे बड़े प्रांत का प्रशासन संभालना आसान नहीं है. ग्रामीण इलाकों में लोगों को सरकारी सेवाओं के लिए घंटों सफर करना पड़ सकता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पंजाब की एक चौथाई से कम आबादी को घर पर नियमित रूप से साफ पीने का पानी मिलता है.
असीम मुनीर का मानना है कि बड़े प्रांतों को प्रभावी तरीके से चलाना मुश्किल है. हालांकि, पाकिस्तान की आर्थिक परेशानियों की वजह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है. देश कमजोर आर्थिक विकास, महंगाई और भारी कर्ज जैसी समस्याओं से भी जूझ रहा है.
प्रांतों के बंटवारे से सेना का प्रभाव बढ़ने की आशंका
पाकिस्तान में सेना लंबे समय से राजनीति में अहम भूमिका निभाती रही है. देश के इतिहास के दो-पांचवें से ज्यादा समय तक सेना सीधे सत्ता में रही है. निर्वाचित सरकारों पर भी कई बार उसका प्रभाव देखने को मिला है.
‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट में सेना की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, सेना के पास बड़ी मात्रा में जमीन और कारोबार हैं. सरकारी संसाधनों में भी उसकी अहम हिस्सेदारी है.
ऐसे में प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने से सत्ता का संतुलन बदल सकता है. अगर नए प्रांत केंद्र सरकार पर ज्यादा निर्भर होते हैं, तो केंद्र और सेना के लिए उन पर अपना प्रभाव बनाए रखना आसान हो सकता है. हालांकि, यह प्रस्ताव के संभावित राजनीतिक असर से जुड़ा आकलन है.
पंजाब और सिंध क्यों हैं अहम?
पाकिस्तान के प्रांत प्रशासनिक इकाइयों के साथ-साथ राजनीतिक ताकत के भी बड़े केंद्र हैं. पंजाब को पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) का मजबूत गढ़ माना जाता है, जबकि सिंध में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का प्रभाव रहा है.
इन दोनों प्रांतों की बड़ी आबादी और चुनावी ताकत उन्हें केंद्र के सामने मजबूत बनाती है. अगर इनका बंटवारा होता है, तो उनकी राजनीतिक ताकत अलग-अलग हिस्सों में बंट सकती है. इससे केंद्र सरकार का प्रभाव बढ़ने की आशंका है.
पाकिस्तान में प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की मांग पहले भी उठ चुकी है. योजना मंत्री अहसान इकबाल छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनाने और नए प्रांतों की जरूरत पर बात कर चुके हैं. इस चर्चा में 12 से 15 प्रांत बनाने और 160 तक छोटे प्रशासनिक क्षेत्र तैयार करने का विचार भी शामिल रहा है.
इमरान खान की पार्टी से भी टकराव
प्रांतों के बंटवारे की यह चर्चा ऐसे समय हो रही है, जब पाकिस्तान की राजनीति में असीम मुनीर का प्रभाव बढ़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने PML-N और PPP के साथ काम करते हुए अपनी स्थिति मजबूत की है. वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं और उनके समर्थक लगातार उनकी रिहाई की मांग कर रहे हैं. अधिकारियों ने उनके आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई भी की है.
खैबर पख्तूनख्वा में भी राजनीतिक तनाव बना हुआ है. यह प्रांत इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के शासन में है. रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार और PTI के बीच बातचीत नाकाम होने के बाद इमरान खान के हजारों समर्थकों ने इस्लामाबाद की ओर मार्च शुरू किया. इसके बाद सरकार ने राजधानी के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी और प्रदर्शनकारियों को अंदर आने से रोकने की बात कही.
इस घटनाक्रम से केंद्र और खैबर पख्तूनख्वा की सरकार के बीच तनाव बढ़ा है. यह प्रांत उग्रवादी हिंसा की समस्या से भी जूझ रहा है.
बलूचिस्तान और PoK में भी चुनौतियां
बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा जारी है. यहां प्राकृतिक संसाधनों और इस्लामाबाद की भूमिका को लेकर भी विवाद होते रहे हैं. ऐसे में प्रांत के बंटवारे का फैसला जमीन, संसाधनों और स्थानीय लोगों के राजनीतिक अधिकारों से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है.
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी शासन, महंगाई, टैक्स और आर्थिक हालात को लेकर असंतोष सामने आता रहा है. ऐसे माहौल में देश की आंतरिक सीमाओं को बदलना आसान नहीं होगा.
नए और छोटे प्रांत बनाने के पक्ष में प्रशासन को बेहतर तरीके से चलाने का तर्क दिया जा रहा है. लेकिन इस बदलाव से राजनीतिक ताकत का बंटवारा भी हो सकता है. ऐसे में पाकिस्तान में प्रांतों के पुनर्गठन की यह चर्चा केवल नक्शा बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर देश की सत्ता के संतुलन पर भी पड़ सकता है.
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