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By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: October 17, 2026 07:09 IST2026-10-17T07:09:53+5:302026-10-17T07:09:58+5:30
विजय बाविस्कर का ब्लॉग
विश्व स्तर पर सर्वोच्च सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक माने जाने वाले नोबल पुरस्कारों की घोषणा हुई और इनके माध्यम से मौलिक शोध की शक्ति एक बार फिर प्रमुखता से सामने आई. वर्ष 2026 का शरीरक्रिया विज्ञान अथवा चिकित्सा का नोबल पुरस्कार कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमन और जॉर्ज नागेल को ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक की नींव रखने वाले बुनियादी अनुसंधान के लिए घोषित किया गया. दुनिया ने उनके योगदान को सम्मानपूर्वक नमन किया है. इसका कारण यह है कि इस शोध ने तंत्रिका तंत्र की जटिल प्रक्रियाओं को समझने से लेकर कुछ गंभीर बीमारियों पर अनुसंधान करने तक के नए रास्ते खोले हैं.
वहीं, भौतिकी का नोबल पुरस्कार फ्रांसिस हाल्जेन को घोषित किया गया. न्यूट्रिनो ऐसे सूक्ष्म कण हैं, जो अन्य पदार्थों के साथ बहुत कम अंतःक्रिया करते हैं. इन कणों की खोज और उनका निरीक्षण करना अत्यंत कठिन तथा अथक परिश्रम का काम है. इसी उपलब्धि के लिए नोबल पुरस्कार के माध्यम से उन्हें सम्मानित किया गया. औषधि निर्माण जैसे क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुसंधान करने के लिए हेनरी बी. कागन और केन्सो सोई को रसायन विज्ञान का नोबल पुरस्कार घोषित किया गया. इन नोबल पुरस्कारों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि बुनियादी अनुसंधान का महत्व कितना अधिक है.
नोबल पुरस्कार मिलने का मतलब है अनुसंधान के क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर तक पहुंचना. इसके पीछे वर्षों की जिज्ञासा, असफलताओं से सीखने की तैयारी और प्रयोगों के लिए किया गया अथक परिश्रम होता है. जब वैश्विक स्तर के इन नोबल पुरस्कारों की घोषणा होती है और दुनियाभर में वैज्ञानिकों की उपलब्धियों की सराहना की जाती है, तब एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है. भारत प्रतिभाओं का भंडार है, फिर भी हम नोबल पुरस्कारों के मामले में पीछे क्यों हैं? एक शताब्दी बीत जाने के बाद भी बुनियादी विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में भारत में कार्यरत कोई भारतीय वैज्ञानिक नोबल पुरस्कार विजेता के रूप में क्यों नहीं उभर पाया?
किसी राष्ट्र की समृद्धि उसकी तिजोरी में मौजूद धन से मापी जाती है, लेकिन उस राष्ट्र की वास्तविक ऊंचाई उसकी बुद्धिमत्ता, ज्ञान-साधना और दुनिया को दिए गए बौद्धिक योगदान से मापी जाती है. जिस भारतभूमि ने दुनिया को शून्य दिया, जिस भूमि में ज्ञान को ईश्वर का स्थान दिया गया, जिस देश की युवा प्रतिभाओं ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में विश्व स्तर पर अपनी छाप छोड़ी, उसी भारत की नोबल पुरस्कारों के मंच पर उपस्थिति तुलनात्मक रूप से इतनी कम क्यों है?
वैसे देखा जाए तो भारत की वैज्ञानिक परंपरा समृद्ध रही है. वर्ष 1930 में सी. वी. रमन को भौतिकी का नोबल पुरस्कार मिला था. इसके बाद भी भारतीय मूल के अनेक वैज्ञानिकों ने विज्ञान की दुनिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. चिकित्सा के क्षेत्र में हरगोविंद खुराना, भौतिकी में सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर और रसायन विज्ञान में वेंकटरमण रामकृष्णन को नोबल पुरस्कार मिले.हालांकि, यहां एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इन नोबल पुरस्कार विजेताओं ने अपना अधिकांश पुरस्कार-विजेता शोध भारत से बाहर स्थित अनुसंधान संस्थानों में किया था. इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हमारे देश में गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान होता ही नहीं है. ऐसा निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा.
अंतरिक्ष अनुसंधान, परमाणु ऊर्जा, औषधि निर्माण, जैव प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में भारत ने निश्चित रूप से उल्लेखनीय प्रगति की है. अनेक वैश्विक अनुसंधान परियोजनाओं में भी भारतीय वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है और आज भी दे रहे हैं. लेकिन दुनिया को नई दिशा देने वाले विज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों से जुड़े अनुसंधान के मामले में भारतीय वैज्ञानिक अपेक्षाकृत पीछे हैं. इस वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता. बुनियादी विज्ञान अनुसंधान पर देश में होने वाला खर्च और इसके लिए उपलब्ध आर्थिक प्रावधान एक महत्वपूर्ण मुद्दा है.
अनुसंधान के लिए अत्याधुनिक उपकरणों, कुशल तकनीशियनों, प्रयोगशालाओं, शोध सहायकों और दीर्घकालीन परियोजनाओं को निरंतर आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है. भारत में अनुसंधान एवं विकास पर होने वाला खर्च जीडीपी के एक प्रतिशत से भी कम है. जबकि अमेरिका, चीन और अन्य प्रमुख अनुसंधान-प्रधान देशों में यह अनुपात काफी अधिक है. केवल आकर्षक छात्रवृत्तियां या कुछ वर्षों के लिए दिए जाने वाले अनुदान पर्याप्त नहीं होंगे. यह सुनिश्चित करना होगा कि वैज्ञानिकों को अपनी स्वतंत्र प्रयोगशालाएं स्थापित करने, कुशल सहयोगियों की टीम बनाने और आवश्यक उपकरण तथा संसाधन प्राप्त करने की सुविधा मिले.
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