गत 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री ने विधायिका में 33 फीसदी महिला आरक्षण के वादे की याद दिलाई। बीते हफ्ते पुणे में राहुल गांधी ने भी हजारों छात्राओं से संवाद किया। इसके पहले जंतर-मंतर पर जो आंदोलन चला, उसमें लड़कियां अग्रिम पंक्ति में नजर आई थीं।
कुछ पीछे मुड़कर देखें तो किसान आंदोलन में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था और सीएए के विरोध में शाहीन बाग में बैठी दादियां सुर्खियों में रही थीं। कुछ और पीछे देखें तो नर्मदा आंदोलन की बड़ी नेता मेधा पाटकर रहीं और सूचना के अधिकार की पृष्ठभूमि तैयार करने में अरुणा राय की अहम भूमिका रही।
इन दिनों सोशल मीडिया पर लड़कियां बड़ी मुखरता से अपने विचार रखती नजर आ रही हैं। कई बार महिलाएं वे सब कह डाल रही हैं जो पुरुष कहने से डरते हैं। तो क्या सार्वजनिक जीवन व राजनीतिक परिदृश्य में अब महिलाओं की उपस्थिति निर्णायक जगह बना रही है? उनकी मुखरता का परिणाम है कि बीजेपी हो या कांग्रेस- सब महिलाओं की भागीदारी के उत्साही-समर्थक हो उठे हैं?
हालांकि सच्चाई यह है कि 33 फीसदी आरक्षण की वकालत करने के बावजूद अब तक के चुनावों में तमाम पार्टियों ने महिला उम्मीदवारों को पर्याप्त टिकट नहीं दिए हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने करीब 16 फीसदी महिला उम्मीदवारों को उतारा तो कांग्रेस ने 13 फीसदी महिलाओं को टिकट दिया।
पूरे चुनाव में महिला उम्मीदवारों का राष्ट्रीय औसत 10 फीसदी से भी कम रहा। महिलाओं को वोटरों की तरह तो लुभाया जा रहा है, सरकारें उन्हें लाभार्थी के रूप में तरह-तरह के फायदे भी पहुंचा रही हैं, पर नेतृत्व की पंक्ति अब भी उन्हें जगह देने को तैयार नहीं है।
दरअसल महिला आरक्षण को लेकर पिछले तीन दशकों से चल रही राजनीति का इकलौता सबक यह है कि धीरे-धीरे सभी दल महिला आरक्षण पर सैद्धांतिक तौर पर सहमत तो हो गए हैं, लेकिन वे उन्हें व्यावहारिक तौर पर हिस्सेदारी देने में हिचक रहे हैं।
महिला शक्ति वंदन अधिनियम बाकायदा कानून बन चुका है, लेकिन सरकार मौजूदा सीटों में महिला आरक्षण की व्यवस्था करने की जगह परिसीमन की प्रतीक्षा कर रही है, ताकि एक-तिहाई अतिरिक्त सीटें जुड़ें और महिलाओं को जगह मिले।
लेकिन महिलाओं को राजनीति में आरक्षण या हिस्सा किसी कृपा या रियायत की तरह नहीं मिलने जा रहा है, यह उस जागरूकता और सक्रियता का नतीजा है, जो महिलाओं ने अलग-अलग मोर्चों पर हासिल की और दिखाई है। उनकी राह में रुकावटें भी कई हैं।
पुरुष-केंद्रित राजनीति का मर्दवाद अब भी स्त्रियों को कुछ संदेह और हेठी से देखता है। समाज की पारंपरिक सोच उन्हें याद दिलाती है कि उनकी भूमिका परिवार के भीतर है। जब वे बाहर कदम रखती हैं तो पुरानी सामंती सड़ांध भी उनका रास्ता रोकती ही है।
महिलाएं अपने-आप में एक वर्ग तो हैं ही, वे सभी वर्गों का हिस्सा भी हैं। वे जेन-जी भी हैं, किसान भी, अल्पसंख्यक भी, दलित भी, ओबीसी भी। इस दोहरी स्थिति से वे दोहरे दमन की शिकार होती हैं, लेकिन लगभग हर वर्ग को प्रभावित करने की क्षमता भी रखती हैं।
यह स्थिति उन्हें इस हैसियत में पहुंचाती है कि वे लगभग सभी वर्गों का राजनीतिक एजेंडा समझ और बदल सकें। पुणे में राहुल ने याद दिलाया कि वे बस मां-बहन या बेटी नहीं हैं, उनका अपना वजूद भी है। इन दिनों वे अपनी कई छुपी गुलामियों से मुक्त हो रही हैं और देश-समाज को बदलने की लड़ाई की अगली पंक्तियों को अपनी उपस्थिति से सुंदर और सभ्य बना रही हैं। यह एक सुकूनदेह दृश्य है और आश्वस्त करता है कि जब राजनीति की कमान उनके हाथ में आएगी तो एक बेहतर और बराबरी वाली दुनिया का सपना सच्चाई के कुछ करीब आएगा।
इन दिनों महिलाएं अपनी कई छुपी गुलामियों से मुक्त हो रही हैं और देश और समाज को बदलने की लड़ाई की अगली पंक्तियों को अपनी उपस्थिति से सुंदर और सभ्य बना रही हैं। यह एक सुकूनदेह दृश्य है और आश्वस्त करता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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