Shreeom Singh
Date: 19-10-26 14:04
यूरोप को दुनिया के विकसित इलाकों में गिना जाता है, लेकिन यहां भी महंगाई, बेरोजगारी, महंगे किराये और शिक्षा से जुड़ी समस्याओं ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है. फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, इटली, बेल्जियम और अल्बानिया में लोग अलग-अलग मुद्दों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. इन सभी देशों में लोगों की मांग है कि सरकार उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए.
फ्रांस: शिक्षा व्यवस्था और महंगाई से नाराज युवा
फ्रांस में विद्यार्थियों ने स्कूलों में शिक्षकों की कमी, पुरानी इमारतों और लंबे स्कूल समय को लेकर विरोध शुरू किया. कुछ विद्यार्थियों को सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक स्कूल में रहना पड़ता है. विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया को लेकर भी शिकायतें हैं.
ले मोंडे की 16 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्कूलों की एक कक्षा में औसतन 30.5 विद्यार्थी हैं. माध्यमिक शिक्षा में सालभर के करीब 10 फीसदी पढ़ाई के घंटे पूरे नहीं हो पाते. इसकी वजह शिक्षकों की कमी और स्कूल बंद रहने जैसी समस्याएं हैं. कई स्कूलों की इमारतें भी काफी पुरानी हैं.
धीरे-धीरे इस विरोध में मजदूर संगठन और महंगाई से परेशान लोग भी शामिल हो गए. मजदूर संगठन वेतन बढ़ाने, पेंशन में सुधार और बढ़ती कीमतों को कम करने की मांग कर रहे हैं. सरकार ने अतिरिक्त शिक्षकों की व्यवस्था करने और विश्वविद्यालय फीस बढ़ाने की योजना वापस लेने का वादा किया है.
स्पेन: महंगे किराये ने बढ़ाई परेशानी
स्पेन में विरोध की सबसे बड़ी वजह घरों का बढ़ता किराया और आवास की कमी है. एक 87 वर्षीय महिला को किराया 230 फीसदी बढ़ने के बाद घर खाली करना पड़ा. अस्पताल में भर्ती होने के दो हफ्ते बाद उनकी मौत हो गई. इस घटना ने महंगे किराये और लोगों को घरों से निकालने के मुद्दे पर गुस्सा बढ़ा दिया.
प्रदर्शनकारी किराये पर सीमा तय करने, लोगों को घरों से निकालने पर रोक लगाने और निवेश फंडों की ओर से रिहायशी मकान खरीदने पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं. आवास से जुड़ा विधेयक पास नहीं हो पाने के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है.
पुर्तगाल: वेतन से भी ज्यादा हो गया घर का किराया
पुर्तगाल में भी महंगे घर और किराया लोगों की परेशानी बढ़ा रहे हैं. राजधानी लिस्बन में औसत किराया, औसत वेतन से भी ज्यादा बताया गया है. ऐसे में नौकरी करने वाले लोगों के लिए घर का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा है.
यूरोपीय संसद के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 से 2024 के बीच पुर्तगाल में घरों की कीमतें 124.4 फीसदी बढ़ीं. वहीं, यूरोपीय संघ की परिषद के आंकड़ों के अनुसार, लिस्बन में औसत किराया औसत वेतन का 116 फीसदी है. इसी वजह से युवा और परिवार महंगे मकानों, कम वेतन और बढ़ती महंगाई के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं.
इटली और अल्बानिया में भी लोगों का गुस्सा
इटली के मिलान में बढ़ती महंगाई और जीवनयापन के खर्च के खिलाफ प्रदर्शन हुए. कुछ जगहों पर हालात हिंसक भी हो गए. वहीं, अल्बानिया में भ्रष्टाचार, रोजगार की कमी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर लोगों में नाराजगी है. एक विवादित तटीय परियोजना ने भी विरोध को बढ़ाया है, जिसका संबंध जेरेड कुशनर से बताया गया है.
बेल्जियम के ब्रसेल्स और लीज में भी विद्यार्थियों ने प्रदर्शन किया. यहां शिक्षा सुधारों, फीस बढ़ाने और सरकार की बजट कटौती वाली नीतियों का विरोध हो रहा है. इन घटनाओं से साफ है कि यूरोप में लोगों की नाराजगी सिर्फ महंगाई तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, रोजगार और सरकारी फैसले भी इसके बड़े कारण हैं.
क्या चुनावों पर भी पड़ेगा असर?
इन विरोध-प्रदर्शनों का असर आने वाले चुनावों में दिखाई दे सकता है. स्पेन में महंगे किराये और आवास संकट का मुद्दा राजनीति में अहम बना हुआ है. वहीं, फ्रांस में शिक्षा, महंगाई और सरकारी सेवाओं से जुड़ी समस्याएं 2027 के राष्ट्रपति चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकती हैं.
अगले चुनावों की बात करें तो स्पेन में 29 नवंबर 2026 को आम चुनाव होने की जानकारी दी गई है. फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव अप्रैल-मई 2027 में होने हैं. इटली में अक्टूबर 2027 में चुनाव की संभावना है, जबकि बेल्जियम, पुर्तगाल और अल्बानिया में अगले चुनाव 2029 में हो सकते हैं.
सरकारों के लिए चेतावनी हैं ये प्रदर्शन?
छह देशों में विरोध के कारण अलग-अलग हैं. फ्रांस में शिक्षा और महंगाई, स्पेन और पुर्तगाल में महंगे घर-किराये, जबकि अल्बानिया में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी मुख्य मुद्दे हैं. लेकिन इन सभी जगहों पर एक सवाल समान है कि क्या युवा पढ़ाई या नौकरी करने के बाद भी सम्मान से जीवन जीने के लिए पर्याप्त कमाई और सुविधाएं जुटा पा रहे हैं?
यूरोपीय संसद के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 से 2024 के बीच यूरोपीय संघ में घरों की कीमतें औसतन 53 फीसदी बढ़ीं. यूरोपीय निवेश बैंक ने 2025 में आवास की जरूरत पूरी करने के लिए 22.5 लाख अतिरिक्त घरों की आवश्यकता का अनुमान लगाया था. इससे पता चलता है कि सस्ते घरों की कमी पूरे क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बन गई है. अब सरकारों के सामने सवाल है कि वे लोगों को सिर्फ भरोसा देंगी या महंगाई, शिक्षा, रोजगार और आवास की समस्याओं को दूर करने के लिए ठोस कदम भी उठाएंगी.
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