'फ्रांस के बाद भारत की बारी…', छात्र प्रदर्शनों के पीछे इस्लामी-वामपंथी नेटवर्क? अमेरिकी पत्रकार ने चेताया – Bharat24live

Rashmi Singh
Date: 13-10-26 14:36
Student Protests: फ्रांस में छात्र प्रदर्शनों के पीछे सक्रिय संगठनों और उनके कथित अंतरराष्ट्रीय संपर्कों को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. फॉक्स न्यूज की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि फ्रांस में विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े 50 संगठनों में छात्र समूहों के अलावा ट्रेड यूनियन, कम्युनिस्ट और समाजवादी संगठन तथा राजनीतिक दल भी शामिल थे. रिपोर्ट में इन संगठनों के बीच अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और कथित विदेशी फंडिंग की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं. इसी बीच अमेरिकी पत्रकार अस्रा नोमानी ने फ्रांस में हुए प्रदर्शनों और भारत में चल रहे आंदोलनों के बीच संभावित संबंधों का दावा किया है. हालांकि, इन आरोपों और कथित कनेक्शनों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है.
फ्रांस में प्रदर्शनों से जुड़े 50 संगठनों को लेकर क्या दावा?
फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में छात्र विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े 50 संगठनों की पहचान की गई. इनमें से 15 संगठन छात्र या युवा समूह बताए गए, जबकि बाकी 35 में लेबर यूनियन, कम्युनिस्ट और समाजवादी संगठन, राजनीतिक पार्टियां तथा फिलिस्तीन समर्थक एक समूह शामिल होने का दावा किया गया है. रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि क्या इन प्रदर्शनों को व्यापक समर्थन देने में अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की भूमिका रही. इसमें कुछ वैचारिक समूहों और प्लेटफॉर्मों पर आंदोलनों की पहुंच बढ़ाने में मदद करने के आरोप भी लगाए गए हैं.
अस्रा नोमानी ने भारत के प्रदर्शनों से जोड़ा मामला
अमेरिकी पत्रकार अस्रा नोमानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी फॉक्स न्यूज रिपोर्ट साझा करते हुए फ्रांस और भारत में हो रहे प्रदर्शनों के बीच संभावित संबंधों का दावा किया. उन्होंने अपनी पुरानी चेतावनी ‘NEXT: INDIA’ का जिक्र करते हुए कहा कि जिन घटनाओं को लेकर उन्होंने पहले आगाह किया था, वे अब सामने आ रही हैं. नोमानी का दावा है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय वैचारिक नेटवर्क छात्र आंदोलनों के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं. हालांकि, फ्रांस और भारत में हुए प्रदर्शनों के बीच सीधे संगठनात्मक या वित्तीय संबंध होने की पुष्टि इन दावों से अपने आप नहीं होती.
नेविल रॉय सिंघम और विजय प्रसाद का भी जिक्र
नोमानी ने अपनी पोस्ट में चीन के शंघाई में रहने वाले अमेरिकी मूल के कारोबारी नेविल रॉय सिंघम का नाम भी लिया. उन्होंने आरोप लगाया कि सिंघम से जुड़े धन का इस्तेमाल भारत में कथित प्रचार और प्रभाव बढ़ाने वाले अभियानों के लिए किया गया. नोमानी ने विजय प्रसाद को सिंघम का करीबी बौद्धिक सहयोगी और आयोजक भी बताया. ये आरोप हैं और इनके आधार पर किसी व्यक्ति या संगठन की भूमिका को प्रमाणित मानने से पहले संबंधित वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों की जांच जरूरी है.
‘इंडियन अलायंस पेरिस’ और न्यूयॉर्क के कार्यक्रम का संदर्भ
रिपोर्ट में ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ नाम के संगठन का भी उल्लेख किया गया है, जिसे फ्रांस में छात्रों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों से जुड़ा संगठन बताया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, इस संगठन ने जनवरी 2023 में न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में नाटो के विस्तार के विरोध में आयोजित एक कार्यक्रम को सह-प्रायोजित किया था. यह कार्यक्रम ‘द पीपल्स फोरम’ में हुआ था. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस केंद्र को 2017 में नेविल रॉय सिंघम से 22.44 मिलियन डॉलर की फंडिंग मिली थी. इस कार्यक्रम और कथित वित्तीय संबंधों का हवाला देते हुए रिपोर्ट ने विभिन्न देशों में सक्रिय संगठनों के संपर्कों पर सवाल उठाए हैं.
दिल्ली के प्रदर्शनों में AISA, SFI और CJP का उल्लेख
नोमानी ने भारत में हो रहे प्रदर्शनों के संदर्भ में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का भी जिक्र किया. उन्होंने भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लोगों से ऐसे व्यक्तियों और संगठनों के बारे में जानकारी साझा करने की अपील की, जिनके संबंध कथित तौर पर सिंघम के नेटवर्क से हो सकते हैं. उन्होंने विजय प्रसाद की भूमिका की जांच किए जाने की बात भी कही. फिलहाल, किसी संगठन का प्रदर्शन में शामिल होना या किसी वैचारिक समूह से जुड़ाव अपने आप विदेशी फंडिंग अथवा किसी अंतरराष्ट्रीय अभियान में भागीदारी का प्रमाण नहीं है.
हरीश साल्वे ने भी उठाया था विदेशी फंडिंग का मुद्दा
विदेशी फंडिंग को लेकर भारत में भी सवाल उठाए गए हैं. वरिष्ठ वकील और भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने सोमवार को दावा किया था कि देश में चल रहे कुछ आंदोलनों को विदेशों से समर्थन और फंडिंग मिल रही है. उन्होंने आशंका जताई कि भारत में बांग्लादेश और नेपाल जैसे हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है. लंदन में बोलते हुए साल्वे ने आंदोलनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी प्रभाव होने का आरोप लगाया था. साल्वे ने भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर बातचीत अटकी हुई है. उन्होंने इसे भारत के प्रति अमेरिकी असंतोष के संदर्भ में देखा. हालांकि, विदेशी फंडिंग और बाहरी ताकतों की भूमिका से जुड़े इन बयानों को आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए. इनकी पुष्टि के लिए वित्तीय दस्तावेजों, आधिकारिक जांच और स्वतंत्र साक्ष्यों की आवश्यकता होगी.
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