बंगाल में ‘पहचान बनाम राष्ट्रवाद’: मोदी के वो फैक्टर्स जिन्होंने 'बाहरी vs बंगाली' को दी चुनौती – AajTak

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पश्चिम बंगाल का चुनाव महज़ आंकड़ों की लड़ाई नहीं, बल्कि पहचान, इमोशन और राजनीतिक नैरेटिव की गहरी टक्कर होता है. इस बार का मुकाबला भी कुछ ऐसा ही रहा, जहां प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय अपील के जरिए अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ‘बाहरी बनाम बंगाली’ नैरेटिव को चुनौती दी.
बीजेपी का प्रचार तंत्र
चुनावी अधिसूचना जारी होते ही बीजेपी का प्रचार तंत्र पूरी तरह सक्रिय हो गया. 5 अप्रैल से 27 अप्रैल के बीच पार्टी के 61 राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय नेताओं ने सभी 288 विधानसभा क्षेत्रों में पहुंच बनाते हुए 600 से अधिक जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित किए. इस दौरान लगभग 20 लाख मतदाताओं से सीधे संपर्क साधने का दावा किया गया. पूरे अभियान के केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी रहे, जिन्होंने 22 से अधिक बार बंगाल का दौरा किया और आचार संहिता लागू होने के बाद अकेले 21 प्रमुख कार्यक्रमों को संबोधित किया.
प्रधानमंत्री के जनसंपर्क अभियान ने 43 संगठनात्मक जिलों में से 41 जिलों को कवर किया, जिससे लगभग संपूर्ण भौगोलिक पहुंच सुनिश्चित हुई. आधिकारिक घोषणा से पहले ही अभियान की शुरुआत 14 मार्च, 2026 को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में आयोजित विशाल रैली से हो गई थी, जिसमें 5.5 लाख से अधिक लोग शामिल हुए. चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने 19 मेगा रैलियों को संबोधित किया और हावड़ा व कोलकाता में दो बड़े रोड शो किए लेकिन जो बात सबसे अलग थी, वह केवल इसका विशाल पैमाना नहीं, बल्कि इसका प्रतीकात्मक महत्व भी था.
पीएम मोदी के प्रतीकात्मक क्षण
झारग्राम में सड़क किनारे एक स्टॉल से झालमुरी खाने के लिए छोटा सा पड़ाव, और कोलकाता में हुगली नदी पर एक शांत नौका विहार… ये कोई सामान्य घटनाएं नहीं थीं, बल्कि सोच-समझकर तैयार की गई छवियां थीं। ये बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ने का एक प्रयास था.
तमाशे के पीछे की रणनीति
जहां मोदी मंच पर छाए रहे, वहीं पर्दे के पीछे एक खामोश, डेटा-आधारित अभियान चल रहा था. भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल से एक अंतर-क्षेत्रीय टीम को तैनात किया, ताकि एक अति-स्थानीय लेकिन व्यापक रूप से लागू होने योग्य कथा तैयार की जा सके. उन्होंने उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जो सीधे तौर पर लोगों को प्रभावित करते थे- महिलाओं की सुरक्षा, बढ़ती बेरोजगारी और औद्योगिक गिरावट.
सभी जिलों में बार-बार एक ही बात दोहराई गई-हजारों कंपनियों ने बंगाल छोड़ दिया है. चाहे इस दावे पर विवाद हुआ हो या नहीं, इसने मतदाताओं की सोच को प्रभावित किया और चुनाव प्रचार का एक अहम हिस्सा बन गया. साथ ही, भाजपा ने कल्याणकारी राजनीति से सीधे टकराव से परहेज किया. इसके बजाय, उसने टीएमसी की लक्ष्मी भंडार योजना का मुकाबला अपनी अन्नपूर्णा भंडार योजना से किया, जिसके तहत प्रति माह ₹3,000 दिए जाने का वादा किया गया. यह टीएमसी के कल्याणकारी लाभ को संतुलित करने की एक रणनीतिक चाल थी.
पहचान बनाम राष्ट्रवाद
यह चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम टीएमसी का नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व बनाम क्षेत्रीय पहचान की लड़ाई थी. टीएमसी की मुख्य रणनीति भाजपा को एक “बाहरी पार्टी” के रूप में प्रस्तुत करना थी, जो बंगाली गौरव और सांस्कृतिक विशिष्टता का आह्वान करती थी. दूसरी ओर, भाजपा ने मोदी को एक राष्ट्रीय एकता के नेता के रूप में पेश किया. एक ऐसा नेता जो क्षेत्रों से परे जाकर विकास, शासन और व्यापक दृष्टिकोण का वादा करता है.
जंगलमहल जैसे क्षेत्रों में भाजपा की स्थानीय रणनीति ने मोदी की लोकप्रियता को और मजबूत किया. कुर्माली भाषा को मान्यता देने के वादे ने कुर्मी मतदाताओं को फिर से अपने पक्ष में लाने में मदद की, जिसके परिणामस्वरूप पुरुलिया, बांकुरा और झाड़ग्राम में मजबूत बढ़त देखने को मिली. आदिवासी, मतुआ और राजबंशी जैसे हाशिए पर पड़े और पहचान-आधारित समूहों के बीच भाजपा की सूक्ष्म-प्रभाव रणनीति ने परिचित और विश्वसनीय आवाजों के माध्यम से मोदी के संदेश को और प्रभावी बनाया.
डिजिटल और जमीनी स्तर का मेल
भाजपा की दोहरी संचार रणनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू था-मोदी के नेतृत्व में व्यापक रैलियां और सूक्ष्म प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा संचालित अति-स्थानीय डिजिटल प्रचार. जहां टीएमसी ने शीर्ष स्तर के प्रभावशाली चेहरों पर विशेष जोर दिया, वहीं भाजपा ने जमीनी स्तर पर विश्वसनीयता बनाने पर ध्यान दिया. यह सुनिश्चित किया गया कि मोदी के भाषण केवल बड़े मंचों तक सीमित न रहें, बल्कि स्थानीय बोलियों, सामुदायिक चिंताओं और रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बनें. मोदी के अभियान ने भाजपा की पहुंच बढ़ाने में सफलता हासिल की, खासकर उन क्षेत्रों में जहां स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों से मेल खाते थे.
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