फेसबुक Twitter छापा ईमेल
युद्ध की रोकथाम से लेकर ओज़ोन परत के संरक्षण तक, संयुक्त राष्ट्र ने अनेक वैश्विक चुनौतियों से निपटने में अहम भूमिका निभाई है. मगर, बढ़ते हिंसक टकरावों और गहराते मतभेदों के बीच, क्या 81 वर्ष पुराना यह संगठन आज भी उतना ही प्रभावी है? इस वर्ष, संयुक्त राष्ट्र दिवस के अवसर पर भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित एक सम्वाद में राजनयिकों, नीति-निर्माताओं और यूएन अधिकारियों ने संगठन की प्रासंगिकता और उसके भविष्य पर मन्थन किया.
नई दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में हुई इस चर्चा में भारतीय सांसद शशि थरूर ने भी हिस्सा लिया, जो संयुक्त राष्ट्र में अवर महासचिव के तौर पर अपनी सेवाएँ प्रदान कर चुके हैं.
उन्होंने 2000 के शुरुआती वर्षों में, इराक़ पर अमेरिकी सैन्य हमले के ख़तरे से जुड़े एक वाक़या को साझा किया. उन्होंने बताया कि संकट टालने के लिए वह तत्कालीन यूएन महासचिव कोफ़ी अन्नान के साथ एक कूटनैतिक मिशन पर बग़दाद गए थे. कोफ़ी अन्नान के प्रयासों से कुछ समय के लिए ही सही, सैन्य टकराव टालने में मदद मिली.
शशि थरूर ने वर्ष 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट का भी ज़िक्र किया, जब दुनिया परमाणु युद्ध के कगार पर थी. उस दौरान तत्कालीन यूएन महासचिव ऊ थान्त ने तनाव कम करने के लिए कूटनैतिक प्रयास किए थे.
उनके अनुसार, ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि संयुक्त राष्ट्र शक्तिशाली देशों के बीच टकराव रोकने और शान्ति बनाए रखने में कितनी अहम भूमिका निभा सकता है.
उन्होंने संगठन की कार्यप्रणाली समझाते हुए कहा, ‘‘संयुक्त राष्ट्र एक मंच भी है और एक किरदार भी. एक मंच के रूप में सदस्य देश यहाँ मिलकर फ़ैसले लेते हैं, जबकि एक किरदार के रूप में यूएन महासचिव, उसकी एजेंसियाँ और कर्मचारी उन निर्णयों को अमल में लाते हैं.’’
यानि, संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि सदस्य देश आपसी सहमति बनाने और फ़ैसलों को लागू करने में कितना सहयोग करते हैं.
मगर बढ़ते वैश्विक मतभेदों के बीच यही सहमति बनाना कठिन होता जा रहा है.
शशि थरूर ने कहा, ‘’81 वर्ष पुरानी इस संस्था की कार्यप्रणाली इतनी जटिल है कि इसमें बदलाव लाना टेढ़ी खीर है. लेकिन इसे खोने का जोखिम भी नहीं उठाया जा सकता.’’
उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना आज की दुनिया का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती. मसलन, पूरे अफ़्रीकी महाद्वीप को अब भी परिषद में स्थाई सदस्यता हासिल नहीं है. लेकिन व्यवस्था बदलने के लिए उन्हीं शक्तिशाली देशों की सहमति चाहिए, जिनके विशेषाधिकार इससे प्रभावित होंगे.
सासंद शशि थरूर ने इस चुनौती को समझाने के लिए प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्थापित ‘लीग ऑफ़ नेशन्स’ का उदाहरण दिया.
संयुक्त राज्य अमेरिका कभी इसका सदस्य नहीं बना, जबकि कई बड़ी शक्तियों के अलग होने से संगठन कमज़ोर पड़ता गया. दूसरा विश्व युद्ध रोकने में नाकाम रहने के बाद, वर्ष 1946 में इसे भंग कर दिया गया.
संयुक्त राष्ट्र के संस्थापकों ने इस विफलता से सबक़ लेते हुए सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई सदस्य देशों को वीटो अधिकार की शक्ति दी, ताकि बड़ी शक्तियाँ संगठन से जुड़ी रहें.
शशि थरूर ने आगाह किया कि व्यापक सुधारों के प्रयास में इन देशों के भी अलग होने का ख़तरा है. इसलिए चुनौती संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी बनाने की है, उसके अस्तित्व को जोखिम में डाले बिना.
चर्चा में संयुक्त राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे, भारत में यूएन के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर स्टेफ़ान प्रीज़नर ने यूएन की आठ दशकों की उपलब्धियों पर रौशनी डाली. इनमें चेचक का उन्मूलन, औपनिवेशिक शासन का अन्त, मानवाधिकार संरक्षण और पर्यावरण के क्षेत्र में प्रगति शामिल हैं.
उन्होंने वर्ष 1987 के ‘मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल’ को वैश्विक सहयोग की एक बड़ी सफलता बताया. इस समझौते के तहत ओज़ोन परत को नुक़सान पहुँचाने वाले लगभग 99 प्रतिशत पदार्थों का इस्तेमाल समाप्त किया जा चुका है, जिससे ओज़ोन परत धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट रही है.
उन्होंने कहा कि कोई भी देश अकेले यह उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता था. ‘‘वर्ष 2026 में संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पहले जितनी ही है, बल्कि सम्भवतः उससे भी अधिक है.’’
श्रीलंका की उच्चायुक्त महिषिनी कोलोने ने कहा, ‘‘बहुपक्षवाद हमारे लिए महज़ एक विकल्प नहीं, बल्कि रणनैतिक आवश्यकता है.’’
उन्होंने वर्ष 2022 के श्रीलंकाई आर्थिक संकट का उदाहरण दिया, जब भारत ने लगभग चार अरब डॉलर की आपात सहायता प्रदान की. इससे तत्काल ज़रूरतें पूरी करने और व्यापक अन्तरराष्ट्रीय सहयोग जुटाने में मदद मिली. बाद में बहुपक्षीय संस्थाओं और अन्य साझीदारों ने आर्थिक पुनर्बहाली तथा क़र्ज़ पुनर्गठन में भी सहयोग दिया.
नॉर्वे की राजदूत मे-एलिन स्टेनर ने कहा कि छोटे देशों के लिए अन्तरराष्ट्रीय क़ानून, स्पष्ट व्यापार नियम और विवादों का शान्तिपूर्ण समाधान बेहद ज़रूरी हैं. ‘‘हम ऐसी दुनिया नहीं चाहते, जहाँ ताक़तवर का ही बोलबाला हो.’’
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता स्वीकार करते हुए कहा, ‘‘नॉर्वे अधिक बहुपक्षवाद चाहता है, और बेहतर बहुपक्षवाद भी.’’
इस चर्चा के दौरान, जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी उभरती चुनौतियों पर भी ध्यान दिया गया, जिनसे निपटने के लिए अन्तरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है.
नॉर्वे की राजदूत ने एआई की अन्तरराष्ट्रीय निगरानी के लिए अपने देश और फ़िनलैंड की साझा पहल का ज़िक्र करते हुए कहा, ‘‘एआई का मानव के निर्देशन और नियन्त्रण में रहना ज़रूरी है.’’
यूएन के वरिष्ठ अधिकारी स्टेफ़ान प्रीज़नर ने आगाह किया कि जलवायु परिवर्तन, परमाणु हथियारों और नई प्रौद्योगिकियों से जुड़े जोखिम इतने व्यापक हैं कि कोई एक देश अकेले उनसे नहीं निपट सकता.
कार्यक्रम में तीन युवा परिवर्तनकर्ताओं (changemakers) ने भी संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से चलाई जा रही अपनी सामुदायिक पहलें प्रस्तुत कीं. इससे स्पष्ट हुआ कि अन्तरराष्ट्रीय सहयोग का लाभ आम लोगों तक पहुँचाने में भी यूएन की महत्वपूर्ण भूमिका है.
संयुक्त राष्ट्र के 82वें वर्ष में प्रवेश के साथ सवाल है कि राष्ट्र संघ की विफलता दोहराए बिना, इसे और प्रभावी कैसे बनाया जाए?
इसी सन्दर्भ में शशि थरूर ने एक पूर्व सोवियत राजनयिक का दिलचस्प क़िस्सा सुनाया. क़िस्से में आदम ने हव्वा का ध्यान कहीं और देखकर पूछा था, ‘‘क्या तुम्हारे जीवन में कोई और भी है?’’
इसके ज़रिए उन्होंने सवाल उठाया कि क्या दुनिया के पास संयुक्त राष्ट्र का कोई विकल्प है, जो सभी देशों को मानवता के साझा हितों के लिए एक मंच पर ला सके? ‘‘इसलिए हमारे पास जो संयुक्त राष्ट्र है, हमें उसी का सर्वोत्तम उपयोग करना चाहिए. यह सम्पूर्ण नहीं है, इसमें ख़ामियाँ हैं, इसकी कई सीमाएँ हैं.’’
उन्होंने कहा कि देशों को संयुक्त राष्ट्र के प्रति अपना रवैया सुधारने के लिए राज़ी करना होगा, क्योंकि तमाम कमियों के बावजूद दुनिया इसे खोने का जोखिम नहीं उठा सकती.
फेसबुक Twitter छापा ईमेल