भारतीयों की चिंता – Hindustan Hindi News

पश्चिम एशिया में फिर तनाव फैलने और युद्ध भड़कने से भारत पर सीधी आंच आई है। बीते तीन दिन में ऐसे तीन मालवाहक जहाजों पर हमले हुए हैं, जिन पर भारतीय नाविक सवार थे। एक हमले में तो तीन भारतीयों की जान भी गई है और इस पर भारत ने उचित ही नाराजगी का इजहार किया है। पहले ईरान होर्मुज में हमले कर रहा था, लेकिन अब अमेरिका ने दुर्भाग्यजनक रूप से जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया है। एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक को तलब करके भारत सरकार ने अपनी आपत्ति जताई है। भारत इस युद्ध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल नहीं है। फिर भी मालवाहक जहाजों को निशाना बनाना अमेरिकी मनमानी का प्रमाण है। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि होर्मुज समुद्री मार्ग पर यातायात में एक बड़ी बाधा अमेरिका भी है। वह बल के जोर पर होर्मुज में ईरान को किनारे करना चाहता है, लेकिन मालवाहक व्यावसायिक वाहनों को निशाना बनाने का क्या तुक है? जो देश या जो जहाज युद्ध में शामिल नहीं हैं, उन पर या उनके नागरिकों पर चोट करने की अमेरिकी रणनीति किसी वैश्विक अपराध से कम नहीं है।
अमेरिकी कमान ने भी माना है कि उसने होर्मुज में आठ ऐसे जहाजों को निष्क्रिय किया है, जो उसके निर्देशों का अनुपालन नहीं कर रहे थे। इसके अलावा अमेरिका ने करीब 134 जहाजों को मार्ग बदलने के लिए मजबूर किया है। पश्चिम एशिया में हालात खतरनाक है। वार्ता रुक गई है और दोनों पक्ष एक दूसरे के ठिकानों को तबाह करने में जुटे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को हुए युद्ध विराम के बाद से पहली बार युद्ध इस कदर भड़का है। बीते बुधवार को वाशिंगटन ने अमेरिकी सेना के एक हेलीकॉप्टर को गिराए जाने के जवाब में ईरान पर हमले किए हैं। ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए मिसाइलें दागीं, जिससे खाड़ी क्षेत्र में सायरन बजने लगे। मिसाइलों और ड्रोन हमलों का सिलसिला जारी है। पश्चिम एशिया में परिवहन पर बहुत असर पड़ा है। वैसे, इस बार ईरान का व्यवहार ज्यादा संतुलित है। उसने फारस की खाड़ी में खड़े उन जहाजों को सब्र करने का निर्देश दिया है, जिन्हें पहले ही पारगमन परमिट मिल चुके हैं। हालांकि, अगले आदेश तक ईरान भी किसी जहाज को यहां से गुजरने नहीं देगा। इसके दो मतलब हैं, एक तो दुनिया में तेल संकट बढ़ने वाला है और दूसरा, अमेरिका को ही कोई उपाय निकालना पड़ेगा। वह खाड़ी के संघर्ष में अपने तमाम दांव आजमा चुका है। देशों के भयादोहन से लेकर सीधे मिसाइल दागने तक लगातार बदलते अमेरिकी रवैये को किसी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। ईरान मामले को संभालने और समाधान निकालने में अमेरिका अब तक नाकाम है। इसकी कीमत उसे ही चुकानी पड़ रही है। गौर करने की बात है, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने कुवैत और बहरीन में स्थित 18 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमले किए हैं।
यह पश्चिम एशिया में टकराव का नया मोड़ है। युद्ध रोकने के लिए वार्ता चल रही थी, पर जल्दी वार्ता के लिए युद्ध छेड़ देना अतार्किक है। आज के समय में क्या सीधे सैन्य हमला करके किसी सक्षम देश को वार्ता के लिए तैयार किया जा सकता है? क्या ऐसे सामरिक हस्तक्षेप से ईरान को भयभीत किया जा सकता है? अमेरिका केवल अपनी शर्तों पर समझौता या युद्ध विराम चाहता है। यहां अमेरिका को अपना रवैया कुछ नरम रखना होगा, अगर वह अपने अहंकार को आड़े लाएगा, तो दुनिया में युद्ध से पैदा मुसीबतें बढ़ती चली जाएंगी।
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