भारत पर मंडराया सूखे और लू का खतरा, अल नीनो से कमजोर पड़ सकता है मानसून, चावल और गेहूं की फसल पर असर – Bharat24live

Shreeom Singh
Date: 01-11-26 14:32
प्रशांत महासागर में अल नीनो तेजी से मजबूत हो रहा है. इसका असर भारत के मौसम, खेती और ग्रामीण इलाकों में पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है. विश्व मौसम संगठन (WMO) के ताजा आकलन के मुताबिक, फरवरी 2027 तक अल नीनो बने रहने की संभावना करीब 100% है. इससे तापमान बढ़ने, बारिश का पैटर्न बदलने और पानी की कमी का खतरा बढ़ सकता है.
भारत के लिए चिंता की बात यह है कि देश में सूखे और लू का खतरा पहले ही बढ़ रहा है. फरवरी 2026 में नेचुरल हैजर्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, 1951 से 2016 के बीच सूखे और लू की एक साथ पड़ने वाली घटनाओं से प्रभावित क्षेत्र 10% से बढ़कर 35% हो गया. यानी करीब 65 साल में ऐसे मौसम की चपेट में आने वाला इलाका साढ़े तीन गुना बढ़ गया.
रिसर्च में यह भी सामने आया कि अब इन घटनाओं का खतरा केवल उत्तर-पश्चिम भारत तक सीमित नहीं है. ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में भी इसका असर बढ़ रहा है.
सूखे और गर्मी से फसलों को कितना नुकसान?
सूखे और लू का एक साथ पड़ना खेती और ग्रामीण लोगों की कमाई पर असर डाल सकता है. रिसर्च के मुताबिक, ऐसी गंभीर मौसमी घटनाओं वाले वर्षों में भारत में चावल की पैदावार 12.1% तक घट गई. वहीं, गेहूं में दाना बनने के समय तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ने से पैदावार 3 से 4% तक कम हो सकती है.
ऐसे में अगर अल नीनो के कारण बारिश कम होती है और गर्मी बढ़ती है, तो किसानों की फसल के साथ खेतों में काम करने वाले मजदूरों की कमाई, पशुपालन और गांवों में पानी की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है.
अल नीनो क्यों बढ़ा सकता है सूखे और गर्मी का खतरा?
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा होने की मौसमी स्थिति है. इसका असर दुनिया के मौसम और बारिश के पैटर्न पर पड़ता है. भारत में अल नीनो के दौरान मानसूनी बारिश कमजोर रहने की आशंका बढ़ जाती है. हालांकि, हर बार अल नीनो आने पर भारत में सूखा पड़े, यह जरूरी नहीं है. इसका असर समुद्र के तापमान, मानसून और दूसरे मौसमी हालात पर निर्भर करता है.
इस बार चिंता इसलिए है, क्योंकि अल नीनो के मजबूत होने से तापमान बढ़ने का खतरा भी है. जब मिट्टी में नमी कम होती है, तो जमीन और आसपास की हवा ज्यादा गर्म होने लगती है. दूसरी तरफ, तापमान बढ़ने से जमीन को और ज्यादा नमी की जरूरत पड़ती है, जिससे मिट्टी तेजी से सूख सकती है. इस तरह गर्मी और सूखा एक-दूसरे का असर बढ़ाते हैं.
रिसर्च के मुताबिक, अब ऐसी घटनाएं उन इलाकों में भी बढ़ रही हैं, जहां पहले अच्छी बारिश होती थी. ऐसे में राजस्थान और गुजरात के साथ पूर्वी और दक्षिणी भारत के कृषि क्षेत्रों को भी इस खतरे से निपटने की तैयारी करनी होगी.
गांवों में नल कनेक्शन बढ़े, लेकिन पानी की उपलब्धता का सवाल
ग्रामीण भारत में पानी की समस्या पहले से ही एक बड़ी चुनौती है. केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन के तहत गांवों के घरों तक नल से पानी पहुंचाने का काम किया गया है. अगस्त 2019 में मिशन शुरू होने के समय करीब 17% ग्रामीण परिवारों के पास नल कनेक्शन था. जल शक्ति मंत्रालय के मुताबिक, दिसंबर 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 81% से ज्यादा हो गया.
हालांकि, घर में नल लगना और नियमित रूप से पर्याप्त साफ पानी मिलना अलग-अलग बातें हैं. सरकार के 2024 के आकलन में 2.37 लाख से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को शामिल किया गया था. इसमें सामने आया कि 86.5% घरों में नल कनेक्शन काम कर रहे थे. वहीं, 80.2% परिवारों को जरूरत के मुताबिक पानी मिल रहा था.
इसके अलावा 83.6% घरों में तय समय पर पानी की सप्लाई हो रही थी, जबकि 76% परिवारों को तय गुणवत्ता के अनुसार पानी मिल रहा था.
अल नीनो से निपटने के लिए गांवों में क्या तैयारी जरूरी?
अल नीनो के संभावित असर को देखते हुए खेती और पानी बचाने की तैयारी पहले से करनी होगी. सबसे पहले गांवों में पानी के स्रोतों और भूजल स्तर की स्थिति का पता लगाना जरूरी है. इसके आधार पर हर पंचायत में पानी की उपलब्धता और सालभर की जरूरत को ध्यान में रखकर योजना बनाई जा सकती है.
पुराने तालाबों, जोहड़ों और दूसरे पारंपरिक जल स्रोतों को फिर से उपयोगी बनाना भी जरूरी है. मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत जल संरक्षण के कामों का आकलन सिर्फ खर्च या बने ढांचों के आधार पर नहीं, बल्कि इससे वास्तव में कितना पानी बचा, इस आधार पर होना चाहिए.
कुल मिलाकर, मजबूत होता अल नीनो भारत के लिए केवल कमजोर मानसून की चिंता नहीं है. इसका असर खेती, भूजल, ग्रामीण रोजगार, पशुपालन और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है. सूखे और लू का बढ़ता दायरा बताता है कि ग्रामीण इलाकों को बारिश की कमी के साथ लंबे समय तक रहने वाली गर्मी और पानी के संकट से निपटने के लिए भी तैयार रहना होगा.
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