नई दिल्ली. भारत में शिक्षा अब सिर्फ क्लासरूम और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं रही. मोबाइल फोन, इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने पढ़ाई को एकदम नए लेवल पर पहुंचा दिया है. इसी को कहा जा रहा है एड-टेक क्रांति, जिसने गांव से लेकर शहर तक बच्चों के सीखने का तरीका बदल दिया है.
कोविड के बाद जिस तेजी से ऑनलाइन पढ़ाई बढ़ी, उसी ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा एड-टेक बाजार बना दिया. आज देश में 4,400 से ज्यादा स्टार्टअप्स इस सेक्टर में काम कर रहे हैं. नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 और डिजिटल इंडिया प्रोग्राम ने भी इस ट्रेंड को और मजबूत किया है. आने वाले सालों में यही क्रांति भारत की शिक्षा को और ज्यादा स्किल बेस्ड और ग्लोबल बनाने जा रही है.
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साल 2020 में जब स्कूल बंद हुए तो बच्चों की पढ़ाई का पूरा बोझ मोबाइल और लैपटॉप पर आ गया. इसी समय बायजूस, अनअकैडमी और वेदांतु जैसे प्लेटफॉर्म्स ने लाखों बच्चों तक पहुंच बनाई. तभी से एड-टेक सेक्टर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
2024 तक भारत का एड-टेक मार्केट 4 बिलियन डॉलर का हो चुका है और उम्मीद है कि 2030 तक यह 10 बिलियन डॉलर से ज्यादा का हो जाएगा. इसमें 29 फीसदी की वार्षिक ग्रोथ रेट दर्ज की जा रही है.
नई शिक्षा नीति ने साफ कर दिया कि भविष्य डिजिटल ही है. दीक्षा, स्वयम और ई-पाठशाला जैसे प्लेटफॉर्म्स से अब करोड़ों बच्चे और टीचर मुफ्त कंटेंट पा रहे हैं.
इधर स्टार्टअप्स ने भी कमाल किया है. बायजूस और अनअकैडमी जैसे बड़े नाम तो करोड़ों बच्चों को पढ़ा रहे हैं, वहीं छोटे शहरों से निकले स्टार्टअप्स भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. सरकार ने इस सेक्टर को और मजबूत करने के लिए 5 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा है, जिसमें 5जी लैब्स और नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी भी शामिल है.
सबसे बड़ी बात यह कि अब गांव-गांव तक पढ़ाई पहुंच रही है. जियो के सस्ते डेटा और सस्ते स्मार्टफोन ने इसे आसान बना दिया है. तमिलनाडु और बिहार जैसे राज्यों के उदाहरण बताते हैं कि बच्चे अब मोबाइल पर पढ़ाई से अच्छे मार्क्स ला रहे हैं.
दूसरा फायदा यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बच्चों को पर्सनलाइज्ड लर्निंग मिल रही है. मतलब कमजोर बच्चों को ज्यादा सपोर्ट और तेज बच्चों को एडवांस्ड कंटेंट. इसके अलावा कोडिंग, डिजिटल मार्केटिंग और एआई जैसे कोर्स भी बच्चों को नौकरी दिलाने में मदद कर रहे हैं.
जहां फायदे हैं, वहीं दिक्कतें भी हैं. अभी भी देश के कई गांवों में इंटरनेट नहीं पहुंचा. लाखों बच्चों के पास लैपटॉप नहीं है. दूसरी समस्या है क्वालिटी. बहुत सारे ऑनलाइन कोर्स ऐसे हैं जिन्हें किसी मान्यता की मुहर नहीं मिली.
स्क्रीन टाइम भी एक बड़ा खतरा बन गया है. छोटे बच्चों की आंखों पर असर पड़ रहा है और तनाव भी बढ़ रहा है. वहीं फंडिंग की कमी से कई स्टार्टअप्स को दिक्कतें झेलनी पड़ी हैं.
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भविष्य बहुत रोमांचक लग रहा है. एआई ट्यूटर्स और वर्चुअल रियलिटी क्लासरूम्स से पढ़ाई और दिलचस्प होगी. आने वाले सालों में 70 फीसदी स्कूल हाइब्रिड मॉडल पर जाएंगे, जहां ऑनलाइन और ऑफलाइन पढ़ाई साथ-साथ होगी.
सरकार ने भी 5जी और नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी के जरिए बड़े लक्ष्य तय किए हैं. वहीं निजी कंपनियां सस्ते और इनोवेटिव मॉडल्स के जरिए बच्चों को जोड़ रही हैं. खास बात यह है कि अब लड़कियों की शिक्षा पर भी फोकस बढ़ा है और गांवों की बच्चियां भी डिजिटल क्लास से सपने पूरे कर रही हैं.