भारत में 5000 साल पहले पनपी थी ये सभ्यता, शहर से लेकर समुद्री व्यापार के मिले पुख्ता प्रमाण; जानें कहां तक थी सीमा – Zee News

सिंधु घाटी सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन मानव सभ्यता में से एक है. जहां दुनिया के पहले शहर की बसावट के प्रमाण मिलते थे. अपने समय में इसकी सीमा इतनी दूर तक फैली हुई थी, कि इसके मुकाबले दुनिया की कोई दूसरी सभ्यता नहीं थी. आइए इसकी सीमाओं, व्यापार, शहर और पतन के बारे में आसान शब्दों में जानते हैं, जिसकी विरासत आज भी जीवित है.
दुनिया जब जंगलों को समझ रही थी, तब भारत की धरती पर एक मानव सभ्यता फल-फूल रही थी. जहां न केवल आधुनिक शहर बसाए गए, बल्कि पक्की सड़कों और जल निकासी के लिए नालियों की व्यवस्था की गईं थी. इतना ही नहीं, दुनिया के कई कोनों से समुद्री व्यापार होता था. हम बात कर रहे हैं सिंधु घाटी सभ्यता की. जिसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है. यह प्राचीन दुनिया की सबसे उन्नत सभ्यताओं में से एक थी. इसकी विशाल भौगोलिक सीमा और शहरी नियोजन आज भी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को आश्चर्यचकित करते हैं. करीब 3300 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व तक फलने-फूलने वाली यह सभ्यता आज के भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में फैली थी. इसके शहरों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, लोथल और राखीगढ़ी जैसे केंद्र थे, जो अपनी सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि के लिए प्रसिद्ध थे. आइए जानते हैं कि इसकी सीमा कहां से कहां तक फैली हुई थी.
सिंधु घाटी की सीमा कहां तक फैली थी?
सिंधु घाटी सभ्यता की सीमा उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान के शोर्तुघई से लेकर दक्षिण में महाराष्ट्र के दैमाबाद, पूर्व में उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर (मेरठ), और पश्चिम में पाकिस्तान के सुतकागन डोर तक फैली थी. पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (ASI) के मुताबिक, यह सभ्यता लगभग 12 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली थी, जो प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं से बड़ा क्षेत्र था.
यह सभ्यता मुख्य रूप से सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों, जैसे रावी, सतलज और घग्घर-हकरा, के किनारे विकसित हुई. इन नदियों ने उपजाऊ भूमि प्रदान की, जिसने कृषि और व्यापार को बढ़ावा दिया. इस विशाल सीमा ने सभ्यता को एक मजबूत आर्थिक और सांस्कृतिक आधार दिया.
सिंधु घाटी सभ्यता की उन्नत शहरी नियोजन
सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी खासियत इसका शहरी नियोजन था. यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज की रिपोर्ट्स के मुताबिक, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे शहरों में सड़कों का ग्रिड पैटर्न, एडवांस जल निकासी सिस्टम, और मानकीकृत ईंटों से बने घर थे. मोहनजोदड़ो का ‘ग्रेट बाथ’ और धोलावीरा की जल संग्रह प्रणाली उनकी इंजीनियरिंग दक्षता को दर्शाती हैं.
वहीं, पुरातात्विक खोजों में मिट्टी के बर्तन, मुहरें, और आभूषण मिले हैं, जो सिंधु घाटी सभ्यता की कला और शिल्पकला की उन्नति दिखाते हैं. पशुपति मुहर और नृत्य करती लड़की की मूर्ति उनकी सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक हैं. इतना ही नहीं, इस सभ्यता की अपनी एक लिपि हुआ करती थी. जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है. ऐसे में इस सभ्यता के कई रहस्य उजागर होने बाकी हैं.
सिंधु घाटी की अर्थव्यवस्था और व्यापार कैसे थे?
सिंधु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था कृषि, व्यापार और शिल्प पर आधारित थी. ASI के उत्खनन से पता चलता है कि वे गेहूं, जौ, चावल और कपास की खेती किया करते थे. कपास की खेती में वे सबसे आगे थे और इसे मेसोपोटामिया तक निर्यात करते थे. लोथल में मिला गोदीघर जिसे अंग्रेजी में Dockyard कहते हैं, समुद्री व्यापार का प्रमाण है.
यह व्यापार इस बात का प्रमाण है कि सिंधु घाटी सभ्यता में मेसोपोटामिया, मध्य एशिया और अरब के साथ बेहतर संबंध थे. उनकी मुहरों पर बैल, गेंडा जैसे जानवरों के चित्र भी मिले हैं. साथ सामानों के माप तौल के लिए कई उपकरण भी थे. इस सभ्यता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां के लोग पूर्ण रूप से स्वतंत्र थे. इनकी सामाजिक संरचना में राजशाही का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है, जिससे माना जाता है कि शासन सामुदायिक या समिति आधार पर था.
सिंधु घाटी का पतन कैसे हुआ?
सिंधु घाटी सभ्यता का पतन लगभग 1900 ईसा पूर्व से शुरू हुआ. जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस  की स्टडी के मुताबिक, इसके संभावित कारणों में जलवायु परिवर्तन, सिंधु नदी का मार्ग बदलना, बाढ़, और सूखा शामिल हैं. कुछ विद्वान आर्य आक्रमण को भी इसका कारण मानते हैं, लेकिन इसका आज तक कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है.
वहीं,  पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि लोग धीरे-धीरे मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगे, जिससे बड़े शहर वीरान हो गए. फिर भी, इस सभ्यता की कुछ परंपराएं, जैसे खेती-किसानी की तकनीक और शिल्पकला बाद की भारतीय संस्कृति में भी जीवित रहीं. यही वजह रही कि इस पतन ने सभ्यता की सीमा को सीमित कर दिया, लेकिन इसका प्रभाव लंबे समय तक रहा.
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