सऊदी, तुर्किए और पाकिस्तान का 'मक्का डिफेंस डील' महज कागजी पाखंड है। पाकिस्तान की लाचारी और भारत के सामरिक वर्चस्व के आगे यह समझौता पूरी तरह खोखला साब …और पढ़ें
‘मक्का जॉइंट डिफेंस समझौता’ की पूरी कहानी।
सऊदी, तुर्किए, पाकिस्तान ने ‘मक्का जॉइंट डिफेंस समझौता’ किया।
यह समझौता नाटो के ‘अनुच्छेद 5’ की तर्ज पर गढ़ा गया।
शुभम कुमार, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में पांच महीनों से जारी भीषण संघर्ष के बीच कूटनीति के पटल पर एक ऐसा घटनाक्रम उभरा है, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को हिलाने का दावा कर रहा है।
सऊदी अरब की धरती पर हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाथ मिलाकर एक नए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते को जन्म दिया है, जिसे ‘मक्का जॉइंट डिफेंस समझौता’ का नाम दिया गया है।
वैश्विक पटल यह समझौता चर्चा में इसलिए आया है, क्योंकि इस तथाकथित समझौते का मूल मंत्र नाटो के चर्चित ‘अनुच्छेद 5’ की तर्ज पर गढ़ा गया है। यानी ‘एक पर हमला, सभी पर अटैक’। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के दंभ भरे बयानों के अनुसार, इस समझौते का उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा को साकार करना है, जिसके तहत तीनों में से किसी भी एक संप्रभु राष्ट्र पर हुआ सशस्त्र हमला तीनों पर आक्रमण माना जाएगा।-1786113497662.webp)
यह समझौता पाकिस्तान के लिए नया कटोरा कैसे?
देखिए अब इस बात में तो कोई दोहराई नहीं है कि एक तरफ तेल से मालामाल सऊदी अरब की तिजोरी है, दूसरी तरफ नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना और मारक रक्षा उद्योग वाला तुर्किए है और बीच में खड़ा है वह पाकिस्तान जो अपनी बर्बादी के कगार पर पहुंच चुका है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या यह समझौता वाकई कोई रणनीतिक गेमचेंजर है, या फिर यह पाकिस्तान के भीख के कटोरे को छुपाने के लिए खेला गया कूटनीतिक पाखंड मात्र?
इस बात को ऐसे समझिए कि नाटो का अनुच्छेद 5 पश्चिमी देशों की अटूट सैन्य एकजुटता, समान लोकतांत्रिक मूल्यों और एकीकृत कमान का प्रतीक है। लेकिन इसके विपरीत, जब सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान जैसे बिल्कुल अलग-अलग भू-राजनीतिक हितों और अंतविरोधों से घिरे देश इस तरह के समझौतों की इबारत लिखते हैं, तो उसका हश्र कागज के टुकड़ों से ज्यादा कुछ नहीं होता।
इसका बड़ा कारण यह भी है कि ओटोमन साम्राज्य के इतिहास और मध्य पूर्व के नेतृत्व को लेकर तुर्किए और सऊदी अरब के रिश्ते कभी भी सहज नहीं रहे हैं। दोनों क्षेत्रीय अधिकार की जंग में कई मोर्चों पर एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं।-1786113526870.webp)
अच्छा, तुर्किए और सऊदी अरब को एक तरफ छोड़ दिया जाए, तो पाकिस्तना का इस समझौते में शामिल होना केवल के मजाक की तरह है। इसका बड़ा कारण है कि जिस देश की अर्थव्यवस्था आईएमएफ (IMF) की बैसाखियों और विदेशी कर्जों पर सांस ले रही हो, वह देश किसी दूसरे देश की रक्षा क्या खाक करेगा?
खैर, गौर करने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तान की गिनती आज वैश्विक स्तर पर एक ऐसे ‘प्रॉक्सी स्टेट’ के रूप में होती है जो खुद अपनी आंतरिक उथल-पुथल, बलूच विद्रोह और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंक से त्रस्त है।
हां, भारत के रणनीतिक गलियारों में इस तथाकथित ‘मक्का डिफेंस डील’ पर पैनी नजर है, लेकिन भारत के लिए यह कोई खौफ का नहीं, बल्कि उपहास का विषय है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत के सख्त और स्पष्ट रुख ने यह साबित कर दिया है कि देश की संप्रभुता और सुरक्षा के आगे इस तरह के गठबंधन कोई मायने नहीं रखते।
अब ये तो पूरी तरह से सच है ना कि पाकिस्तान अपनी सुरक्षा के लिए अब पश्चिमी देशों के बाद इस्लामिक देशों के मंचों पर धार्मिक कार्ड खेलकर भीख मांग रहा है। अपनी खुद की सेना की विफलता और आर्थिक दिवालियापन को छुपाने के लिए वह ऐसे समझौतों के सहारे अपनी अवाम को मूर्ख बना रहा है।-1786113553846.webp)
देखा जाए तो इस बात को भी काटा नहीं जा सकता है कि सऊदी अरब और खाड़ी देश खुद अमेरिकी सुरक्षा छतरी के कमजोर होने और इजरायल की सामरिकप्रभुत्व से डरे हुए हैं। इसके चलते रियाद अपनी सुरक्षा के नाम पर पाकिस्तान के सैनिकों को किराए पर लेने की पुरानी नीति पर चल रहा है।
ऐसे में यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि सऊदी अरब के इस कदम के पीछे भारत जैसे महाशक्ति के खिलाफ किसी जंग में पाकिस्तान की तबाही का ठेका लेने के लिए तैयार होना नहीं है।
देखिए गौर करने वाली बात यह भी है कि इस तथाकथित इस्लामिक डिफेंस पैक्ट के दावों की हवा तब निकल जाती है, जब हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखते हैं। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले भी रणनीतिक और रक्षा सहयोग के समझौते रहे हैं। लेकिन जब बात भारत के साथ मोर्चे की आई, तो इन कागजी समझौतों की असलियत दुनिया के सामने बेनकाब हो गई।
आप, याद कीजिए 7 मई से 10 मई 2025 के बीच का वह समय, जब भारत ने पहलगाम के आतंकी हमले का जवाब देते हुए पाकिस्तान की धरती पर सर्जिकल स्ट्राइक से भी बड़े सैन्य अभियान यानी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को अंजाम दिया था। भारतीय मिसाइलों और वायुसेना के सटीक प्रहारों ने पाकिस्तान के भीतर जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैबा के आतंकी ठिकानों और रडार इंस्टॉलेशन को मलबे के ढेर में बदल दिया था।
ऑपरेशन सिंदूर के समय युद्ध के मुहाने पर खड़े पाकिस्तान की सांसे अटक गई थीं। उसने अपनी रक्षा के लिए अपने इन तथाकथित ‘इस्लामी भाइयों’ और रियाद की तरफ गिड़गिड़ाकर मदद की गुहार लगाई थी। तब सऊदी अरब या अन्य इस्लामिक देशों का कौन सा रक्षा समझौता पाकिस्तान को बचाने आया था? कोई नहीं।
भारतीय वायुसेना के शौर्य और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की अडिग राजनीतिक इच्छाशक्ति के आगे पाकिस्तानी सेना और उसके आकाओं को घुटने टेकने पड़े थे। सिर्फ चार दिनों के भीतर पाकिस्तान का सैन्य अहंकार चकनाचूर हो गया था और उसे युद्धविराम के लिए भीख मांगनी पड़ी थी। यह इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान की सुरक्षा की गारंटी देने का दावा करने वाले ये समझौते केवल दिखावा हैं, जिनमें धरातल पर उतरने की कोई ताकत नहीं है।
देखिए स्पष्ट है कि यह ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ केवल कूटनीति के कागजों पर खींची गई एक ऐसी लकीर है, जिसका वास्तविक धरातल से कोई वास्ता नहीं है। पाकिस्तान चाहे जितने भी इस्लामिक देशों के साथ सुरक्षा के नए अनुबंध हस्ताक्षर कर ले, उसकी फितरत और उसकी खोखली अर्थव्यवस्था उसे कभी एक मजबूत सैन्य राष्ट्र नहीं बना सकती।
दूसरी ओर भारत के सामरिक वर्चस्व और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता ने यह बार-बार साबित किया है कि देश की सुरक्षा बयानों या कागजी समझौतों से नहीं, बल्कि लोहे जैसे इरादों और अत्याधुनिक सैन्य ताकत से तय होती है।
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