तालिबान के प्रतिबंध के बावजूद अफगानिस्तान में अफीम की खेती तेजी से बढ़ रही है, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार एक साल में रकबा चार गुना बढ़ा है।
(AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)
अफीम की खेती का रकबा एक साल में चार गुना बढ़ा।
किसानों की आर्थिक बदहाली और भुखमरी अफीम उगाने को मजबूर कर रही।
तालिबान के प्रतिबंधों के बावजूद अफीम उत्पादन में भारी वृद्धि दर्ज।
डिजिटल डेस्क, काबूल। तालिबान शासित अफगानिस्तान में अफीम की खेती और इसके कारोबार पर आधिकारिक रूप से पूरी तरह पाबंदी है। हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि तालिबान सरकार के कड़े नियम और सजा के प्रावधानों के बावजूद देश में अफीम का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक हालिया रिपोर्ट ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं, जिसके मुताबिक महज एक साल के भीतर वहां अफीम की खेती का रकबा चार गुना से ज्यादा बढ़ गया है।
ऐसे में अब सवाल यह है कि आखिर जान जोखिम में डालकर और सख्त कानूनों को ताक पर रखकर वहां के किसान दोबारा अफीम उगाने पर मजबूर क्यों हैं? आइए जानते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स एंड क्राइम ऑफिस (UNODC) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में जहां महज 10,200 हेक्टेयर जमीन पर अफीम की खेती हो रही थी, वहीं 2026 में यह बढ़कर सीधे 43,300 हेक्टेयर पहुंच गई। यानी इसमें लगभग 325% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इतना ही नहीं रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि अफीम का कुल उत्पादन भी लगभग पांच गुना बढ़ गया है। 2025 में यह 296 टन था, जो 2026 में बढ़कर करीब 1,500 टन हो गया है।
बात अब इसके पीछे की वजहों की करें तो… इसके पीछे मुख्य वजह है किसानों की भीषण आर्थिक लाचारी और भुखमरी। इस बात को ऐसे समझा सकता है कि अफगानिस्तान के कई हिस्सों में लंबे समय से सूखा और पानी की भारी किल्लत है। ऐसे में गेहूं या अन्य पारंपरिक फसलें उगाने पर किसानों को उतनी कमाई नहीं हो पाती कि वे परिवार का पेट पाल सकें।
इसके उलट, अफीम की खेती से उन्हें कई गुना ज्यादा मुनाफा मिलता है। पुराने आंकड़ों के मुताबिक, जहां एक हेक्टेयर गेहूं से बमुश्किल 770 डॉलर की कमाई होती थी, वहीं अफीम से लगभग 10000 डॉलर तक मिल जाते थे।
रॉयटर्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, किसानों का कहना है कि गेहूं और कपास की गिरती कीमतों और सूखे के कारण खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।
इसके अलावा डीडब्ल्यू (DW) की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि तालिबान द्वारा अफीम पर रोक लगाए जाने के बाद किसानों की आय इतनी गिर गई कि उनके बच्चों को दो वक्त की रोटी मिलनी भी मुश्किल हो गई, जिससे वे कुपोषण का शिकार होने लगे।
साफ शब्दों में कहे तो स्थिति यह है कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि अफगानिस्तान के कई प्रांतों में बच्चों में कुपोषण का स्तर बेहद गंभीर है और यह संकट आने वाले समय में और बढ़ सकता है।
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि कानून की सख्ती के बावजूद किसान खेतों में अफीम उगाने के लिए नए तरीके अपना रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार किसान अफीम के पौधों को सामान्य अनाज जैसे गेहूं के खेतों के बीच में या फिर ऊंची चारदीवारी वाले निजी परिसरों के अंदर छुपाकर उगा रहे हैं। वर्तमान में यह अवैध खेती अफगानिस्तान के 34 में से 16 प्रांतों में फैल चुकी है, जिसमें पूर्वोत्तर का बदख्शां प्रांत इसका सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।
दूसरी ओर, तालिबान सरकार संयुक्त राष्ट्र की इन रिपोर्टों और आंकड़ों से सहमत नहीं है। तालिबान के गृह मंत्रालय का दावा है कि उन्होंने खुद बड़े पैमाने पर अभियान चलाकर हजारों हेक्टेयर जमीन पर लहलहाती नशीली फसलों को नष्ट किया है, जबकि UNODC का अनुमान है कि इसके बावजूद खेती का रकबा लगातार बढ़ता जा रहा है।
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