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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) का गुरुवार देर रात निधन हो गया. उन्होंने 92 साल की उम्र में आखिरी सांस ली. डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के बाद अमृतसर के लोगों में शोक की लहर है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बचपन के दिनों और उनके विनम्र स्वभाव को याद करते हुए अमृतसर के लोगों ने उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताया. अमृतसार से डॉक्टर मनमोहन सिंह का गहरा रिश्ता रहा है. विभावज के बाद पूर्व पीएम अमृतसर में रहते थे.
इलाके के लोगों का कहना है कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री अपने परिवार के साथ जब पाकिस्तान से आए, तो यहीं रहते थे. उस वक्त वे बहुत छोटे थे लेकिन आज इलाके के लोगों को दुखी हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह इस दुनिया में नहीं रहे. पूर्व पीएम अमृतसर के मजीठ मंडी के पेठे वाले बाजार में अपने परिवार के साथ रहते थे. जिस घर मे वे रहते थे, उसे तबेला कहा जाता था. हालांकि, उस घर के आस-पास आज कोई भी नहीं रहता. मनमोहन सिंह की यादें उनके अमृतसर स्थित घर के साथ जुड़ी हैं. साल 1951 में मनमोहन सिंह ने अमृतसर के हिन्दू कॉलेज में बीए इकनॉमिक्स कोर्स करने के लिए एडमिशन लिया.
पंजाब प्रांत में हुआ था जन्म
मनमोहन सिंह का जन्म पंजाब प्रांत के गाह में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के चकवाल जिले का हिस्सा है. बंटवारे के बाद उनका परिवार अमृतसर आ गया. उन्होंने अमृतसर से स्कूली शिक्षा पूरी की और यहां हिंदू कॉलेज से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन की पढ़ाई की.
‘पूरी नहीं होगी कमी…’
एजेंसी के मुताबिक, स्थानीय निवासी राज कुमार (71) ने बताया, “मनोहन सिंह, स्वर्ण मंदिर के पास पेठा वाला बाजार में रहते थे. मैं तब बच्चा था, जब उनका परिवार यहां से चला गया.” उन्होंने आगे बताया कि जिस घर में मनमोहन सिंह का परिवार रहता था, वह अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है क्योंकि वहां कोई नहीं रहता है क्योंकि वे काफी वक्त पहले यहां से चले गए थे.
समाजसेवी पवनदीप का कहना है कि आज उन्होंने एक बहुमूल्य रत्न खो दिया. डॉ. मनमोहन सिंह की कमी कभी पूरी नहीं हो पाएगी.
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देश के लिए मनमोहन सिंह ने किए कई बड़े काम
दिवंगत डॉ मनमोहन सिंह ने 1991 में वित्त मंत्री रहते हुए ऐसी नीतियां बनाईं, जो देश की इकोनॉमी के लिए मील का पत्थर साबित हुईं. इन नीतियों ने लाइसेंस राज को खत्म कर दिया, अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया. उन्होंने वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के एक ऐसे युग की शुरुआत की, जिसने देश की दिशा को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.
जुलाई 1991 में वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने भारत के सबसे गंभीर आर्थिक संकट का सामना किया था. ये ऐसा वक्त था, जब विदेशी मुद्रा भंडार करीब खत्म हो गया था. देश में महंगाई दर कंट्रोल से बाहर हो गई थी और देश डिफॉल्ट की कगार पर पहुंच गया था. उस वक्त केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार थी और आर्थिक संकट के बीच भारतीय रुपया क्रैश हो चुका था. रुपया, डॉलर के मुकाबले 18 फीसदी लुढ़क गया था. ये ऐसा वक्त था, जब भारत के पास महज 6 अरब डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व बचा था. राजकोषीय घाटा करीब 8 फीसदी और चालू खाता घाटा 2.5 फीसदी पर पहुंच गया था. डॉ. मनमोहन सिंह ने देश को ऐसे वक्त निकाला.
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