मप्र की समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मसौदा लगभग तैयार है। इसमें लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य रखने के साथ इसे समाप्त करने की प्रक्रिया भी शादी और तलाक की तरह तय की गई है। रजिस्टर्ड लिव-इन पार्टनर यदि किसी अन्य व्यक्ति से शादी करना चाहता है, तो पहले उसे अपना लिव-इन रजिस्ट्रेशन निरस्त कराना होगा।
रजिस्ट्रेशन एक पक्ष (एक्स-पार्टी) के आवेदन पर भी निरस्त हो सकेगा। दूसरा पक्ष चाहे तो इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकता है। मुख्यमंत्री स्तर और विधि विभाग मसौदे को अंतिम रूप दे चुके हैं। गुरुवार को दिल्ली में यूसीसी समिति की अध्यक्ष रंजना प्रकाश देसाई के साथ अंतिम चर्चा के बाद सरकार मानसून सत्र में विधेयक पेश करने की प्रक्रिया शुरू करेगी।
विधि विभाग ने उत्तराधिकार से जुड़े प्रावधान 100 से घटाकर 30 कर दिए हैं। इन बदलावों के बाद मप्र की यूसीसी, गुजरात और उत्तराखंड की यूसीसी से अधिक संक्षिप्त होगी। आदिवासी तथा घुमंतू-अर्द्धघुमंतू समुदाय पहले से ही इसके दायरे से बाहर हैं।
सिर्फ बालिग ही करा सकेंगे रजिस्ट्रेशन
1. रजिस्ट्रेशन कौन करेगा और इसकी मॉनिटरिंग कैसे होगी? रजिस्ट्रेशन जिले के रजिस्ट्रार के पास होगा। यदि लिव-इन में रहने वाला पहला पार्टनर किसी अन्य पार्टनर के साथ रहकर रजिस्ट्रेशन कराता है, तो इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं रहेगी। ऐसे में यह प्रावधान कमजोर हो सकता है।
2. इस रजिस्ट्रेशन को किस कानून से संरक्षण मिलेगा? -किसी कानून के तहत नहीं। यदि कोई पक्ष (एक्स-पार्टी) रजिस्ट्रेशन का विरोध करता है, तो उसे कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा। यूसीसी में इसे किसी क्रिमिनल एक्ट से नहीं जोड़ा गया है। कोर्ट का जो निर्णय होगा, उसे मानना होगा।
3. लिव-इन पार्टनर आपस में शादी करतें हैं, तब क्या होगा? -रजिस्ट्रेशन स्वत: निरस्त होगा।
4. कोई रजिस्ट्रेशन न कराए तो उसके साथ क्या होगा? -लिव-इन में रहने वालों की जागरूकता पर निर्भर करेगा कि वे साथ रहने से पहले रजिस्ट्रेशन कराते हैं या नहीं। यह व्यवस्था काफी हद तक आपसी सहमति पर आधारित होगी।
5. शादीशुदा लिव-इन में रहता है, तो उसका क्या होगा? -ऐसे मामलों में पहले से लागू आपराधिक कानून (क्रिमिनल लॉ) के प्रावधान लागू होंगे। शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जा सकेगी।
6. कौन से रिकार्ड मांगे जाएंगे? -दोनों पक्षों को केवल बालिग होने से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।
कोर्ट में जाने का भी डर… सूत्रों के अनुसार, यदि मौजूदा मसौदा मानसून सत्र में पारित होकर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया, तो लिव-इन और उत्तराधिकार से जुड़े प्रावधानों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
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