महाकुंभ- संगम तट पर भगदड़, कइयों के मरने की सूचना: 50 एंबुलेंस मौके पर पहुंचीं; मौनी अमावस्या के कारण करोड़ों… – Dainik Bhaskar

प्रयागराज के संगम तट पर अमृत स्नान से पहले देर रात डेढ़ बजे भगदड़ मच गई, जिसमें कुछ लोगों के मरने की खबर है। ग्राउंड जीरो पर मौजूद दैनिक भास्कर के रिपोर्टर्स के मुताबिक, अफवाह के चलते लोग भागने लगे। इस बीच कुछ महिलाएं जमीन पर गिर गईं। लोग उन्हें कुचलते हुए निकल गए।
खबर मिलते ही 50 से ज्यादा एंबुलेंस संगम तट पर पहुंच गई हैं। NSG कमांडो ने मोर्चा संभाल लिया है। घायलों को अलग-अलग अस्पताल में भिजवाया जा रहा है।
महाकुंभ में आज मौनी अमावस्या का अमृत स्नान है, जिसके चलते हर तरफ श्रद्धालु ही दिखाई दे रहे हैं। प्रशासन के मुताबिक, संगम समेत 44 घाटों पर 8 से 10 करोड़ श्रद्धालुओं के डुबकी लगाने की संभावना है।
इससे ठीक, एक दिन पहले यानी मंगलवार को साढ़े 5 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। मेला क्षेत्र और शहर में साढ़े 5 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु पहुंच गए। सुरक्षा के लिए 60 हजार से ज्यादा जवान तैनात हैं।
5 तस्वीरें देखिए–
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बिहार के रणजीत प्रसाद ने बताया- मैं परिवार के साथ महाकुंभ आया था। मेरे पिता गणेश चौहान इस भगदड़ में लापता हो गए हैं।
एक महिला प्रत्यक्षदर्शी ने बताया- करीब 1 बजे की घटना है। लोग सिर के बल दबे रहे। दो घंटे भगदड़ के हालात थे। कई लोग बिजली के खंभे पर चढ़ गए।
दैनिक भास्कर रिपोर्टर सृष्टि ने बताया- करीब ढाई बजे मैं हॉस्पिटल पहुंची, तो वहां संगम घाट से घायलों को लाया जा रहा था। गंभीर रूप से बहुत से लोग चोटिल थे। किसी के खून गिर रहा था, कई बेहोश थे।
अफरा-तफरी का माहौल था। नर्स और डॉक्टर एक्टिव थे, जिन्हें फर्स्ट एड की जरूरत थी, उनका प्राथमिक इलाज किया गया। कुछ लोगों को इमरजेंसी में ले जाने की जरूरत पड़ी। बाहर पुलिस बल तैनात थी।
किसी को अंदर जाने की परमिशन नहीं थी। पब्लिक और मीडिया को अंदर नहीं जाने दिया गया। मैंने पुलिस से रिक्वेस्ट की कि मैं भी अपने परिजनों को ढूंढ रही हूं, फिर किसी तरह मैं अंदर गई। अंदर मैंने देखा कि घायल जैसे ही थोड़े नॉर्मल होते, उनका इलाज कर बेड खाली कराया जा रहा था।
डॉक्टरों का कहना था कि घबराहट में किसी का ब्लड प्रेशर बढ़ा या लो हुआ है तो उसकी मौत नहीं हो जाएगी। गंभीर मरीजों के लिए बेड खाली कराया जा रहा था। घायलों में महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे थे।
कर्नाटक की महिला ने बताया- उनका 9 लोगों का ग्रुप संगम आया था। भगदड़ में उनके ग्रुप के 1 पुरुष और 1 महिला की मौत हुई है। तीन की हालत गंभीर है। बाकी 4 सही सलामत हैं।
संगम पर भगदड़ के बाद NSG कमांडो ने मोर्चा संभाल लिया है। कमांडो ने जेटी के आस-पास को अपने कब्जे में ले लिया। साथ ही शहर की सड़कों पर जिन सुरक्षा जवानों की ड्यूटी लगाई गई थी, उन्हें अब संगम की ओर भेजा जा रहा है। संगम पर भीड़ को देखते हुए सुरक्षा जवानों को बढ़ाया जा रहा है।
मेला प्रशासन श्रद्धालुओं से अपील कर रहा है कि स्नान जल्दी करें। स्नान के बाद जल्दी घाट खाली कर दें, जिससे भीड़ इकट्‌ठा न होने पाए। दूसरे श्रद्धालुओं को स्नान करने का मौका मिले।
एक महिला ने बताया- कासपुरा से आए हैं। तीन बच्चे लापता हैं। ढूंढ रही हूं, कोई नहीं मिल रहा है। मोबाइल और आधार कार्ड भी खो गए। हमारे साथ का कोई मिल नहीं रहा है।
IAS आकांक्षा राणा ने अपील की है कि सभी शांति बनाए रखें। आंकड़े जैसे क्लियर होते हैं, प्रशासन की ओर से बताए जाएंगे।
प्रयागराज के SRN यानी स्वरुप रानी अस्पताल में घायलों और हादसे में मारे गए लोगों की लाशें लाए जाने की सूचना है। वहां से प्रशासन ने भीड़ को हटा दिया है। कई स्ट्रेचर को बाहर लगाया गया है।
गुना जिले के रमेश ने बताया- भगदड़ में उनकी पत्नी, बच्ची, बच्चा, दामाद लापता हो गए हैं। संगम पर अचानक पता नहीं क्यों भगदड़ मची, मैं किसी तरह जान बचाकर भागा हूं।
ये फोटो सेंट्रल हॉस्पिटल के कर्मचारी ने भेजी है। बताया जा रहा है कि अब तक संगम पर करीब 50 एंबुलेंस पहुंच चुकी हैं।
प्रत्यक्षदर्शी सोनी सिंह कह रही है कि सिर्फ 2 पुल खुले थे, बाकी बंद थे। इस वजह से भगदड़ मची। 10 से ज्यादा लोग मरे हैं।
प्रयागराज के संगम तट पर अमृत स्नान से पहले देर रात करीब 2 बजे भगदड़ मच गई। जिसमें कुछ लोगों के मरने की सूचना है। ग्राउंड जीरो पर मौजूद दैनिक भास्कर के रिपोर्टर्स के मुताबिक अफवाह के चलते लोग भागने लगे।
एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक भगदड़ मचते ही लोग दौड़े। इससे कुछ महिलाएं जमीन पर गिर गईं और लोग उन्हें कुचलते हुए निकल गए। खबर मिलते ही 5 से ज्यादा एंबुलेंस घायलों को लेकर सेंट्रल हॉस्पिटल रवाना हुई हैं।
मौनी अमावस्या का धार्मिक महत्व क्या है? इसे लेकर हमने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ज्योतिष विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर गिरजा शंकर शास्त्री से बातचीत की। उन्होंने बताया- मौनी अमावस्या ही मुख्य है। कुंभ भी इसी के इर्द-गिर्द हुआ करता है। पुराणों में कहा गया है कि वृष राशि में बृहस्पति, मकर राशि में सूर्य और चंद्रमा हों तो कुंभ महापर्व का योग बनता है।
सबसे महत्वपूर्ण ये है कि मकर में चंद्रमा सिर्फ 2 दिन के लिए रहते हैं। इसलिए पूरे कुंभ के दौरान मौनी अमावस्या ही प्रधान माना जाता है। सूर्य आत्मा, चंद्रमा मन और बृहस्पति ज्ञान हैं। सूर्य-चंद्रमा के एकसाथ होने से मौनी अमावस्या पर्व होता है। इस दिन चंद्रमा (मन) का मिलन सूर्य (आत्मा) से होता है। इससे चंद्रमा के दर्शन नहीं होते। ये चिंतन ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले किया था। अगर मन मौन हो जाए तो वाणी नहीं निकलती है। इसलिए मौन रहकर ही मौनी अमावस्या का स्नान करना चाहिए।
गिरजा शंकर शास्त्री बताते हैं- इस दिन भगवान का चिंतन कर स्नान करने से सभी पाप हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। मन, बुद्धि, चित्त सब शांत हो जाते हैं। तभी भगवान और आत्मा का दर्शन होता है। ज्ञान की पराकाष्ठा इसी स्थिति में हो पाती है। शरीर और मन भी निर्बल होता है। इसलिए मौनी अमावस्या पर स्नान का सबसे अधिक महत्व है।
राजेंद्र पालीवाल ने बताया- मौनी अमावस्या के दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न, कपड़े, तिल और चावल का दान करें। मान्यता है, ऐसा करने से पितर खुश होते हैं। इस दिन गंगा नदी या किसी पवित्र नदी में स्नान करें। ये संभव न हो तो घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर स्नान कर लें। इस दिन गाय, कुत्ते और कौवे को भोजन खिलाना शुभ माना जाता है। यह पितरों को प्रसन्न करता है।
मौनी अमावस्या के दिन घर के बाहर दक्षिण दिशा में तेल का दीया जलाएं। यह दिशा पितरों की मानी जाती है। मान्यता है कि पीपल के पेड़ के नीचे दीया जलाने से पितरों की कृपा मिलती है। साथ ही सुख-समृद्धि का वास बना रहता है।
मौनी अमावस्या के दिन मांस, मछली और शराब जैसी चीजें नहीं खानी चाहिए। ये चीजें पितरों को नाराज कर सकती हैं। अमावस्या के दिन अपने पूर्वजों या किसी और के लिए गलत बात न कहें। यह पितरों की नाराजगी का कारण बन सकता है।
इस दिन कुत्ते, गाय और कौवे जैसे जानवरों को कष्ट देना अशुभ माना जाता है। घर और आसपास सफाई रखें, क्योंकि गंदगी फैलाने से नेगेटिव एनर्जी आती है।
शाही स्नान को लेकर धार्मिक और ज्योतिष दृष्टि से अलग-अलग मत मिलते हैं। धर्म के जानकार कहते हैं कि गृहों की विशेष स्थिति में करने वाले स्नान को शाही स्नान कहा जाता है। ये परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। जबकि इतिहासकार शाही स्नान के पीछे कुछ और कहानी बताते हैं। वे कहते हैं कि शाही स्नान की शुरुआत 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच हुई, जब भारत में मुगलों के आक्रमण की शुरुआत हो चुकी थी।
ऐसे में साधुओं ने धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों के रूप में एकजुट होना शुरू किया। इसमें नागा साधुओं की भी मदद ली गई। जब संघर्ष बढ़ा तो साधु-संतों और शासकों ने बैठक की। इसमें तय हुआ कि दोनों एक-दूसरे के धर्म के काम में कुछ नहीं कहेंगे।
साधुओं को सम्मान देने, धर्म की रक्षा करने और एकजुटता दिखाने के लिए साधु-संतों को घोड़ों पर बैठाकर उनकी पेशवाई निकाली गई। इस दौरान उनका ठाठ-बाट राजाओं जैसा होता था। वहीं से शाही स्नान की परम्परा शुरू हुई।
प्रयागराज में साल-2013 के कुंभ मेला के दौरान 10 फरवरी रविवार को मौनी अमावस्या का स्नान था। स्नान करके श्रद्धालु लौट रहे थे। प्रयागराज जंक्शन पर बड़ी संख्या में यात्री पहुंच चुके थे। सभी प्लेटफॉर्म ठसा-ठस भरे थे। शाम 7 बजे प्लेटफॉर्म नंबर-6 की तरफ जाने वाले फुटओवरब्रिज की सीढ़ियों पर अचानक भगदड़ मची। धक्का-मुक्की में कई लोग ओवरब्रिज से नीचे जा गिरे। कई लोगों को भीड़ ने कुचल दिया। इसमें 35 लोगों की मौत हुई थी। मरने वालों में यूपी, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के श्रद्धालु थे।
इससे पहले 1954 के कुंभ में मौनी अमावस्या पर्व पर त्रिवेणी बांध पर भगदड़ मची और इसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं को जान गंवानी पड़ी थी। ये दो घटनाएं ऐसी हैं, जिनकी वजह से महाकुंभ प्रशासन मौनी अमावस्या पर पहले से ज्यादा चाक-चौबंद व्यवस्थाएं करता है।
महाकुंभ के मेला अधिकारी विजय किरण आनंद ने बताया- इस बार मौनी अमावस्या पर 8 से 10 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है। हमने तैयारियां इससे ज्यादा की हैं। माना जा रहा है कि महाकुंभ शुरू होने से लेकर मौनी अमावस्या तक करीब 16 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु संगम में स्नान कर चुके होंगे।
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