Shreeom Singh
Date: 14-10-26 11:57
पटना: पटना हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि किसी महिला के घर में रात के समय घुसना, दीया बुझाना, उसके ऊपर लेटना और चीखने से रोकने के लिए मुंह दबाना गंभीर हरकतें हैं, लेकिन केवल इन बातों से दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित नहीं होता. इसके लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया था.
जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने बेगूसराय में साल 2010 में हुए एक मामले में आरोपी मोहम्मद ऐनुल हक को दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से बरी कर दिया. कोर्ट ने उसे मिली चार साल की सजा भी रद्द कर दी. हालांकि, महिला की लज्जा भंग करने और घर में जबरन घुसने के अपराध में उसकी सजा को जेल में बिताए गए करीब ढाई महीने के समय तक सीमित कर दिया गया.
पीड़िता को 25 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश
हाईकोर्ट ने पीड़ित महिला को 25 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया. वहीं, आरोपी पर भी 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया. कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म के प्रयास के मामले में केवल गलत नीयत या अश्लील हरकत को पर्याप्त नहीं माना जा सकता. आरोपी को तैयारी की अवस्था से आगे बढ़कर अपराध करने की दिशा में ठोस कदम उठाना जरूरी है.
मामले में आरोपी के महिला के घर में घुसने और उसके साथ जबरदस्ती करने की बात सामने आई, लेकिन शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में प्रत्यक्ष प्रयास साबित नहीं हो सका.
पीड़िता के कपड़े फटने या चोट लगने के सबूत नहीं मिले
एक अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान का हवाला देते हुए कहा कि न तो महिला के कपड़े फटे थे और न ही आरोपी के कपड़े फटने की बात सामने आई. कपड़े उतारने की कोशिश या शरीर पर चोट के भी सबूत नहीं मिले. ऐसे में दुष्कर्म के प्रयास का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं थे.
कोर्ट ने कहा कि रात में महिला के बिस्तर पर लेटना और उसका मुंह दबाना उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली हरकत है. यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 के तहत अपराध है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अश्लील हमला या छेड़छाड़ अपने आप में दुष्कर्म का प्रयास नहीं है. इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया था.
हाईकोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया था संज्ञान
रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले पटना हाईकोर्ट के एक अन्य फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था. उस मामले में हाईकोर्ट ने कहा था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसका सीना दबाना दुष्कर्म का प्रयास नहीं है.
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस बी. मोहना की पीठ ने की थी. सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने पटना हाईकोर्ट के आदेश में की गई टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया था.
पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह ने 9 जुलाई को फैसला सुनाते हुए ये टिप्पणियां की थीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरोपी का पक्ष सुनने के बाद फैसले को रद्द भी किया जा सकता है. सीजेआई सूर्यकांत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय को स्थानीय पुलिस के जरिए आरोपी तक नोटिस पहुंचाने का निर्देश भी दिया था.
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