मोहन यादव की कृषि भूमि में कोई वृद्धि नहीं, ज्यादातर खरीद CM बनने से पहले की… जमीन विवाद में पढ़ें Aaj Tak की ग्राउंड रिपोर्ट – AajTak

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मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों जमीन खरीद को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. आरोप सीधे मुख्यमंत्री मोहन यादव, उनके परिवार और रिश्तेदारों से जुड़े कथित जमीन सौदों पर लगाए जा रहे हैं. कांग्रेस का दावा है कि जिन इलाकों में सड़क, हाईवे, कॉरिडोर और मास्टर प्लान के तहत विकास परियोजनाएं प्रस्तावित हुईं, उन्हीं क्षेत्रों के आसपास बड़े पैमाने पर जमीन खरीदी गई. वहीं बीजेपी इन आरोपों को राजनीतिक दुष्प्रचार बताते हुए पूरी तरह खारिज कर रही है.
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया कि उज्जैन क्षेत्र में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और रिश्तेदारों के पास करीब 335 एकड़ का ‘लैंड बैंक’ है. कांग्रेस के मुताबिक मोहन यादव के परिवार के लोगों और रिश्तेदारों ने 2021 से 2025 के बीच लगभग 253 एकड़ जमीन खरीदी गई, जिनमें से करीब 168 एकड़ जमीन उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद खरीदी गई. 
CM मोहन यादव पर कांग्रेस के गंभीर आरोप
कांग्रेस ने गांगेड़ी, नवाखेड़ा, सांवराखेड़ी और चंदेसरा जैसे गांवों का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि उज्जैन-इंदौर रोड, उज्जैन-बदनावर रोड, पंचकोशी परिक्रमा मार्ग, उज्जैन-मक्सी रोड, उज्जैन-नागदा रोड, उज्जैन-देवास रोड और गरोठ ग्रीन फील्ड कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं की घोषणा के बाद आसपास जमीनों का बड़ा खेल हुआ. आरोपों के घेरे में मुख्यमंत्री के कई रिश्तेदारों के नाम भी लिए गए हैं. कांग्रेस का दावा है कि अलग-अलग नामों से जमीन खरीदने वालों में नंदलाल यादव, नारायण यादव, रेखा यादव, अभय यादव, गोविंद यादव, निलेश यादव और कलावती यादव शामिल हैं.
मोहन यादव की कृषि भूमि में कोई वृद्धि नहीं
हालांकि, मुख्यमंत्री मोहन यादव के पक्ष और बीजेपी ने इन आरोपों का विस्तार से जवाब दिया है. आजतक को मिली जानकारी के अनुसार मोहन यादव की कृषि भूमि में कोई वृद्धि नहीं हुई है. नवंबर 2023 में उनके स्वामित्व में 17.967 एकड़ कृषि भूमि थी, जो जून 2026 तक भी उतनी ही बनी हुई है. यह जानकारी पहले से चुनावी हलफनामे में घोषित बताई गई है.
इसी तरह मुख्यमंत्री की पत्नी सीमा यादव की कृषि भूमि नवंबर 2023 में 12.287 एकड़ थी, जो जून 2026 में 12.292 एकड़ बताई गई. दावा किया गया कि यह जमीन वर्ष 2008 से 2019 के बीच खरीदी गई थी, यानी मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने से काफी पहले. मुख्यमंत्री से जुड़ी कंपनी ‘सिद्धि विनायक देवकॉन प्राइवेट लिमिटेड’ को लेकर भी सफाई दी गई है. बताया गया कि यह कंपनी वर्ष 2008 में कृषि कार्यों के लिए बनाई गई थी और मोहन यादव, उनकी पत्नी सीमा यादव वर्ष 2017 में ही इसके डायरेक्टर पद से अलग हो चुके थे.
कंपनी की जमीन भी करीब तीन एकड़ घटी
मार्च 2026 में उन्होंने अपने सभी शेयर भी छोड़ दिए. कंपनी के पास नवंबर 2023 में 68.43 एकड़ जमीन थी, जो जून 2026 तक घटकर 65.69 एकड़ रह गई. जानकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री मोहन यादव के बेटे वैभव यादव ने 2019 से मार्च 2023 के बीच ग्राम सांवराखेड़ी में 16.38 एकड़ कृषि भूमि खरीदी थी. यह खरीद भी मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने और उज्जैन मास्टर प्लान-2035 लागू होने से पहले हुई थी. वहीं वैभव यादव की पत्नी शालिनी यादव ने 2025 में ग्राम गांगेड़ी में 10 एकड़ कृषि भूमि खरीदी, जिसे मास्टर प्लान क्षेत्र से बाहर बताया गया है.
बीजेपी का कहना है कि मुख्यमंत्री के रिश्तेदार स्वतंत्र इकाइयां हैं और वे अपने निजी व्यवसाय, आर्थिक गतिविधियां स्वतंत्र रूप से संचालित करते हैं. इसलिए उनके निजी लेन-देन को मुख्यमंत्री से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत है. मध्य प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव ने कोई जमीन नहीं खरीदी. हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि परिवार और रिश्तेदारी से जुड़े अन्य लोगों ने अपने व्यवसाय के लिए जमीन खरीदी है. बीजेपी ने यह भी कहा कि उज्जैन मास्टर प्लान-2035 मई 2023 में लागू हो चुका था, जबकि मोहन यादव दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री बने. ऐसे में विकास परियोजनाओं को मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रभावित किए जाने का आरोप गलत है.
हालांकि पूरे विवाद में कई सवाल अब भी बने हुए हैं. आजतक को मिली जानकारी के अनुसार मोहन यादव के परिवार ने उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद पांच प्लॉट खरीदे, जबकि परिवार से जुड़े अन्य लोगों ने करीब 116 प्लॉट खरीदे. खतौनी रिकॉर्ड के मुताबिक रिश्तेदारों ने 2024 में लगभग 76 एकड़ और 2025 में करीब 96 एकड़ जमीन खरीदी. इसी आधार पर कांग्रेस 335 एकड़ लैंड बैंक का दावा कर रही है. उज्जैन-मक्सी रोड पर जयवंतपुर गांव का मामला भी चर्चा में है. यहां मुख्यमंत्री के चचेरे भाई गोविंद यादव और उनके बेटों सिद्धार्थ एवं अनंत यादव द्वारा करीब चार एकड़ जमीन खरीदे जाने की बात सामने आई है, जहां कथित तौर पर कॉलोनी विकसित की जा रही है.
इस विवाद के बीच 2007 का एक पुराना मामला भी फिर चर्चा में आ गया है. तब मोहन यादव उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष थे और सांवराखेड़ी में शिप्रा नदी पर 200 मीटर लंबे पुल का निर्माण कराया गया था. उस समय भी आरोप लगे थे कि पुल ऐसी जगह बनाया गया जहां आगे सड़क ही नहीं थी और गांव में यादव परिवार की पुश्तैनी जमीन मौजूद थी. हालांकि बाद में इस मामले में उन्हें क्लीन चिट मिल गई थी. स्थानीय बीजेपी नेताओं का कहना है कि सिंहस्थ 2016 के दौरान सांवराखेड़ी को सैटेलाइट टाउन के रूप में विकसित किया गया, जिसके लिए यह पुल बेहद उपयोगी साबित हुआ.
बेटे वैभव यादव की कंपनी के पास 65 एकड़ भूमि
वर्तमान में वैभव यादव जिस कंपनी ‘सिद्धिविनायक देवकॉन प्राइवेट लिमिटेड’ में डायरेक्टर हैं, उसके पास उज्जैन में करीब 65 एकड़ जमीन बताई जा रही है. हालांकि उज्जैन के रियल एस्टेट कारोबारियों का कहना है कि महाकाल लोक के उद्घाटन के बाद से पूरे शहर में रियल एस्टेट कारोबार तेजी से बढ़ा है और सिर्फ स्थानीय ही नहीं बल्कि राज्य और देश के अन्य हिस्सों से भी निवेशक यहां जमीन खरीद रहे हैं. अब इस पूरे विवाद के केंद्र में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास परियोजनाओं से पहले हुई जमीन खरीद महज संयोग है, या फिर सत्ता और जमीन सौदों के बीच कोई सीधा संबंध है? 
आरोप गंभीर हैं, जवाब भी उतने ही मजबूत दिए जा रहे हैं. कांग्रेस दस्तावेजों के आधार पर जांच की मांग कर रही है, जबकि बीजेपी पूरे मामले को राजनीतिक दुष्प्रचार बता रही है. सच क्या है, इसका फैसला आरोपों से नहीं बल्कि तथ्यों और जांच से होगा. फिलहाल यह मामला मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा सियासी भूचाल लेकर आया हुआ है और आने वाले दिनों में इसकी जांच और राजनीतिक टकराव दोनों तेज होने की संभावना है.
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