वाराणसी, हिटी। काशी के साहित्यकार यतींद्रनाथ चतुर्वेदी और जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट प्रो. विजयनाथ मिश्र को धर्म-संस्कृति, कला-धरोहर श्रेणी में मौलिक लेखन के लिए राजभाषा गौरव पुरस्कार के लिए चुना गया है।
उनकी कृति ‘दंडपाणि च भैरवं’ के लिए यह पुरस्कार 14 सितंबर को मुंबई में आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में दिया जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय राजभाषा गौरव पुरस्कारों की घोषणा करता है। उल्लेखनीय है कि दंडपाणि च भैरवं पुस्तक भारत की संस्कृति परंपरा और मूल्यों को उजागर करती है। सृष्टि के आदि काल से मौन जहां तपस्यारत है। शब्द के रूप में नाद जहां जन्म लेकर पनपते हैं स्वयं अपने भगवान् शिव के लिए। यहीं पर स्वयंभू शिव हर युग में देह और प्राण को सायुज्य प्रदान करते हैं। इस काशी ने एक कालातीत सफर तय किया है। दण्डपाणि च भैरवम् भगवान् और भारतीय सभ्यता की परत दर परत संक्षिप्त कथा है। आनंदकानन के इस इतिहासगाथा का विवरण जगह- जगह टूटे और बिखरे हुए अक्षरों में मिलता है, जिसे लेखकद्वय यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी और प्रो. विजयनाथ मिश्र ने चुन-चुन कर एकत्रित किया है।
प्रो विजयनाथ मिश्र आईएमएस बीएचयू में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर हैं। 30 वर्षों से न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में सक्रिय प्रो. मिश्र को मिर्गी मरीजों के निदान के लिए उत्तर भारत की हिन्दी पट्टी में ‘मिर्गी मैन’ के रूप में जाना जाता है। प्रो. मिश्र की एक महत्त्वपूर्ण रचना “रामचरित मानस की पांडुलिपियाँ (ज्ञात-अज्ञात तथ्य)” पूरे देश में चर्चा का विषय रही है, जिसे हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद द्वारा ‘तुलसीदास पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी भारतीय साहित्य, वैदिक परंपरा और प्राचीन इतिहास के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वर्तमान में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति के सदस्य हैं।
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