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राघव चड्ढा प्रकरण ने राज्यसभा की प्रासंगिकता पर सवाल उठा दिया है. राघव चड्ढा तो आम आदमी पार्टी के 6 सांसदों के साथ बीजेपी में शामिल हो गए. सभापति ने आम आदमी पार्टी के टूटे हुए हिस्से के बीजेपी में विलय को मान्यता भी दे दी है – और उसके साथ ही आम आदमी पार्टी की तरफ से अपने सांसदों की सदस्यता रद्द कराने की कोशिश भी नाकाम हो चुकी है.
दल-बदल के इस ताजा प्रकरण राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों के चयन, चुनाव प्रक्रिया और पार्टियों के दृष्टिकोण पर सवाल उठा दिया है. और यह भी कि एक डेमोक्रेसी में आखिर जनता सिर्फ मूकदर्शक क्यों बनी रहे. ऐसे मामलों में दूध के धुल तो लोकसभा सांसद भी नहीं हैं. वहां भी खूब दल-बदल हुआ है. लेकिन, जनादेश की तलवार लोकसभा के हर सांसद पर लटकती है. उसे पता है कि वह जो भी कर ले, आखिरी कसौटी जनता ही है. चुनाव में उसी का सामना करना पड़ेगा. ऐसे में लोकसभा सदस्य और राजनीतिक दल फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं. लेकिन, जब राज्यभा यानी उच्च सदन की बारी आती है, तो सारे पैमाने निम्न स्तर पर चले जाते हैं.
दुनिया की कई डेमोक्रेसी में ऊपरी सदन की व्यवस्था है. जैसे, यूके में हाऊस ऑफ लार्ड, अमेरिका में सीनेट. इनके चुनाव के अलग-अलग पैमाने हैं. लेकिन, राज्यसभा की तरह यह मान्यता है कि इसमें समाज के विशिष्टजनों का प्रतिनिधित्व होगा. राज्यसभा को लेकर भी अवधारणा यही थी. लेकिन, लगभग सभी दलों ने अपने उम्मीदवार तय करने में पैमानों को गिराया. आम आदमी पार्टी के जिन सात सांसदों ने पार्टी छोड़कर बीजेपी ज्वाइन की है, उनके बारे में भी यही कहा जा रहा है कि इनको राज्यसभा में भेजते समय अरविंद केजरीवाल ने मनमानी की. एक कॉर्पोरेट की तरह फैसला लिया. कहा गया कि जिस तरह की डील के साथ वे राज्यसभा पहुंचे थे, उसी तरह की डील के साथ उन्होंने पाला बदल लिया.
2022 में कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने राज्यसभा की प्रासंगिकता पर ही सवाल उठा दिया था. चंडीगढ़ सांसद (तब आनंदपुर साहिब से सांसद) ने कहा था, राज्यसभा अब पार्किंग लॉट बन गई है – और राघव चड्ढा का मामला एक बार फिर ऐसी ही दलीलों को आगे बढ़ा रहा है.
7 साल पहले TDP में हुई थी AAP जैसी बगावत
AAP नेता अरविंद केजरीवाल की ही तरह 7 साल पहले टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू के साथ भी बिल्कुल ऐसा ही वाकया हुआ था. 2019 के आम चुनाव से पहले टीडीपी ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था. तब राज्यसभा में टीडीपी के 6 सांसद थे, उनमें से चार ने बगावत की, और वाईएस चौधरी, टीजी वेंकटेश, सीएम रमेश और मोहन राव बीजेपी में शामिल हो गए. विधानसभा चुनाव हार जाने के बाद चंद्रबाबू नायडू सत्ता से बेदखल हो गए. 2024 में टीडीपी फिर से एनडीए का हिस्सा बन गई, और अभी तो केंद्र सरकार को सपोर्ट करने वालों में चंद्रबाबू नायडू का योगदान भी नीतीश कुमार जैसा ही है.
राघव चड्ढा और साथियों की टीम ने भी बीजेपी में शामिल होने के लिए बिल्कुल वही तरीका अपनाया है, जो टीडीपी सांसदों ने अपनाया था. अरविंद केजरीवाल के हाथ से भी डोर वैसे ही छूटी है, जैसे 7 साल पहले चंद्रबाबू नायडू के साथ से छूटी थी – और दूसरी छोर पर तब भी अभी की तरह भारतीय जनता पार्टी ही थी.
आम आदमी पार्टी ने नुकसान को कम करने के लिए सांसदों की सदस्यता रद्द कराने की कोशिश जरूर की थी, लेकिन कोशिश असफल रही. वैसे जो कदम आम आदमी पार्टी ने अब जाकर उठाया, अगर स्वाति मालीवाल की बगावत के बाद ही एक्शन लिया होता, तो मुश्किलें थोड़ी कम हो सकती थीं. और, राघव चड्ढा के लिए भी सब कुछ इतना आसान नहीं होता.
अगर कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़ देता है, तो दल बदल कानून के तहत उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है. लेकिन, दो-तिहाई सांसदों के अपनी पार्टी छोड़कर किसी अन्य पार्टी में शामिल होने की सहमति दे देने के बाद काम आसान हो जाता है.
राघव चड्ढा ने सांसद बनने के तीन महीने बाद ही 5 अगस्त, 2022 को राज्यसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था. राघव चड्ढा ने बिल में दल बदल कानून को और सख्त बनाने की मांग की थी. राघव चड्ढा चाहते थे वैध विभाजन के लिए दो-तिहाई की जगह तीन-चौथाई बहुमत की जरूरत हो. प्रस्ताव यह भी था कि अगर कोई सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदलता है, तो 6 साल तक उसके चुनाव लड़ने पर भी पाबंदी लागू हो – फर्ज कीजिए, राघव चड्ढा का बिल पास होकर कानून बन जाता, तो आज उनके लिए चीजें कितनी मुश्किल होतीं.
राज्यसभा की जरूरत है भी? सवालों से भरा है इतिहास
2022 में ही कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में कहा था, ‘जहां तक मेरी राय है… जिन उद्देश्यों को लेकर राज्यसभा का गठन हुआ था, राज्यसभा उन उद्देश्यों को पूरा नहीं कर रही है… राज्यसभा एक तरीके की पार्किंग वाली जगह बन गई है… देश को इसकी जरूरत है या नहीं, अब समीक्षा करने की जरूरत है.’
सोशल मीडिया पर अपनी राय रखते हुए मनीष तिवारी ने कहा था, कई दशकों से अब राज्यसभा अपने गठन के प्रमुख उद्देश्य को पूरा करने में विफल रही है. यानी केंद्र के मुकाबले राज्यों के अधिकारों की पैरवी करना… समय आ गया है कि एक बुनियादी सवाल पूछा जाए… भारत को दूसरे संघीय सदन की जरूरत क्यों है? क्या भारत इसके बिना काम नहीं कर सकता? क्या राज्यसभा को समाप्त कर दिया जाना चाहिए?
राज्यसभा को समाप्त करने को लेकर मनीष तिवारी ने जो सवाल चार साल पहले उठाया था, पहले भी उठ चुका है. 18 मार्च, 1954 को लोकसभा में राज्यसभा को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन इसे नकार दिया गया.
ऐसा ही एक और प्रस्ताव 30 मार्च, 1973 को भी लोकसभा में लाया गया था. राज्यसभा को समाप्त करने के मकसद से प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में 1971, 1972, 1975 और 1981 में संविधान संशोधन विधेयक पेश किए जा चुके हैं, लेकिन सारे ही प्रयास असफल रहे.
राघव चड्ढा और साथियों की बगावत ने फिर से वही सवाल उठा दिया है कि आखिर राज्यसभा की प्रासंगिकता कितनी बची है? बेशक राघव चड्ढा और संदीप पाठक पंजाब में आम आदमी पार्टी की 2022 की चुनावी जीत के आर्किटेक्ट के तौर पर देखे जा रहे हों, लेकिन पंजाब में उनका आधार क्या है? 2020 के दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी की लहर में राघव चड्ढा विधायक भी बन गए थे. अगर 2025 का चुनाव लड़ना पड़ा होता तो राघव चड्ढा का हाल भला अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया से अलग कहां हुआ होता? अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया दोनों ही चुनाव हार गए थे.
राघव चड्ढा और संदीप पाठक के अलावा बीजेपी में जाने वाले बाकी सांसदों की बात करें, तो अशोक मित्तल राज्यसभा सांसद अरविंद केजरीवाल की वजह से ही बन पाए. राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के डिप्टी लीडर भी उसी वजह से बने थे. वैसे ये सब कभी एकतरफा नहीं होता. हमेशा ही एक्सचेंज ऑफर होता है.
अगर एक्सचेंज ऑफर न होता तो दिल्ली से पहली बार अरविंद केजरीवाल को राज्यसभा में भेजने का मौका मिलने पर एनडी गुप्ता और एसके गुप्ता को क्यों भेजते. संजय सिंह की तरह और भी लोग थे, जो राजनीति में सक्रिय थे. आशुतोष, आशीष खेतान तो लोकसभा का चुनाव भी लड़े थे, और राज्यसभा के लिए मौके के इंतजार में थे. कुमार विश्वास की भी नाराजगी की वजह तो राज्यसभा की सीट ही मानी गई थी – लेकिन, क्या प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को आम आदमी पार्टी से बाहर करने के बजाए अरविंद केजरीवाल ने राज्यसभा भेजा होता, तो क्या ऐसे ही दिन देखने पड़ते?
राज्यसभा के मामले में जनता सिर्फ मूकदर्शक
राघव चड्ढा और साथियों के आम आदमी पार्टी छोड़ने को संजय सिंह ने पंजाब के लोगों के साथ धोखा करार दिया था? लेकिन, क्या वास्तव में राघव चड्ढा और उनके साथियों ने पंजाब के लोगों को धोखा दिया है, और क्या उनके मन में भी ऐसा कोई मलाल है? जाहिर है बिल्कुल नहीं है, वरना उनमें से कोई ये सब करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता.
राघव चड्ढा और संदीप पाठक अगर जनता के बीच से चुनकर आए होते, तो पाला बदलते वक्त उनको यह जरूर लगता कि अगले चुनाव में लोगों का सामना कैसे करेंगे? ऐसा भी नहीं कि राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने पहली बार यह काम किया है, या 2019 में ऐसा करने वाले टीडीपी सांसद ही थे. विधायकों की रिजॉर्ट्स पॉलिटिक्स तो हाल के समय में काफी चर्चित रही है.
राज्यसभा को समाप्त करना ही कोई आखिरी समाधान नहीं है, उपाय और भी हो सकते हैं और आजमाए जा सकते हैं – क्या राज्यसभा के चुनाव भी लोकसभा की तरह नहीं कराए जा सकते?
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