'लिपुलेख से व्यापार मंजूर नहीं', अब नेपाली संसद में विरोध; भारत के लिए क्यों खास है यह दर्रा? – Hindustan

नेपाल की संसद में भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के माध्यम से व्यापार फिर से शुरू करने के समझौते को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। नेपाल के सांसदों ने इस समझौते का कड़ा विरोध करते हुए इसे देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ बताया। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा उसके क्षेत्र का “अभिन्न हिस्सा” हैं। सीपीएन (माओवादी केंद्र) के मुख्य व्हिप हितराज पांडे ने कहा, “हमारे दो पड़ोसी मित्र देशों, भारत और चीन, के बीच लिपुलेख दर्रे से व्यापार मार्ग फिर से खोलने के लिए हुए द्विपक्षीय समझौते ने हमारे राष्ट्र को आहत किया है। नेपाल को इस समझौते की जानकारी नहीं दी गई, जो हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ है।” उन्होंने इस समझौते का विरोध करते हुए सरकार से इस मुद्दे पर तत्काल राजनयिक और राजनीतिक प्रयास शुरू करने की मांग की।
गुरुवार को नेपाली प्रतिनिधि सभा की बैठक में बोलते हुए, सांसदों ने सरकार से परिपक्व कूटनीतिक पहल करने और इस मामले पर सर्वदलीय सहमति बनाने का आग्रह किया। नेपाली कांग्रेस के महासचिव गगन कुमार थापा ने कहा, “लिपुलेख के रास्ते भारत-चीन व्यापार समझौता अस्वीकार्य है। सरकार को इस मुद्दे के समाधान के लिए सर्वदलीय सहमति के आधार पर उचित कदम उठाने चाहिए। घरेलू मामलों पर हमारे मतभेदों के बावजूद, नेपाल में सभी दलों को नेपाली क्षेत्र के इस्तेमाल के खिलाफ एकजुट रुख अपनाना चाहिए।”
सांसद ठाकुर प्रसाद गैरे ने भी इस मुद्दे पर अपनी आपत्ति जताई और कहा, “कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा नेपाल के क्षेत्र हैं, और नेपाल को इनका उपयोग करने का अधिकार है। भारत और चीन द्वारा नेपाल की सहमति के बिना लिपुलेख मार्ग से व्यापार करना गलत है। दोनों पड़ोसी देशों को इस निर्णय को सुधारना चाहिए।” उन्होंने भारत के उस बयान पर भी आपत्ति जताई, जिसमें कहा गया था कि नेपाल का लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर दावा ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है।
सीपीएन-यूएमएल सचिव योगेश भट्टाराई ने कहा कि लिपुलेख के माध्यम से हुआ व्यापार समझौता नेपाली जनता, सरकार और संसद को अस्वीकार्य है। तरह, सीपीएन (माओवादी सेंटर) के सचिव देवेंद्र पौडेल ने लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी की “रक्षा के लिए एकजुटता” की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार को आम सहमति पर आधारित कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री की आगामी भारत और चीन यात्राओं के दौरान इस मुद्दे को स्पष्ट रूप से उठाया जाना चाहिए।”
नेपाल ने बुधवार को कहा कि यह क्षेत्र उसका अविभाज्य हिस्सा है और इसे उसके आधिकारिक मानचित्र में भी शामिल किया गया है। नेपाली विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘‘नेपाल सरकार का स्पष्ट मत है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल के अविभाज्य अंग हैं। इन्हें आधिकारिक तौर पर नेपाली मानचित्र में भी दर्ज किया गया है और संविधान में भी शामिल किया गया है।’’
नेपाल सरकार के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि ऐसे दावे ‘न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों तथा साक्ष्यों पर आधारित हैं।’’ भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘‘लिपुलेख दर्रे के ज़रिए भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार 1954 में शुरू हुआ था और दशकों तक जारी रहा है। हाल के वर्षों में कोरोना और अन्य घटनाओं के कारण यह व्यापार बाधित हुआ था। अब दोनों पक्ष इसे फिर से शुरू करने पर सहमत हुए हैं।’’
चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच नयी दिल्ली में व्यापक वार्ता के बाद मंगलवार को जारी एक संयुक्त दस्तावेज में कहा गया कि दोनों पक्ष तीन निर्दिष्ट व्यापार बिंदुओं – लिपुलेख दर्रा, शिपकी ला दर्रा और नाथू ला दर्रा – के माध्यम से सीमा व्यापार को फिर से शुरू करने पर सहमत हुए।
लिपुलेख दर्रा भारत का हिस्सा है। यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पड़ता है। लिपुलेख दर्रा भारत के लिए न केवल सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह दर्रा उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) की त्रिसीमा के निकट स्थित है। प्राचीन काल से यह भारत और तिब्बत के बीच व्यापार और धार्मिक यात्राओं का एक प्रमुख मार्ग रहा है। खास तौर पर, यह कैलाश-मानसरोवर तीर्थयात्रा के लिए महत्वपूर्ण है, जो हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मावलंबियों के लिए पवित्र है।
सामरिक दृष्टि से, लिपुलेख दर्रा भारतीय सेना को चीन सीमा तक तेज और सुरक्षित पहुंच प्रदान करता है। यह क्षेत्र भारत के लिए एक रणनीतिक चौकी की तरह काम करता है, जो हिमालयी क्षेत्र में भारत की सुरक्षा को मजबूत करता है। इसके अलावा, यह दर्रा भारत और चीन के बीच व्यापार का एक महत्वपूर्ण रास्ता है। 1954 से लिपुलेख के माध्यम से भारत-चीन सीमा व्यापार शुरू हुआ था, जो दशकों तक चला। हाल के वर्षों में कोविड-19 महामारी और अन्य कारणों से इस व्यापार में व्यवधान आया था, लेकिन अब दोनों देशों ने इसे फिर से शुरू करने का फैसला किया है।
भारत ने इस क्षेत्र में सड़क निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया है। 2020 में भारत द्वारा लिपुलेख दर्रे तक सड़क के उद्घाटन ने इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व को और उजागर किया। यह सड़क न केवल तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाजनक है, बल्कि सैन्य गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा महाकाली नदी के पूर्व में स्थित हैं और ये उसके अभिन्न अंग हैं। 2020 में नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें इन क्षेत्रों को अपने क्षेत्र में शामिल किया गया। नेपाल का तर्क 1816 की सुगौली संधि पर आधारित है, जिसमें महाकाली नदी को सीमा रेखा माना गया था। नेपाल का कहना है कि महाकाली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, इसलिए इसके पूर्व का क्षेत्र नेपाल का है।
हालांकि, भारत इस दावे को खारिज करता है। भारत के अनुसार, महाकाली नदी का उद्गम लिपुलेख दर्रे के झरनों से होता है, और 19वीं शताब्दी के प्रशासनिक रिकॉर्ड स्पष्ट करते हैं कि कालापानी और लिपुलेख भारत के नियंत्रण में थे। भारत का कहना है कि नेपाल का दावा ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित नहीं है, बल्कि यह हाल के वर्षों में राजनीतिक कारणों से उठाया गया है।
नेपाल की आपत्ति का एक प्रमुख कारण उसकी आंतरिक राजनीति भी है। नेपाल में राष्ट्रवाद को भड़काने के लिए लिपुलेख और कालापानी जैसे मुद्दों को बार-बार उठाया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2020 में नया नक्शा जारी करना नेपाल की घरेलू राजनीति में भारत विरोधी भावनाओं को भुनाने की रणनीति थी। इसके अलावा, नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टियों, जैसे कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल और नेपाली कांग्रेस, ने इस मुद्दे को कूटनीतिक और राजनीतिक मंचों पर उठाकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की है।
लिपुलेख विवाद में चीन का एंगल भी महत्वपूर्ण है। हाल ही में भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे के साथ-साथ शिपकी ला और नाथु ला दर्रों के माध्यम से सीमा व्यापार को फिर से शुरू करने पर सहमति जताई। यह फैसला 18 और 19 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी के भारत दौरे के दौरान लिया गया। इस समझौते ने नेपाल को असहज कर दिया, क्योंकि नेपाल को उम्मीद थी कि चीन इस मुद्दे पर उसका समर्थन करेगा।
चीन ने लिपुलेख को तिब्बती बोली में ‘पुलंग-गुंजी’ के रूप में संदर्भित किया है और इसे अपने व्यापारिक हितों के लिए महत्वपूर्ण माना है। तिब्बत के पुरंग व्यापार केंद्र को भारत से जोड़ने में चीन की रुचि स्पष्ट है। हालांकि, चीन ने नेपाल के दावों का स्पष्ट समर्थन नहीं किया, जिससे नेपाल को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग महसूस हुआ।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल में चीन का बढ़ता प्रभाव इस विवाद को और जटिल कर रहा है। नेपाल की कुछ राजनीतिक पार्टियां और नेता चीन के साथ निकटता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि भारत के खिलाफ अपनी स्थिति को मजबूत कर सकें। हालांकि, लिपुलेख के मामले में चीन ने तटस्थ रुख अपनाया है, जो नेपाल के लिए एक झटका है।
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