लिव इन रिलेशन में रहने वाली महिला को भी पत्नी वाले अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला – India.Com

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने सोमवार (3 अगस्त 2026) को कहा है कि अगर कोई लिव-इन रिलेशनशिप ‘शादी जैसे रिश्ते’ की कैटेगरी में आती है, तो उसमें रहने वाली महिला भी भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860 की धारा 498A के तहत संरक्षण पाने की हकदार होगी. यानी ऐसे मामलों में पुरुष के खिलाफ घरेलू क्रूरता (Cruelty) का मुकदमा चलाया जा सकेगा.

लीगल वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह फैसला जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह संरक्षण हर लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं होगा. ये सिर्फ उन रिश्तों पर लागू होगा, जो व्यवहार और परिस्थितियों के आधार पर शादी जैसे हों. इन रिश्तों में शादी करने का स्पष्ट इरादा भी मौजूद होना चाहिए.

मामला कर्नाटक से जुड़ा था. याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि उसकी शिकायतकर्ता महिला से कानूनी शादी नहीं हुई थी, इसलिए उसके खिलाफ धारा 498A लागू नहीं हो सकती. हालांकि, महिला का दावा था कि दोनों का रिश्ता शादी जैसा था. कर्नाटक हाईकोर्ट ने पहले ही मुकदमा रद्द करने से इनकार कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ऐसे मामले में ट्रायल जारी रहेगा.

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IPC की धारा 498A का उद्देश्य पति या उसके रिश्तेदारों से महिला के साथ शारीरिक या मानसिक क्रूरता, दहेज उत्पीड़न और प्रताड़ना जैसे मामलों में कानूनी सुरक्षा देना है. अब तक यह प्रावधान मुख्य रूप से वैध शादी से जुड़े मामलों में लागू माना जाता था. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने इसकी व्याख्या का दायरा बढ़ा दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए किसी महिला को कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसने औपचारिक शादी नहीं की है. अगर उसका रिश्ता शादी जैसा है और उसे उसी तरह की प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, तो उसे भी समान सुरक्षा मिलनी चाहिए.
शीर्ष अदालत ने कहा, “शादीशुदा महिला और शादी जैसे लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला के बीच सुरक्षा के अधिकार में अंतर करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन होगा.” अदालत के मुताबिक, धारा 498A का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा और क्रूरता से बचाना है, इसलिए इसकी व्याख्या सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए.
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सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह फैसला हर लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं होगा. इसके लिए यह साबित होना जरूरी होगा कि रिश्ता शादी जैसा था. दोनों लंबे समय तक साथ रहे. उनके बीच शादी करने का इरादा या वैवाहिक प्रकृति स्पष्ट थी. उनका रिश्ता अस्थायी या आकस्मिक नहीं था.
लीगल एक्सपर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील अनुपम मुखर्जी के मुताबिक, यह फैसला उन महिलाओं के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जो लंबे समय से लिव इन में रह रही हैं, लेकिन औपचारिक शादी न होने के कारण घरेलू प्रताड़ना के मामलों में धारा 498A का फायदा नहीं ले पाती थीं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ऐसे मामलों में महिलाओं को अधिक कानूनी सुरक्षा मिलने का रास्ता खुल गया है.
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अंजलि कर्मकार 12 साल से जर्नलिज्म की फील्ड में एक्टिव हैं. उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया है. यहीं से मास कॉम में मास्टर्स की डिग्री ली … और पढ़ें
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