वाराणसी। व्यक्ति का शरीर समाप्त भले हो जाता है, लेकिन उसके द्वारा समाज में छोड़े गए सद्विचार कभी नहीं मरते। हिंदी और संस्कृत साहित्य के उत्थान में विशिष्ट योगदान करने वाले डॉ.राजेंद्र प्रसाद पांडेय सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थे, साहित्य समाज ने उन्हें विचार के रूप में स्वीकार किया है। ये बातें संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारीलाल शर्मा ने गुरुवार को नांदी सेवा न्यास की ओर से डॉ. राजेंद्र पांडेय की स्मृति में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि कहीं। रथयात्रा स्थित कन्हैया लाल स्मृति भवन में हुए समारोह में प्रो. शर्मा ने कहा कि डॉ. पांडेय अपने सृजन के रूप में हम सब के लिए साहित्य का अद्भुत खजाना छोड़ गए हैं। अध्यक्षता करते हुए डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि यह कार्यक्रम पतिव्रत धर्म का अनुपम उदाहरण है। कार्यक्रम की सर्जनात्मक समृद्धि ने इसे ऐतिहासिक महत्व का बना दिया है। सारस्वत अतिथि समकालीन भारतीय साहित्य के संपादक बलराम ने बताया कि डॉ. पांडेय के जीवनकाल में उनकी सिर्फ चार पुस्तकों का ही प्रकाशन हुआ था। उनके निधन के बाद उनकी प्रकाशित कृतियों की संख्या 24 पहुंच गई है।
बीज वक्तव्य में प्रो. चितरंजन ने कहा पांडेयजी अपनी प्रशासनिक व्यस्तताओं के बावजूद मित्रों के लिए समय निकाल ही लेते थे। उनके भीतर एक संवेदनशील सर्जक हमेशा जीवित रहता था। वह ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञानबोध के पक्षधर थे। डॉ. अत्रि भारद्वाज ने कहा कि पाण्डेयजी लोक और शास्त्र की सम्यक व्याख्या करने में समर्थ थे। विशिष्ट अतिथि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि पांडेयजी किसी भी विचारधारा से आक्रांत नहीं हुए। उनके साहित्य में भारतीयता की असली आत्मा बसती है।
उद्घाटन सत्र में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पांडेय की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। शांभव एवं वैष्णव रत्न ने अपने दादा डॉ.पांडेय द्वारा विरचित ‘कर्मविमर्श:’ का सस्वर पाठ किया। सत्र की रूपरेखा डॉ. शशिकला पांडेय ने प्रस्तुत की। सात्र के आरंभ में डॉ. राजेंद्र प्रसाद पांडेय कृत ‘जीवनचिन्तनम्’, प्रो. शशिकला पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक ‘होना विद्यानिवास मिश्र’, ‘मेरे साक्षात्कार’, बलराम की कृति ‘संपूर्ण कहानियां’ एवं ‘नांदी’ पत्रिका का लोकार्पण अतिथियों ने किया। प्रो. रामसुधार सिंह ने संचालन और धन्यवाद ज्ञापन कीर्तिरत्न ने किया।
तीन अकादमिक सत्रों का आयोजन
प्रथम वैचारिक सत्र में ‘डॉ. राजेंद्र प्रसाद पांडेय का काव्य संसार’ विषय पर चर्चा हुई। प्रो. वशिष्ठ अनूप की अध्यक्षता में हुए इस सत्र में डॉ. प्रभात मिश्र, दिलीप कुमार शर्मा, फारुक अफरीदी, डॉ. मुक्ता, प्रो. प्रभाकर सिंह ने विचार व्यक्त किए। द्वितीय अकादमिक सत्र का विषय ‘राजेंद्र प्रसाद पांडेय का कथा संसार’ रहा। इस सत्र में विनय दास, विजय शर्मा, प्रीति जायसवाल, प्रो. वंदना मिश्र ने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता प्रो. बलिराज पांडेय ने की। तृतीय अकादमिक सत्र का शीर्षक ‘हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष: काशी और नान्दी’ रखा गया। मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ.राजकुमार उपाध्याय ‘मणि’ रहे। अध्यक्षता व्योमेश शुक्ल ने की। डॉ. मुकेश, सर्वेश मिश्र ने भी विचार रखे।
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शार्ट बायो : सांस्कृतिक समीक्षक के रूप में हिंदी पत्रकारिता में खास पहचान रखने वाले अरविन्द मिश्र अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के पत्रकार हैं। उनके दादा स्व.पं.जनार्दन दत्त मिश्र ‘व्यास’ ने आजादी की लड़ाई में अपनी लेखनी से देश की सेवा की। उनके पिता नवगीतकार स्व.पं.अशोक मिश्र ‘सामयिक’ ने देश के कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उच्च पदों पर सेवाएं दीं।
परिचय एवं अनुभव
अरविन्द मिश्र, हिंदी सांस्कृतिक पत्रकारिता का जाना पहचाना नाम है। बीते ढ़ाई दशक से अधिक समय से हिंदी पत्रकारिता की मुख्य धारा में बतौर सांस्कृतिक पत्रकार कार्यरत हैं। पत्रकारिता की शुरुआत क्राइम रिपोर्टर के रूप में हुई। दैनिक आज और अमर उजाला के लिए अर्से तक धर्म-संस्कृति की रिपोर्टिंग के साथ-साथ खेल पत्रकारिता भी की। रंगमंच, साहित्यिक मंच और संचालन विधा पर लेखन करने के साथ ही स्वयं उक्त विधाओं से जुड़े भी हैं।
करियर का सफर
अरविन्द मिश्र ने विद्यार्थी जीवन के दौरान ही काशी के सांध्यकालीन एवं साप्ताहिक समाचार पत्रों के लिए लिखना शुरू कर दिया था। वर्ष 1997 में दैनिक आज से जुड़कर मुख्य धारा की पत्रकारिता आरंभ की। आज अखबार चार वर्ष सेवा देने के बाद वर्ष 2002 में दैनिक अमर उजाला के वाराणसी संस्करण से बतौर रिपोर्टर जुड़े। वर्ष 2008 से 2012 तक अमर उजाला कॉम्पैक्ट की डेस्क और रिपोर्टिंग टीम को लीड किया। बरेली में अमर उजाला कॉम्पैक्ट की लॉन्चिंग कराई। वर्ष 2013 में दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण से जुड़े। हिन्दुस्तान की ‘पटना लाइव’ टीम को चार वर्षों तक लीड किया। वर्ष 2018 से वाराणसी में बतौर मुख्य संवाददाता कार्यरत हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि और रिपोर्टिंग
हाईस्कूल की परीक्षा विज्ञान वर्ग के विद्यार्थी के रूप में उत्तीण करने के बाद इंटरमीडिएट की परीक्षा वाणिज्य विषय से दी। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा यूपी बोर्ड से उत्तीर्ण की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से वर्ष 1994 में बीकॉम की पढ़ाई पूरी की। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण एम.कॉम की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। बहुत ही कम समय में अरविन्द मिश्र ने अमर उजाला में सांस्कृतिक पत्रकारिता के नवीन मानदण्ड स्थापित कर दिए। इस दौरान उन्होंने ‘काशी परिक्रमा’, ‘आमने-सामने’ और ‘देखी तुम्हरी काशी’ जैसे कॉलमों के माध्यम से अपनी लेखनी को धार दी। प्रदूषण की मार झेल रही गंगा पर उन्होंने विशेष रूप से कार्य किया। गंगा पर उनके विशिष्ट लेखन से प्रभावित होकर ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरुशंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उन्हें गंगारविन्द नाम दिया। सोशल मीडिया पर अरविन्द मिश्र इसी नाम से पहचाने जाते हैं। हिन्दुस्तान से जुड़ने के बाद अरविन्द मिश्र ने सांस्कृति पत्रकारिता में मील के कई पत्थर स्थापित किए। उन रिपोर्ट में रामनगर की रामलीला, नाटी इमली के भरत मिलाप से लेकर काशी में होने वाले धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों की अनेकानेक रिपोर्ट शामिल हैं। संकट मोचन संगीत समारोह और काशी के अति प्राचीन बेनियाबाग के इतिहास को पहली बार कलमबंद करने का श्रेय भी अरविन्द मिश्र को ही जाता है। उन्हें हिन्दुस्तान अखबार की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले ‘होनहार अवार्ड’ इंडिवीजुअल कैटेगरी में छह बार दिए जा चुके हैं। जिन समाचार शृंखलाओं के लिए उन्हें यह अवार्ड मिले उनमें ‘काकोरी काण्ड के नायक’, ‘मैं बेनियाबाग हूं’, ‘प्रेमचंद के बहाने’, ‘प्रेमचंद से छल’, ‘सब्जीवाला शायर’ और ‘गंगा कावेरी’ शामिल हैं। संकट मोचन संगीत समारोह, काशी तमिल संगमम, बनारस लिट् फेस्ट जैसे वृहद आयोजनों की यादगार कवरेज की कटिंग पाठकों ने सहेज कर रखी है। 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर सफल लैंडिंग के दिन अरविन्द मिश्र ने 23 अगस्त की तारीख को चंद्रयान दिवस के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की पहल छेड़ी। इसका नतीजा यह हुआ कि दक्षिण अफ्रीका की यात्रा से लौट कर सीधे इसरो पहुंचे प्रधानमंत्री ने इस दिन को नेशनल स्पेस डे के रूप में मनाने की घोषणा कर दी।
विशेषज्ञता
अरविन्द मिश्र निश्चित रूप से सांस्कृति पत्रकार के रूप में अपनी खास पहचान रखते हैं लेकिन मानवीय कोणों वाली स्टोरी, शिक्षा, खेल और प्रशासनिक रिपोर्टिंग में भी अपनी दक्षता प्रमाणित की है। एक सफल रिपोर्टर होने के साथ ही उन्होंने अपने आप को एक छायाकार के रूप में भी स्थापित किया। हिन्दुस्तान समाचार पत्र में पटना और वाराणसी संस्करण में सौ से अधिक फोटोग्राफ पर बाइलाइन मिल चुकी है। काशी में देवदीपावली के उत्सव की उनके द्वारा ली गई तस्वीर को हिन्दुस्तान के देशभर के सभी संस्करणों में प्रमुखता से स्थान मिल चुका है।
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