शांति समझौते से भारत को तीन बड़े फायदे की उम्मीद – Live Hindustan

– चाबहार पोर्ट परियोजना पर आगे बढ़ सकेगा भारत
– पश्चिम एशिया में चीन और रूस का दबदबा बढ़ेगा
– ईरान मजबूत होकर उभरेगा
– भारत ने भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा मजबूत की
नई दिल्ली, मदन जैड़ा।
अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौते से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर विराम लगेगा, जिससे भारत को तीन बड़े फायदे होने की उम्मीद है। वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि समझौते से भू राजनीतिक स्थितियों में भी आने वाले दिनों में बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार चूंकि इस बार अमेरिका और ईरान दोनों समझौते की शर्तों पर सहमत दिख रहे हैं, इसलिए इसके प्रभावी होने की संभावना है। इससे भारत समेत एशिया के तमाम देशों के समक्ष ऊर्जा की चुनौतियां खत्म हो जाएंगी। सबसे बड़ा फायदा होर्मुज के खुलने से होगा, क्योंकि इसके बंद होने से पश्चिम एशिया से भारत को होने वाली एलपीजी की आपूर्ति सर्वाधिक प्रभावित हुई। दूसरे, जिस प्रकार की सूचनाएं सामने आ रही हैं कि अमेरिका ईरान से आर्थिक प्रतिबंध हटाएगा खासकर कोई भी देश उससे तेल खरीद सकेगा, इसका भारत को बड़ा फायदा होगा। ईरान से उसे सस्ता तेल मिलने की संभावना है तथा वह भारत से तेल की कीमत रुपये में लेता है, जिसे अन्य सामानों की खरीद में समायोजित किया जाता है। तीसरे, चाबहार बंदरगाह पर भारत कार्य करना जारी रखेगा, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुंच बढ़ाने के लिए भारत का एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है तथा जिस पर भारत अब तक 500 करोड़ निवेश कर चुका है।
अमेरिका एवं ईरान के बीच होने जा रहे शांति समझौते को लेकर भी कई बातें हैं, कुछ लोग इसे ट्रंप के झुकने की बात कह रहे हैं तो कुछ कूटनीति। पूर्व राजयनिक जाकिर हुसैन का कहना है कि यह तो स्पष्ट है कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई से वह लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया, जिसके लिए उसने ईरान पर हमला किया था। इसलिए अब वह कूटनीति का सहारा ले रहा है। इसकी दो वजहें हैं। ट्रंप पर घरेलू राजनीति का दबाव है और होर्मुज के बंद होने से वैश्विक दबाव भी है।
हुसैन ने कहा कि मध्य एशिया में चीन और रूस का दखल बढ़ सकता है। इसकी दो वजह हैं। एक, इस संघर्ष में यदि ईरान मजबूती से खड़ा रहा है तो वह इन दो देशों की मदद से ही संभव हुआ है। दूसरे, अरब देश अमेरिका को सुरक्षा मूहैया कराने के लिए भारी रकम चुकाते हैं तथा उन्होंने अमेरिकी बेस को भी इसी आधार पर जगह दी है, लेकिन अमेरिका उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने में विफल रहा है। यहां तक कि अमेरिका ने अपने ज्यादा मिसाइल इंटरसेप्टर सिस्टम इजरायल में लगा दिए थे। ऐसे में अरब देशों का भरोसा चीन और रूस पर बढ़ेगा।
जानकारों का मानना है कि जिस प्रकार पाकिस्तान ने इस मामले में मध्यस्थता की, उससे मुस्लिम देशों के बीच उसकी स्थिति मजबूत हुई है। पाकिस्तान के हुक्मरान अपने घरेलू मोर्चे पर उत्पन्न हालात को दबाने में भी इससे कामयाब होंगे, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने की अपनी छवि से बाहर नहीं निकल पाएगा।
संघर्ष के दौरान भारत ने यूएई के साथ रिश्ते मजबूत करने पर ध्यान लगाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेटोलियम पदार्थों के रणनीतिक भंडार बढ़ाने के लिए यूएई से करार किया है। वह तीन करोड़ बैरल तेल देगा। इसके अलावा 10 साल के लिए एलएनजी की आपूर्ति का करार भी महत्वपूर्ण है। ओपेक देशों से यूएई की अलग होने की घोषणा भी भारत के पक्ष में रही है, जिससे भारत उससे ज्यादा तेल ले सकेगा।
हुसैन ने कहा कि समझौता का मसौदा सामने आने के बाद ही इस मामले में स्थिति साफ होगी, लेकिन कुछ चुनौतिया अभी भी कायम हैं। जैसे, क्या ईरान अपनी परमाणु सुविधाओं को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी के लिए सौंपेगा? दूसरे, इजरायल समझौते को लेकर असहमत है, ऐसे में क्या स्थायी युद्ध विराम हो पाएगा?
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