संतुलित कूटनीति से उभरता भारत का वैश्विक नेतृत्व – Prabhasakshi

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भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी संतुलित, स्वतंत्र और दूरदर्शी सोच रही है। विश्व राजनीति के बदलते परिदृश्य, महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्षों और वैश्विक अस्थिरताओं के दौर में भारत ने जिस परिपक्वता और विवेक का परिचय दिया है, उसने उसे विश्व मंच पर एक विश्वसनीय, जिम्मेदार और प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है। ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के निधन के उपरांत उनके अंतिम संस्कार में भारत की ओर से उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल को भेजने का निर्णय भी इसी संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति का परिचायक है। यह केवल एक राजनयिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत और ईरान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, सभ्यतागत एवं रणनीतिक संबंधों के प्रति सम्मान और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। भारत की ओर से विदेश राज्य मंत्री पवित्रा मार्गेरिटा तथा बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल का तेहरान जाना यह स्पष्ट करता है कि भारत अपने मित्र देशों के साथ संबंधों को केवल सामरिक दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के आधार पर भी देखता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं इस अवसर पर उपस्थित नहीं हो सके, क्योंकि उनके पूर्व निर्धारित कार्यक्रम थे, किंतु भारत की गरिमापूर्ण उपस्थिति ने यह संदेश अवश्य दिया कि भारत अपने मित्र देशों के सुख-दुःख में सहभागी बनने की परंपरा का निर्वाह करता है।

वास्तव में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने की रही है। आज भारत के अमेरिका, रूस, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, यूरोप, जापान और आसियान देशों के साथ मजबूत रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध हैं। दूसरी ओर ईरान के साथ भी उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष के साथ अत्यधिक निकटता दूसरे पक्ष के साथ संबंधों को प्रभावित कर सकती है। किंतु भारत ने सदैव यह सिद्ध किया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण करता है। ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रमों पर भारत की प्रतिक्रिया भी अत्यंत संतुलित रही। भारत ने ईरानी दूतावास जाकर शोक संवेदना व्यक्त की, किंतु किसी प्रकार के अंतरराष्ट्रीय आरोप-प्रत्यारोप में स्वयं को शामिल नहीं किया। भारत ने न तो अमेरिका की आलोचना की और न ही इजरायल के विरुद्ध कोई आक्रामक टिप्पणी की। यह वही कूटनीतिक परिपक्वता है, जिसने भारत को वैश्विक राजनीति में एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति का मूल आधार ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ रहा है। इसी कारण भारत ने किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है।

रूस-यूक्रेन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा, क्योंकि वह देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए आवश्यक था। साथ ही भारत ने अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंधों को भी मजबूत बनाए रखा। यह संतुलन साधना आसान नहीं था, किंतु भारत ने इसे सफलतापूर्वक निभाया। यही कारण है कि आज भारत को किसी गुट विशेष का सदस्य नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र वैशिक शक्ति के रूप में देखा जाता है। भारत और ईरान के संबंध हजारों वर्षों पुराने हैं। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, भाषाई, साहित्यिक और व्यापारिक संबंधों का समृद्ध इतिहास रहा है। फारसी भाषा और संस्कृति का भारतीय सभ्यता पर गहरा प्रभाव रहा है। मुगल काल से लेकर आधुनिक युग तक दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान निरंतर चलता रहा है। आर्थिक दृष्टि से भी ईरान भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। भारत लंबे समय तक अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति ईरान से करता रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को कुछ समय के लिए ईरान से तेल आयात रोकना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के संबंधों में कोई स्थायी कटुता नहीं आई।

चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत और ईरान के रणनीतिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण आयाम है। यह परियोजना भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करती है तथा पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार के नए अवसर उपलब्ध कराती है। ऐसे समय में जब चीन ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है, चाबहार भारत के लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने पिछले एक दशक में अनेक उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की हैं। भारत ने अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और निवेश के क्षेत्र में अभूतपूर्व सहयोग विकसित किया है। इजरायल के साथ कृषि, रक्षा और नवाचार के क्षेत्र में नई साझेदारियां स्थापित हुई हैं। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ भारत के आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध नई ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। रूस के साथ परंपरागत मित्रता को भी भारत ने मजबूती प्रदान की है। यही नहीं, यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भी भारत ने अपने संबंधों को नई दिशा दी है।

जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने जिस कुशलता और नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया, उसने विश्व समुदाय को प्रभावित किया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के साथ भारत ने वैश्विक दक्षिण की आवाज को मुखर किया। अफ्रीकी संघ को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाने में भारत की भूमिका ऐतिहासिक रही। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत केवल अपने हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह विकासशील देशों की आकांक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करता है। भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसकी पड़ोसी नीति भी है। भारत ने सदैव ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति को अपनाया है। अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद भी भारत ने वहां की जनता को मानवीय सहायता उपलब्ध कराई। भारत ने अनाज, दवाइयां और अन्य आवश्यक सामग्री भेजकर यह संदेश दिया कि उसका संबंध केवल सरकारों से नहीं, बल्कि वहां की जनता से भी है। कोविड-19 महामारी के दौरान ‘वैक्सीन मैत्री’ अभियान के माध्यम से भारत ने अनेक देशों को टीके उपलब्ध कराए। श्रीलंका जब आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब भारत ने उसे खाद्यान्न, ईंधन, दवाइयां और आर्थिक सहायता प्रदान की। नेपाल, भूटान, मालदीव और बांग्लादेश को भी भारत ने समय-समय पर हरसंभव सहयोग दिया है। यही कारण है कि भारत आज क्षेत्रीय स्थिरता और विकास का प्रमुख आधार बनकर उभरा है।
इसके विपरीत, पाकिस्तान लंबे समय से भारत विरोधी दुष्प्रचार और षड्यंत्रों की नीति अपनाता रहा है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच उत्पन्न तनावों तथा हिंसक घटनाओं के लिए भी पाकिस्तान समय-समय पर भारत को दोषी ठहराने का प्रयास करता रहा है। यह उसकी पुरानी रणनीति का हिस्सा है, जिसके माध्यम से वह अपने आंतरिक संकटों और असफलताओं से ध्यान हटाना चाहता है। वास्तविकता यह है कि भारत ने सदैव क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और विकास का समर्थन किया है। भारत ने कभी भी किसी पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की नीति नहीं अपनाई। इसके विपरीत, उसने मानवीय सहायता, विकास परियोजनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। पाकिस्तान के निराधार आरोपों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत को एक जिम्मेदार और विश्वसनीय राष्ट्र के रूप में देखता है। आतंकवाद के विरुद्ध भारत की स्पष्ट नीति और शांति के प्रति उसकी प्रतिबद्धता ने उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को और मजबूत किया है। यही कारण है कि आज विश्व के अधिकांश देश भारत को स्थिरता, विकास और सहयोग के एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्वीकार कर रहे हैं।

आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। आर्थिक शक्ति, तकनीकी प्रगति, जनसांख्यिकीय क्षमता और कूटनीतिक सक्रियता ने भारत को वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में ला खड़ा किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सक्रिय विदेश यात्राओं और विश्व नेताओं के साथ निरंतर संवाद ने भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को सुदृढ़ किया है। भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह शक्ति और संवेदना, दोनों को साथ लेकर चल रहा है। वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए मानवता, सहयोग और वैशिक कल्याण की भावना को भी महत्व देता है। ईरान के साथ संबंधों को संतुलित ढंग से आगे बढ़ाने का निर्णय इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। आज की जटिल विश्व व्यवस्था में वही राष्ट्र सफल हो सकता है, जो संवाद, संतुलन, सह-अस्तित्व और दूरदर्शिता का परिचय दे। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह न केवल अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है, बल्कि विश्व शांति, स्थिरता और सहयोग का भी एक विश्वसनीय वाहक बन सकता है। निस्संदेह भारत की संतुलित विदेश नीति और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में किए गए कूटनीतिक प्रयास आने वाले वर्षों में भारत को एक सशक्त, प्रभावशाली और नैतिक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

– ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार
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इजराइल की संसद और सरकार ने एक ऐसा अप्रत्याशित कदम उठाया है जिसे तुर्की और अजरबैजान के ताबूत में आखिरी कील माना जा रहा है। दरअसल इजराइली सरकार ने आधिकारिक तौर पर 1915 के अर्मेनिया नरसंहार यानी अर्मेनियन जेनोसाइड को मान्यता दे दी है। यह कोई छोटी मोटी बात नहीं है दोस्तों।
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