हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा को हमें उस रणनीतिक बदलाव की शुरुआत का संकेत समझना चाहिए- जिसे एक्ट-ईस्ट 2.0 कहा जा सकता है। यह ऐसा परिवर्तन है, जिसमें हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को आकार देने में भूमिका निभाने पर ज्यादा जोर दिखता है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत का रणनीतिक ध्यान स्वाभाविक रूप से अन्य क्षेत्रों की ओर केंद्रित रहा है। यूक्रेन में संघर्ष, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और उत्तरी सीमाओं पर जारी सुरक्षा चुनौतियों में भारत की कूटनीतिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा खर्च हुआ है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने की आकांक्षा रखने वाला कोई भी देश संकटों के एक समूह को अपनी रणनीतिक सोच पर स्थायी रूप से हावी नहीं होने दे सकता। उभरती ताकतों को भविष्य के अवसरों के लिए भी तैयारी करनी होती है।
इसलिए प्रधानमंत्री का पूर्वी देशों की ओर यह कूटनीतिक अभियान रणनीतिक संदेश देने का भी माध्यम है। देश अपनी प्राथमिकताओं का संकेत केवल आधिकारिक घोषणाओं से ही नहीं, बल्कि इस बात से भी देते हैं कि उनके सर्वोच्च स्तर के राजनयिक दौरे किन देशों की ओर होते हैं। संदेश स्पष्ट है- भारत एक बार फिर स्पष्ट उद्देश्य के साथ पूर्व की ओर देख रहा है।
मूल एक्ट-ईस्ट नीति ने सम्पर्क, व्यापार, संस्थागत साझेदारियों और आसियान देशों से संबंधों के जरिये पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के जुड़ाव को दिशा दी थी। इस नीति ने यह स्वीकारा था कि भारत की समृद्धि इस क्षेत्र की गतिशीलता से अलग नहीं है। इसने अपने उद्देश्य को सफलतापूर्वक पूरा किया। लेकिन आज परिदृश्य में व्यापक बदलाव आ चुका है।
हिन्द-प्रशांत क्षेत्र अब दुनिया की प्रमुख भू-राजनीतिक धुरी बनकर उभरा है। समुद्री सुरक्षा, लचीली आपूर्ति शृंखलाएं, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां, समुद्र के भीतर का बुनियादी ढांचा, ऊर्जा आपूर्ति अब वैश्विक शक्ति-संतुलन को उतना ही प्रभावित करते हैं, जितनी सैन्य क्षमता। आर्थिक कूटनीति और सुरक्षा को अब अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। यदि एक्ट-ईस्ट के पहले चरण ने भारत को पूर्वी एशिया से जोड़ा था तो दूसरे चरण का उद्देश्य हिन्द-प्रशांत के रणनीतिक परिदृश्य को आकार देने में योगदान होना चाहिए।
अब भारत के पूर्वी हितों को क्वाड की गति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। यह समूह सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है, लेकिन यह न तो कोई सैन्य गठबंधन है और न ही हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीति को आगे बढ़ाने का एकमात्र माध्यम। ऐसे समय में, जब अमेरिका का ध्यान चीन के साथ अपनी द्विपक्षीय प्रतिस्पर्धा और विशेष रूप से ताइवान के मुद्दे पर अधिक केंद्रित दिखाई देता है और क्वाड पर अपेक्षाकृत कम राजनीतिक जोर नजर आता है, तब भारत को अपनी पूर्वोन्मुख रणनीति स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ानी होगी। इसका अर्थ है जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ द्विपक्षीय साझेदारियों को मजबूत करना तथा एक्ट-ईस्ट 2.0 के केंद्र में आसियान को स्थापित करना।
बदलता क्षेत्रीय परिदृश्य भारत की अधिक सक्रिय भागीदारी की भी मांग करता है। यद्यपि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अब भी प्रमुख सैन्य शक्ति बना हुआ है, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों को लगता है कि उसका राजनीतिक ध्यान अब अधिक सिलेक्टिव हो गया है। चीन ने आर्थिक एकीकरण, बुनियादी ढांचे के विकास, समुद्री उपस्थिति और निरंतर कूटनीतिक प्रयासों के जरिये अपना प्रभाव लगातार बढ़ाया है। इस विस्तार का बड़ा हिस्सा उस ग्रे-जोन में होता है, जो खुले टकराव की सीमा से नीचे रहता है, लेकिन जिसके दीर्घकालिक रणनीतिक परिणाम होते हैं।
समय आ गया है कि हम रणनीतिक क्षमता के साथ रणनीतिक आत्मविश्वास का भी समुचित मेल करें। फिलीपींस और इंडोनेशिया के साथ भारत की बढ़ती साझेदारियां- जिनमें रक्षा निर्यात भी शामिल है- यह संकेत देती हैं कि रक्षा साझेदारियां अब कूटनीति का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी हैं। ग्रेट निकोबार के विकास जैसी परियोजनाओं को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वे केवल बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि भारत के एक समुद्री शक्ति के रूप में उभरने की प्रतीक हैं।
हिन्द-प्रशांत क्षेत्र 21वीं सदी के रणनीतिक शक्ति-संतुलन को परिभाषित करेगा। भारत अब इस क्षेत्र के भविष्य को आकार देने में भूमिका निभाने के लिए तैयार है। एक्ट-ईस्ट 2.0 नीति बताती है कि भारत का रणनीतिक क्षितिज अब पूर्व की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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